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लांस नायक अल्‍बर्ट एक्‍का: शहादत देकर अगरतला को पाकिस्‍तान के हाथों में जाने से बचाया

एल्बर्ट एक्का की शौर्य गाथा का परिचय 3 और 4 दिसंबर की रात को मिलता है। 47 साल पहले 1971 की जंग में एक्का और उनके 14 गार्ड्स रेजिमेंट के साथियों ने अगरतला को पाकिस्तान के हमलों से बचा लिया था। इस जंग में उन्होंने पाकिस्तान की कमर तोड़कर रख दी। क्योंकि, अगरतला के जरिए पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ बड़े स्तर पर आक्रमण का प्लान बनाया था।

1971 की जंग के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित शहीद अल्बर्ट एक्का. (फोटो सोर्स- एक्सप्रेस आर्काइव)

कहते हैं हर किसी की जिदंगी में बहादुरी की मिसाल पेश करने का एक मौका ज़रूर मिलता है। लेकिन, जो बार-बार बहादुरी की मिसाल पेश करे उसे अल्बर्ट एक्का कहते हैं। भारतीय फौज का यह नाम हर युद्ध में अपनी बहादुरी से दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिया। 1965 और 1971 की जंग में लांस नायक अल्बर्ट एक्का की जांबाजी ने भारतीय सेना के शौर्य को अलग ही बुलंदी दी। गोलियों से छलनी होने के बावजूद दुश्मन को पूरी तरह नेस्त-नाबूत करके युद्ध में नया मिसाल कायम  करने वाले एक्का को मरणोपरांत परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

झारखंड के गुमला जिला के डुमरी ब्लाक के जरी गांव में अल्बर्ट एक्का काम जन्म 1942 में हुआ था। पिता नाम जूलियस एक्का और माता का नाम मरियम था। शुरू से ही अल्बर्ट एक्का का शौक फौज में जाने का था। उनकी यह इच्छा दिसंबर 1962 में पूरी हुई और बिहार रेजिमेंट में भर्ती होकर उन्होंने देश की सेवा शुरू की। बेहतरीन हॉकी खिलाड़ी और युद्ध कौशल में माहिर एक्का का बाद में गठित 14 गार्ड्स में तैनाती कर दी गयी। उनकी जांबाजी को देखते हुए ही उन्हें लांस नायक बना दिया गया।

एल्बर्ट एक्का की शौर्य गाथा का परिचय 3 और 4 दिसंबर की रात को मिलता है। 47 साल पहले 1971 की जंग में एक्का और उनके 14 गार्ड्स रेजिमेंट के साथियों ने अगरतला को पाकिस्तान के हमलों से बचा लिया था। गंगासागर रेलवे स्टेशन के पास इस जंग में उन्होंने पाकिस्तान की कमर तोड़कर रख दी। क्योंकि, अगरतला के जरिए पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ बड़े स्तर पर आक्रमण का प्लान बनाया था। लेकिन, इस युद्ध में शिकस्त खाने के बाद पाकिस्तान पूरी तरह से धराशाई हो गया और उसे 16 दिसंबर को भारत के आगे पूरी तरह सरेंडर करना पड़ा।

सुरक्षा मामलों के जानकार और लेखक मनास पॉल के मुताबिक, ” पाकिस्तान की फौज ने 1971 में अगरतला को अपना निशाना बनाया। तब यह तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) के बॉर्डर पर स्थित था। यह भारत के लिहाज से बांग्लादेश मुक्तिवाहिनी दस्ते को मदद मुहैया कराने के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्पूर्ण था। मगर, वक़्त रहते अल्बर्ट एक्का और उनके साथियों ने पाकिस्तान की इस कोशिश को यहां स्थित श्रीपल्ली गांव में पूरी तरह नेस्त-नाबूत कर दिया।” 3 और 4 दिसंबर की रात हुई भीषण जंग में एक्का ने गोलियों से घायल होने के बावजूद दुश्मनों का सफाया कर दिया। इस दौरान उनके कई साथी भी शहीद हुए। सभी शहीदों को यहां स्थित श्रीपल्ली गांव में दफना दिया गया।

हालांकि, आज की तारीख में श्रीपल्ली गांव के लोग एक्का की शौर्य-गाधा को बहुत ही कम जानते हैं। स्थानीय लोगों को उनकी मिट्टी की अहमियत का पता तब चला जब उनके यहां शहीद अल्बर्ट एक्का की पत्नी 2016 में 45 साल बाद पहुंचीं। जब एक्का शहीद हुए तब उनकी पत्नी बलमदीना की गोद में उनका एक साथ का बच्चा था। लेकिन, इतने सालों बाद उन्होंने उस मिट्टो को अपने पास उठा लिया, जहां उनके शौहर एक्का शहीद हुए। एक्का की पत्नी ने मिट्टी को अपने साथ झारखंड लेकर चली गयीं। श्रीपल्ली गांव में एक या दो बुजुर्ग ही ऐसे हैं जिनके जहन में 3 दिसंबर 1971 की रात और एक्का की बहादुरी याद है। उन्हीं की कोशिश का परिणाम है कि यहां एक सैन्य मेमोरियल बन पाया है। गांव के दीपांकर सरकार बताते हैं, “हमें बताया गया है कि यहां स्थित मेमोरियल 1971 की जंग में शहीद हुए सैनिकों की याद में है।” हालांकि, सरकार को नहीं मालूम कि इस जमीन पर एक्का और उनके बहादुर साथी देश की रक्षा करते हुए अपनी जान गंवा चुके हैं और यहीं उन्हें दफन किया गया है। गांव में गणतंत्र दिवस और बांग्लादेश विजय दिवस के मौके पर तिरंगा जरूर फहराया जाता है और लोग बस यही याद रखते हैं।

शहादत के बाद जिस जगह एक्का और उनके साथियों को दफनाया गया उस जमीन को गोपाल चंद्र दास नाम के शख्स ने खरीद लिया। दास बताते हैं, ” मैंने सुन रखा है कि वे (शहीद) लोग यहीं दफनाए गए हैं। अल्बर्ट एक्का के परिवार के लोगों को यहां लाया गया था। उन्होंने मेरे घर से कुछ मिट्टी भी अपने साथ ले गए थे। (इसके पहले) मुझे बिल्कुल पता नहीं था कि ये लोग यहीं दफनाए गए हैं। आज मैं बहुत गर्व करता हूं कि जहां उन लोगों को दफनाया गया है, उस जगह पर मैं रहता हूं।”

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