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आध्यात्मिक चिंतक: सर्वहितकारी रामराज्य

अयोध्या के गौरव व संपूर्ण धरा धाम को अपने नाम मात्र से पवित्र करने वाले श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम कहे जाते हैं।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का चरित्र और गुण की महिमा अनंत है।

कमल वैष्णव

‘‘हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता
कहहि सुनहि बहुविधि सब सन्ता’’।।

प्रभु श्री राम के गुण अनंत है। उनकी कीर्ति भी अनंत है। जिसका कोई अंत नहीं। कई संतों ने राम जी के गुण, यश कीर्ति चरित्र का भिन्न-भिन्न सुंदर वर्णन किया है। देवभूमि भारतवर्ष में अनेक राजाओं के राज्य प्रतिस्थापित हुए। जिन पर अनेक प्रतापी तथा धर्म संपन्न राजाओं ने शासन किया। नहुष, ययाति, शिवि और सत्यवादी हरिश्चंद्र जैसे प्रतापी सम्राट पुण्य धरा भारतवर्ष में हुए।

महाराज दशरथ जैसे सच्चे भगवत प्रेमी तथा सत्यप्रिय सम्राट भी भारत में हुए। ऋषि मुनियों की तपोस्थली भी यहां रही। जिन्होंने शरीर का त्याग कर दिया, किंतु सत्य को नहीं छोड़ा। इन सबको हम श्रद्धा सम्मान के साथ स्मरण करते हैं, परंतु इनके राज्यों को नहुष राज्य, शिबी राज्य, हरिचंंद्र राज्य अथवा दशरथ राज्य कह कर स्मरण नहीं किया जाता। मगर हम राम के राज्य को रामराज्य कह कर स्मरण करते हैं।

श्रीराम और उनके राज्य दोनों के प्रति सप्रेम भावांजलि अर्पित करते हैं तथा हर युग में प्रत्येक राज्य को रामराज्य देखने की कल्पना लोग सदैव करते हैं। रामराज्य का नाम आते ही धर्म,अर्थ, काम व मोक्ष की सार्थकता तथा चहुं ओर शांति, न्याय और मंगल कल्याण का भाव ज़हन में उभर आता है। राम राज्य की खुशहाली और धर्म परायणता का मुख्य कारण श्री राम का मर्यादाओं से परिपूर्ण चरित्र था।

‘मंगल भवन अमंगल हारी’
जो मंगल कल्याण करने वाले और प्रत्येक प्रकार के अमंगल का हरण करके जीवों को सुखी करने वाले हैं। अयोध्या के गौरव व संपूर्ण धरा धाम को अपने नाम मात्र से पवित्र करने वाले श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम क्यों कहे जाते हैं। वास्तव में परब्रह्म परमात्मा के रामस्वरूप को मर्यादा पुरुषोत्तम क्यों कहते हैं। इसे कम लोग जानते हैं।

श्रीराम ने सब प्रकार की सर्वोत्तम मर्यादाएं स्वयं के आचरण में धारण करते हुए प्रतिष्ठित की थी। आपने सम्राट होने के पूर्व अपने निर्मल पवित्र चरित्रों द्वारा व्यष्टि की सर्वोत्तम मर्यादाओं को स्वयं पालन करके दिखलाया कि एक व्यक्ति को समाज, परिवार व तमाम रिश्तों आदि के साथ कैसे संतुलित व्यवहार करना चाहिए। एक व्यक्ति को जीवन यात्रा चलाने के लिए तथा जीवन के महान उद्देश्य परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति के लिए किस प्रकार के गुणों की, किस प्रकार के त्याग-तप की आवश्यकता होती है। इसका दिग्दर्शन भगवान श्रीरामचंद्र जी ने अपनी लीलाओं द्वारा मर्यादाओं में प्रतिस्थापित कर के प्रत्यक्ष कर दिया।

त्याग तप को प्रदर्शित करता श्रीराम का चरित्र जन मानस के लिए प्रेरणा है कि कुल की आन व पितृ आज्ञा पालन हेतु राज मुकुट और राज सुख का पल में त्याग कर वल्कल वस्त्र धारण कर मुनियों के भेष में वन गमन करते हैं। तनिक भी मन में किसी के प्रति रोष,क्रोध नही। वहीं शांत स्वभाव, चित में स्थिरता को धारण किए हुए अनेक वर्णों के जीवों का उद्धार किया और वहां उन्होंने अपनी सुंदर नीतियों द्वारा वर्ण भेद को मिटा कर, मैत्री धर्म की मर्यादा को स्थापित किया।

ज्ञान के अथाह सागर होने के उपरांत भी सदैव ऋषि मुनियों के श्रीमुख से धर्म, नीति पूर्ण उपदेश ग्रहण करते तथा धर्म नीति पूर्ण आचरण करते हुए उन्होंने दर्शाया कि ज्ञान अनंत है उसके अर्जित करने की कोई सीमा नही होती तथा ज्ञान प्राप्त करना तभी सार्थक होता है जब वह ज्ञान व्यक्तित्व का अंग बन जाए।

राज्य रोहण के बाद उन्होंने जो सर्वोत्तम शासन व्यवस्था, अर्थ नीति, धर्म नीति, समाज नीति तथा राजनीति की मर्यादा स्थापित की उन सब के समूह का नाम ही रामराज्य है। रामराज्य का स्वरूप राम राज्य में सभी वर्गों के समस्त नर नारी सच्चरित्र वर्णाश्रम धर्म परिपालन तथा सब कर्तव्यनिष्ठ थे। कर्तव्य का मानदंड अपनी इच्छा मात्र नहीं था। गोस्वामी जी के शब्दों में-
‘करहु जाइ जा कहुँ जो भावा’
नहीं था। वह वेद मार्ग को अर्थात वेदों की आज्ञानुसार और शास्त्र वचनों को मानदंड मान कर जीवन यापन करते थे। इसके फलस्वरूप रोग, शोक तथा भय की प्राप्ति उनको नहीं होती थी। सभी धर्मपरायण थे तथा काम,क्रोध, लोभ, मद आदि से सर्वथा दूर रहते थे। कोई किसी से बैर नहीं करता था। बैर के अभाव में प्रेम स्वाभाविक ही है।

सभी गुणों से गुणसंपन्न, पुण्यात्मा, ज्ञानी और चतुर थे पर उनकी चतुरता भजन में और ज्ञान में थी। सभी मर्यादित जीवन में आस्था रखने वाले थे। श्रीराम ने मर्यादाओं को इहलोक व परलोक के सुखों का आधार बताते हुए कहा कि जिस प्रकार नदी का जल दोनों किनारों की मर्यादा में बहता रहे तो नदी जिस क्षेत्र से बहेगी उसको खुशहाल करती जाएगी किंतु ज्यों ही वह अपने किनारों रूपी मर्यादा को लांघ जाती है तो बाढ़ आती है और अमर्यादित नदी सभी क्षेत्रवासियों को पीड़ित करती है। ठीक उसी प्रकार मनुष्य के सुख भी मर्यादा पर आधारित होते हैं।

ऐसे श्रीराम व मानव द्वारा आश्रित इस धर्म का कर्तव्य पालन का प्रभाव प्रकृति तथा पशु पक्षियों पर भी पड़े बिना नहीं रहा। गोस्वामी जी पशु पक्षियों के लिए लिखते हैं-
खग मृग सहज बयरू बिसराई।
सबनहि परस्पर प्रीति बढ़ाई।।

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि राम राज्य में त्रिविध ताप; पाप का अभाव था। तीन प्रकार के ताप होते हैं- दैहिक, दैविक और भौतिक। ये तीनों ही रामराज्य में बिल्कुल नहीं रह गए थे।
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि व्यापा।।

धर्म और स्वास्थ्य के नियमों का पालन करने वालों को शोक-रोग आदि दैहिक तापों की पीड़ा कैसे हो सकती थी। भौतिक ताप प्रकृति के उपयुक्त प्रकार से प्रभावित हो जाने के बाद कैसे हो सकते थे। दैविक ताप तो सब कर्तव्य विमुख तथा धार्मिक व्यक्तियों को दंड स्वरूप मिला करते हैं उनकी रामराज्य में स्थिति ही कहां थी।

त्रिविध विषमता का अभाव
राम राज्य में आत्मिक,आंतरिक, बाहृरी और आर्थिक विषमताएं बिल्कुल नहीं थी। सद्भाव, सद्विचार, सद्भावना और परमार्थ ही परम लक्ष्य होने के कारण साधना के द्वारा सभी के अंत:करण शुद्ध हो गए थेऔर सभी लोग भगवान की प्रेम भक्ति में निमग्न होकर परम पद के अधिकारी हो गए थे। इससे उनमें आत्मिक वैषम्य नहीं था। वह सब में अपने भगवान को देखते थे- निज प्रभुमय देखहिं जगत।

आत्मिक विषमता से दूर हो जाने के कारण बाहरी विषमता भी सर्वथा नष्ट हो गई थी किसी को किसी बात का गर्व करने अथवा छोटे बड़े का प्रश्न उठाने के लिए अवसर ही न था। शुद्ध अंत:करण वालों को किसी से राग द्वेष अथवा छोटे बड़े का गर्व हो ही कैसे सकता था।

पर्वतों द्वारा मनोवांछित मणियों के दिए जाने से समुंदर द्वारा रत्नों के बाहर फेंक देने से, विलासिता एवं आरामतलबी के न रहने से, सब कर्तव्य पालन की निष्ठा से तथा मुद्रा के सर्वथा न रहने से रामराज्य में आर्थिक विषमता भी नहीं थी। इसका अर्थ यह नहीं कि रामराज्य में विशाल व्यापार ही नहीं था।

वैश्य वर्ग अपना कर्तव्य समझ कर बड़े-बड़े व्यापार करते थे, परंतु रामराज्य में सभी वस्तुएं बिना मूल्य बिकती थीं। जिसको जिस वस्तु की आवश्यकता हो वह उसी वस्तु को बाजार से जितनी चाहे उतनी मात्रा में प्राप्त कर सकता था। इसीलिए कोई विशेष संग्रह भी नहीं करता था।

राजा और प्रजा का संबंध जिस राज्य में पाप अथवा अपराध की कभी स्थिति ही न हो, जिस राज्य के लिए गोस्वामी जी के अनुसार
दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज।
जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज।।

ऐसी स्थिति हो उस राज्य में तथा जिसमें भगवान रामचंद्र प्रजा से कुछ आध्यात्मिक ज्ञान पर कहना चाहते हैं तो हाथ जोड़ कर कहते हैं कि यदि आप लोगों का आदेश हो तो मैं कुछ कहूं। आपको अच्छा लगे तो सुनिए अच्छा ना लगे अथवा मैं कोई अनीति पूर्ण बात कहूं तो मुझे रोक दीजिए। जहाँ प्रजा का संतान समान पालन होता था।

शोषण जैसा शब्द ही नही था। हां उस राज्य में राजा प्रजा के कैसे क्या संबंध हो सकते हैं तो स्पष्ट है। राम राज्य में सभी व्यक्तियों ने इहलोक और परलोक दोनों को सफल किया था उस समय के जैसा
सर्वतो भावेन मर्यादा मंडित राज्य कभी स्थापित नहीं हो सका। इसीलिए आज युगों-युग बाद भी जनमानस पवित्र रामराज्य को स्मरण करता है।

सार यह कि राम राज्य चाहने मात्र से नहीं बनता प्रत्येक देशवासी; राजा को मर्यादाओं के अन्तर्गत अपने अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूर्ण निष्ठा से करना चाहिए। कर्तव्यों का निर्वहन करने से अधिकार स्वत: ही प्राप्त हो जाते हैं। राम्राज्य प्रत्येक वर्ग के लिए आदर्श व कलात्मक जीवन जीने की सुंदर प्रेरणा है।

आयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण तभी पूर्णता को प्राप्त होगा जब श्रीराम के गुणों व शिक्षाओं की नींव जन जन के आचरण में धरी जाएगी।

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