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दुनिया मेरे आगे: बातों की सेहत

चंद लोगों द्वारा छोटी-सी बात बिगाड़ कर कुछ ज्यादा ही दूर निकाल दी जाती है और बतंगड़ बना दी जाती है। भाषा को समझदारी से न बरतने के कारण बात की सही प्रवृत्ति और उचित अर्थ का कचूमर निकाल दिया जाता है। गलत मंचों पर बात के मनमाने मतलब निकालने वाले अपनी बात को मसाला लगा कर पकाने वाले कथित विशेषज्ञ आते हैं और सब कुछ, हर कुछ कहने के बाद भी कहते रहते हैं कि ‘हमको तो यह आदत है कि हम कुछ नहीं कहते’।

Author Updated: November 5, 2020 4:32 AM
आजकल हर चीज सोशल मीडिया के माध्‍यम से निपटाया जा रहा है।

संतोष उत्सुक

जब से होश संभाला, सुनता और पढ़ता आया हूं कि बात करना एक कला है। लेकिन आज की तारीख में बात की बात की जाए तो लगता है कि बात की सेहत खराब हो रही है। हालांकि बात कैसे की जाए, यह समझाने वाले बहुत से ‘व्यवसायी’ हो गए हैं, लेकिन लोग अब आमने-सामने बात कम करने लगे हैं। कह नहीं सकते कि सामने वाला व्यक्ति किस बात को सही परिप्रेक्ष्य में न लेकर कब गलत प्रतिक्रिया दे डाले और बात बिगड़ जाए।

आजकल बहुत सारी बातें सोशल मीडिया पर निपटाई जा रही हैं, जिनमें प्रयोग किए जा रहे अनुचित शब्द समाज में लिखित और व्यक्तिगत अभिव्यक्ति बिगाड़ रहे हैं। इससे आमतौर पर किसी का शारीरिक नुकसान तो नहीं होता, मगर इंसानी दिमाग की परेशानी और कुंठा बढ़ती जा रही है।

कई महीनों तक सिमटे रहने के बाद अब घर से निकलना शुरू हो गया है। यह अलग बात है कि कुछ बातें हमें कही जाती हैं तो वह हमें जरूरी लगती हैं, जो बहुत जरूरी बातें हम तक नहीं पहुंचती हैं, उन्हें हम खोजने और जानने की कोशिश नहीं करते। बस जो कह दिया जाता है, उसी पर अमल करना सुविधाजनक मान लेते हैं। सेहत से जुड़ी यह बात मान ली जाए तो इसका लाभदायक असर हो सकता है और दिवंगत जगजीत सिंह की गजल- ‘बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी’ फिर सही साबित हो सकती है, लेकिन आजकल बातों से दूसरे कई खतरे जुड़ गए लगते हैं।

चंद लोगों द्वारा छोटी-सी बात बिगाड़ कर कुछ ज्यादा ही दूर निकाल दी जाती है और बतंगड़ बना दी जाती है। भाषा को समझदारी से न बरतने के कारण बात की सही प्रवृत्ति और उचित अर्थ का कचूमर निकाल दिया जाता है। गलत मंचों पर बात के मनमाने मतलब निकालने वाले अपनी बात को मसाला लगा कर पकाने वाले कथित विशेषज्ञ आते हैं और सब कुछ, हर कुछ कहने के बाद भी कहते रहते हैं कि ‘हमको तो यह आदत है कि हम कुछ नहीं कहते’।

सोशल मीडिया पर बतियाने के सलीके का यह हाल हो गया है कि किसी की मौत पर अफसोस जताने के लिए ‘लाइक’ क्लिक कर या ‘आरआइपी’ चिपका कर अपनी समझ में संवेदनशील बात मान लिया जाता है। इससे बेहतर तो इस संबंध में निष्क्रिय रहना हो सकता है। हम अपने बच्चों को उम्र के हिसाब से अनुचित, स्तरहीन गानों पर नचा कर प्रसिद्धि हासिल करने के लिए सांस्कृतिक बात कर रहे हैं।

विकास की रोशनी ने अच्छी और बुरी बात का भेद छिपा दिया है। कभी-कभी वह गीत याद आता है- ‘मेरी बात के मानी (अर्थ) दो, जो अच्छा लगे उसे अपना लो, जो बुरा लगे उसे जाने दो’। इस सही बात का अर्थ अब यह लिया जा रहा है कि जो अच्छा लगे, उसे जाने दो और बुरा हो तो अपना लो, क्योंकि अब बुरी बात चलन में है।

जमाने से सुनते आए हैं कि दिल की बात मानो, मगर इंसान का दिमाग अपनी बात मनवाने के चक्कर में रहता है और अक्सर मनवा कर ही छोड़ता है। मन की बातें करने की जगह धन की बात, तन की बात करते हैं। मुहब्बत की बातें करने वाले नफरत की बात करते दिखते हैं। धर्म की बात करने वाले अधर्म की बात करने से बाज नहीं आते। जो मसला छोटी-सी बात करने से निपट सकता है उसे बड़ी-बड़ी बातों में उलझा कर फंसा दिया जाता है।

छोटे लोगों की छोटी बातें, बड़े लोगों की बड़ी बातें। ज्यादा बड़े लोगों की बातें ही बातें रह जाती हैं। इस उदासी, संक्रमण भरे वक्त में दिल बेगम अख्तर की गाई गजल ‘बात करनी कभी इतनी मुश्किल तो न थी’ बार बार गुनगुनाने लगता है ।

यह बात का बुरा वक्त ही है कि कलाकार भी नएपन के बहाने प्रसिद्धि और रोजी-रोटी के लिए अच्छी बातों से उकता गए हैं। ‘अच्छी बातें कर ली बहुत, अब मैं करूंगा गंदी बात’ जैसे गाने बनाए जा रहे हैं। अब एक बार बात करने से कोई मानता नहीं। बार-बार बात करो तो सुनने को मिलता है कि एक ही बात के पीछे पड़ जाते हो और बेचारी बात हो नहीं होती।

मौजूदा दौर में घरों में सिमटने के कारण यह सकारात्मक हो रहा है कि अधिकतर पत्नी और पतियों ने एक दूसरे से काफी बात करनी और समझनी शुरू कर ली है, लेकिन यह बात का चरित्र ही तो है कि आपस की बहुत बातें जीवन भर छिपी रह जाती हैं! बात सही तरीके से कह, सुन और समझ ली जाए तो बड़ी बात हो जाए, लेकिन बातें बनाने वाले बढ़ रहे हैं और बात करने वाले घट रहे हैं।

संचार का शासन फैलता जा रहा है और संवाद जेल भेज दिया गया है। दिमाग संचार में उलझ कर रह जाता है और जिंदगी संवरने में देर हो जाती है और बात की हालत सुधरती नहीं। किसी जमाने में ‘सौ बातों की एक बात’ कहते थे, अब एक बात की सौ से ज्यादा होने लगी हैं। बातें शब्दों से कम, लातों से ज्यादा करने लगे हैं। बात शब्दों का जंजाल होती जा रही है। ज्यादा बातें करो तो बंदा परेशान करने लगता है। इसलिए ‘आज की मुलाकात बस इतनी, कर लेना फिर कभी बातें चाहे जितनी’!

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