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बड़े नेताओं के निकलने से बसपा गई हाशिए पर?

अकाली दल से समझौते के बाद तो बसपा के तीन सांसद और नौ विधायक पंजाब में रहे। हरियाणा में सांसद रहे अमन कुमार नागरा ने अंबाला से तब से मंत्री सुरजभान को हराया था।

बीएसपी चीफ मायावती।

अमलेश राजू

दिल्ली में भले ही कभी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का सांसद नहीं जीत पाया लेकिन यहां की दो विधानसभा क्षेत्रों गोकलपुर और बदरपुर में विधायक रहे सुरेंद्र कुमार और राम सिंह नेताजी के साथ एकीकृत दिल्ली नगर निगम में बसपा के 17 निगम पार्षदों की मौजूदगी उसे दिल्ली में विपक्षी राजनीतिक दलों की श्रेणी में ला खड़ा किया था।

संस्थापक कांशीराम ने इस पार्टी को देश के कोने-कोने में पहुंचाने के लिए जितनी मेहनत की, कार्यकर्ताओं के घर-घर जाकर उनका मान सम्मान बढ़ाया और अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों में अपनी गहरी पैठ बनाई शायद उतनी मेहनत कांशीराम के देहावसान के बाद उत्तरप्रदेश को छोड़कर दूसरे राज्यों में मायावती नहीं कर पाई। यही कारण है कि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रहने के बाद भी पार्टी इस समय पूरे देश में सिवाय कुछ सीटें हासिल करने के अलावा खास असर नहीं छोड़ पा रही है। एक समय था जब जम्मू कश्मीर में पांच विधायकों के साथ पार्टी मजबूत स्थिति में थी।

अकाली दल से समझौते के बाद तो बसपा के तीन सांसद और नौ विधायक पंजाब में रहे। हरियाणा में सांसद रहे अमन कुमार नागरा ने अंबाला से तब से मंत्री सुरजभान को हराया था। कभी मध्यप्रदेश में 11 विधायक, बिहार में एक विधायक, उत्तराखंड में कभी आठ, पांच और तीन विधायक, कर्नाटक में दो विधायक, झारखंड और आंध्रप्रदेश में एक-एक विधायक और राजस्थान में मौजूदा विधानसभा में भी छह विधायक जीते और बाद में कांग्रेस में शामिल होकर पार्टी के मतदाताओं के सामने एक प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया कि पार्टी आखिर क्यों दिन प्रति दिन अपना वजूद खोती जा रही है।

राजधानी दिल्ली में 2008 में बसपा कभी दो विधायक के साथ विधानसभा में मौजूदगी ही दर्ज नहीं कराई थी बल्कि नरेला, बाबरपुर, बादली, देवली और तुगलकाबाद जैसे इलाके में दूसरे नंबर पर रहकर यह आभास कराया था कि आने वाले समय में पार्टी अपनी स्थिति ज्यादा मजबूत कर लेगी। लेकिन समय का करवट ऐसे बदला कि दिल्ली में बसपा सांसद वीर सिंह, राजाराम और अशोक सिद्धार्थ को जिम्मेदारियां देने के बाद भी मौजूदा विधानसभा चुनाव में पार्टी बहुत अच्छी स्थिति में आने की उम्मीद नहीं रख रही है। दिल्ली में 2003 विधानसभा चुनाव में बसपा ने पहली बार जोरदार तरीके से चुनाव लड़ा था और 9 फीसद वोट पाकर भले ही कोई सीट जीत नहीं पाई लेकिन तीन विधानसभा विधानसभा क्षेत्रों गोकुलपुर, घोंडा और मंगोलपुरी में दूसरे नंबर पर आई।
वह दौर था 2008 का जब बसपा अध्यक्ष मायावती देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री थीं और बसपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। 2008 में उत्तर प्रदेश के मंत्री नसीमुद्दीन सिद्धकी और चौधरी लक्ष्मी नारायण को दिल्ली में बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। पश्चिमी उत्तर के दलित नेताओं ने दिल्ली में डेरा डाला था। बसपा ने दिल्ली में पहली बार सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला भी अपनाया और मेहनत रंग लाई।

गोकुलपुर से चौधरी सुरेंद्र कुमार और बदरपुर से राम सिंह नेताजी सिंह ने जीत हासिल की, वहीं पांच विधानसभा सीटों देवली, तुगलकाबाद, बादली, बाबरपुर और नरेला में दूसरे नंबर पर आई।

दिल्ली में अनुसूचित जाति की आबादी 17 फीसद है। मुसलिम समाज की आबादी 12 फीसद। बावजूद इसके बसपा के खाते में अब वोट नहीं पड़ता। पार्टी का ग्राफ लगातार गिरता गया। कभी चौधरी ब्रह्म सिंह, राम सिंह नेताजी, सुरेंद्र कुमार, सहीराम पहलवान, सुरजीत सिंह, संजय कुमार, शरद चौहान जैसे नेताओं से बसपा दिल्ली के हर इलाके में अपनी मौजूदगी दर्ज कराती थी। लेकिन समय ने करवट बदली और ब्रह्म सिंह भाजपा में सहीराम, सुरेंद्र कुमार, रामसिंह नेताजी, शरद चौहान आप में चले गए और विधायक बने और कुछ बनते रह गए। बसपा के पूर्व निगम पार्षद प्रियंका गौतम और वतर्मान जयप्रकाश ने भी बसपा छोड़ दी है।

बहरहाल, बीते साल दिल्ली में देवली पहाड़ी महाआंदोलन और गुरु रविदास मंदिर तुगलकाबाद की पुनर्स्थापना के लिए दो बड़े आंदोलन में बहुजन समाज पार्टी को अवश्य आगे आकर नेतृत्व करना पड़ा लेकिन दिल्ली के मौजूदा विधानसभा चुनावों में 68 सीटें लड़ाने वाली पार्टी को अभी भी अपने वजूद के लिए और साख बचाने के लिए दिल्ली सहित पूरे देश में स्थानीय कार्यकर्ताओं को आगे कर, परंपरागत कार्यशैली में सुधार करते हुए छात्र, अधिवक्ता, डॉक्टर, इंजीनियर, पूर्व सैनिक और कर्मचारियों के संगठन तैयार करने होंगे। उनके प्रकोष्ठ बनाने होंगे तभी एक बार फिर पार्टी अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस पा सकती है।

-बसपा के संस्थापक कांशीराम ने इस पार्टी को देश के कोने-कोने में पहुंचाने के लिए कड़ी मेहनत की।
-दिल्ली नगर निगम में बसपा के 17 निगम पार्षदों की मौजूदगी ने उसे दिल्ली में विपक्षी राजनीतिक दलों की श्रेणी में ला खड़ा किया।
-राजधानी दिल्ली में 2008 में बसपा ने दो विधायक के साथ विधानसभा में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी।
-दिल्ली में 2003 विधानसभा चुनाव में बसपा ने पहली बार जोरदार तरीके से चुनाव लड़ा था और 9 फीसद वोट पाई।
-अकाली दल से समझौते के बाद तो बसपा के तीन सांसद और नौ विधायक पंजाब में रहे।
-2008 में उत्तरप्रदेश के मंत्री नसीमुद्दीन सिद्धकी और चौधरी लक्ष्मी नारायण को दिल्ली में बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
-दिल्ली में अनुसूचित जाति की आबादी 17 फीसद है। मुसलिम समाज की आबादी 12 फीसद। बावजूद इसके बसपा के खाते में अब वोट नहीं पड़ता।
-दिल्ली के मौजूदा विधानसभा चुनावों में 68 सीटें लड़ाने वाली पार्टी को अभी भी अपने वजूद के लिए और साख बचाने के कड़ी मेहनत करनी होगी।

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