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#MeToo Movement: जानें क्‍या है मानहानि कानून, दोषियों के लिए कितनी सजा का है प्रावधान?

Me Too Campaign Movement in India Hindi: मानहानि कानून 2 प्रकार के होते हैं। इसमें एक सिविल मानहानि का मामला होता है और दूसरा अपराधिक मानहानि का मामला।

मी टू मूवमेंट के अब आया मन टू(graphics by rajan sharma)

#Me Too मूवमेंट के तहत महिलाओँ के साथ छेड़छाड़ के आरोपों का सामना कर रहे केन्द्रीय मंत्री एमजे अकबर को अपने पद से इस्‍तीफा देना पड़ा है। एमजे अकबर ने इससे पहले पत्रकार प्रिया रमानी के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया था। एमजे अकबर ने प्रिया रमानी के आरोपों को मनगढ़ंत बताया और कहा कि उनके आरोपों से उनकी छवि को नुकसान पहुंचा है। अब चूंकि आजकल ये मुद्दा मीडिया में छाया हुआ है और अन्य कई मामलों में भी मानहानि के मुकदमों का हम आमतौर पर जिक्र सुनते ही हैं तो आइए जानते हैं कि आखिर मानहानि कानून क्या है?

मानहानि कानूनः कानून के अनुसार, मानहानि से मतलब एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति के खिलाफ झूठा या आपत्तिजनक बयान देना है और इस बयान से संबंधित व्यक्ति की छवि को नुकसान पहुंचता हो। ये बयान लिखित या मौखिक हो सकता है। आईपीसी की धारा 499 के तहत इसका उल्‍लेख है। यह कानून वर्ष 1860 में अमल में आया था। यदि कोई भी व्यक्ति किसी के मौखिक या लिखित बयान से अपमानित महसूस करता है तो वह व्यक्ति आरोपी के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दर्ज करा सकता है। मानहानि कानून 2 प्रकार के होते हैं। इसमें एक सिविल मानहानि का मामला होता है और दूसरा अपराधिक मानहानि का मामला। कानून के मुताबिक सिविल मानहानि के मामलों में आरोपी व्यक्ति पीड़ित से मुआवजे की मांग कर सकता है और यह मुआवजा अदालत द्वारा तय किया जाता है। सिविल मानहानि के मामलों में आरोपी को जेल नहीं हो सकती। वहीं, अपराधिक मानहानि के मामलों में आरोपी को अधिकतम 2 साल की जेल हो सकती है। बता दें कि एक ही बयान पर दोनों प्रकार के मानहानि मामले सिविल और अपराधिक दर्ज कराए जा सकते हैं।

#Me Too मूवमेंट में कहां ठहरता है मानहानि का मामला?: बता दें कि मी टू मूवमेंट के तहत आरोपित किए गए कई लोगों ने पीड़िताओं के खिलाफ मानहानि का मामला दर्ज कराने की धमकी दी है। ऐसे में ये देखना जरुरी है कि मी टू मूवमेंट में मानहानि के ये मामले कहां ठहरेंगे। दरअसल मानहानि के इस मामले में आरोपी पक्ष यौन शोषण और यौन उत्पीड़न के खिलाफ आईपीसी और Sexual Harassment of Women at Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal)Act, 2013 में किए गए प्रावधानों पर निर्भर हैं।

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