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पुरस्कार वापसी के खिलाफ, सड़क पर अनुपम खेर का ‘मार्च फॉर इंडिया’

बहुप्रचारित हुए साहित्यकारों, इतिहासकारों और वैज्ञानिकों की ‘पुरस्कार वापसी’ और कथित असहिष्णुता के आरोपों के खिलाफ शनिवार को देश की राजधानी दिल्ली में ‘मार्च फॉर इंडिया’ का आयोजन किया गया..

बहुप्रचारित हुए साहित्यकारों, इतिहासकारों और वैज्ञानिकों की ‘पुरस्कार वापसी’ और कथित असहिष्णुता के आरोपों के खिलाफ शनिवार को देश की राजधानी दिल्ली में ‘मार्च फॉर इंडिया’ का आयोजन किया गया। नामचीन अदाकारों, फिल्मकारों, गायकों और आम नागरिकों के साथ राष्ट्रीय संग्रहालय के पास से निकला जुलूस राजपथ पर कदमताल करता हुआ राष्ट्रपति भवन पहुंचा। वहीं वामपंथी फिल्मकार एमएस सथ्यू ने शनिवार को सम्मान वापसी मुहिम का विरोध करते हुए सरकार के रुख का समर्थन किया।

मधुर भंडारकर और चित्रकार वासुदेव कामथ समेत 11 सदस्यों ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को एक ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन में बिरजू महाराज, कमल हासन, शेखर कपूर, विद्या बालन, विवेक ओबरॉय, अशोक पंडित, अभिजित भट्टाचार्य, लेखिका मधु किश्वर, फिल्मकार प्रियदर्शन, रवीना टंडन, लेखकों, पूर्व न्यायाधीशों और संगीतकारों जैसी शख्सियतों के दस्तखत हैं।

राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपने और कथित असहिष्णुता के दुष्प्रचार के खिलाफ अपना विरोध प्रकट करने के बाद अनुपम खेर ने उन लोगों पर सवाल उठाए जो पुरस्कार और सम्मान वापसी कर रहे हैं। खेर ने कहा कि कुछ लोगों ने असहिष्णुता शब्द को इजाद किया है और पिछले कुछ दिनों में मैंने यह शब्द इतनी बार सुना, जितना पूरे जीवन में नहीं। हमारा मानना है कि इस देश के लोग धर्मनिरपेक्ष हैं। उन्होंने कहा कि मैं सिर्फ इसलिए रक्षात्मक नहीं हो सकता कि मेरी पत्नी भाजपा की सांसद हैं और इसलिए मुझ पर सवाल उठेंगे। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि जब घर में लड़ाई होती है तो उसे बातचीत कर सुलझाया जाता है। आज विदेशी अखबार हमारे देश की जो बदनामी कर रहे हैं वो बर्दाश्त से बाहर है। उन्होंने कहा कि पुरस्कार वापसी के पीछे बहुत बड़ा राजनीतिक एजंडा है। कुछ लोग हैं जो नरेंद्र मोदी को काम करने नहीं देना चाहते हैं।

फिल्मकार मधुर भंडारकर ने कहा कि मुझे भी पुरस्कार मिले हैं और मैं मानता हूं कि देश में कहीं भी असहिष्णुता नहीं है। यह किसी खास पार्टी की नहीं देश की बात है। उन्होंने हाल में पुरस्कार वापस करने वाले कुछ लोगों की ओर इशारा करते हुए कहा कि ये वही लोग हैं जिन्होंने चुनावों के पहले नरेंद्र मोदी को वोट नहीं देने की अपील की थी। हम विविधताओं से भरे देश में रहते हैं और यहां कुछ घटनाएं हुई हैं। लेकिन उनके आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि हमारी सहनशीलता में कोई कमी आई है। उन्होंने पूछा कि ’84 के दंगे, कश्मीरी पंडितों के विस्थापन, मुजफ्फरनगर दंगे या मुंबई दंगे के वक्त क्यों नहीं इस तरह की आवाज उठाई गई थी।

पूरे जुलूस में जोशो-खरोश से आवाज उठा रहीं मालिनी अवस्थी ने कहा कि हमारे साथ इतने लोग इसलिए आए हैं कि हिंदुस्तान की छवि खराब न हो। उन्होंने कहा, ‘क्या 2014 के पहले दंगे नहीं हुए थे? भारत से ज्यादा सहिष्णु देश पूरी दुनिया में कोई और नहीं है। भारत के लिए असहिष्णुता की बात करना एक मजाक है। कुछ खास लॉबी के लोग देश को बदनाम करने की साजिश कर रहे हैं और हमें देश को इस साजिश से बचाना है। वहीं रैली में तब असहज स्थिति हो गई जब कुछ प्रदर्शनकारी मीडिया के खिलाफ नारे लगाने लगे और उन्होंने पत्रकारों से धक्का-मुक्की की। ये लोग मीडिया पर पक्षपात का आरोप लगा रहे थे। बाद में खेर ने मीडियाकर्मियों से हुई बदसलूकी के लिए माफी मांगी।

खास हस्तियों की इस रैली में आम लोग स्वत:स्फूर्त जुट आए। गायकों और कलाकारों ने ढोल और डफली के साथ जब सुर छेड़ा तो उनके साथ युवाओं ने भी सुर मिलाया। सहिष्णुता और देश प्रेम के नारे लिखे पोस्टरों, बैनरों से रंगीन हुए राजपथ पर आम युवाओं ने भी देश का नाम बदनाम होने पर अपना गुस्सा निकाला। ये युवा इस बात से व्यथित थे कि हमारे घर के झगड़े का फायदा भारत के विरोधी उठा रहे हैं। हमें इतना असहिष्णु बताया जा रहा है कि जैसे सड़क से बाहर निकलते ही हमें मार दिया जाएगा। कॉलेज छात्र अंशुल ने गुस्से भरी आवाज में कहा कि पुरस्कार वापस करने वाले तो ऐसे लोग हैं जिनसे देश विरोधी बात करने के लिए पहले ही पुरस्कार छीन लेने चाहिए थे।

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