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आर्थिक हालात तो खराब हैं ही, डर का माहौल और खतरनाक है: पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह

पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा 'सरकारी पदों पर तैनात पॉलिसी मेकर्स और संस्थाएं आर्थिक हालातों पर बोलने से डर रहे हैं। मीडिया, न्यायपालिका, नियामक प्राधिकरण और जांच एजेंसियों जैसे स्वतंत्र संस्थानों में जनता का भरोसा बुरी तरह से चरमरा गया है।'

Manmohan singh, Economic conditions, gdp, congress, bjp, pm modi, UPA, NDA, economic slowdownपूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह। फोटो: Twitter/Congress

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश के आर्थिक हालातों पर एक बार फिर चिंता जाहिर की है। उन्होंने शुक्रवार को कहा कि देश के आर्थिक हालात तो खराब हैं ही, साथ ही देश में डर का माहौल और खतरनाक है। दिल्ली स्थित जवाहर भवन में अर्थव्यवस्था पर राष्ट्रीय सम्मेलन में अपने भाषण के दौरान पूर्व पीएम ने कहा कि किसी भी राष्ट्र में समाज को अर्थव्यवस्था से अलग नहीं किया जा सकता है।

मनमोहन सिंह ने यह बयान ऐसे समय पर दिया है जब देश में विनिर्माण क्षेत्र में गिरावट और कृषि क्षेत्र में पिछले साल के मुकाबले कमजोर प्रदर्शन से चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 4.5 प्रतिशत पर रह गई है। एक साल पहले 2018-19 की इसी तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर 7 प्रतिशत थी।

इन आंकड़ों का जिक्र करते हुए मनमोहन सिंह ने कहा, ‘पिछली दो तिमाही में जीडीपी की ग्रोथ रेट में गिरावट चिंताजनक है। हमारे देश में जीडीपी ग्रोथ रेट 8-9 फीसदी की दर से हो सकती है।’

उन्होंने कहा ‘हमारे समाज में आज डर का माहौल है। इसे डर को आत्मविश्वास में बदलने की जरूरत है। कई उद्योगपति मुझे बताते हैं कि वे सरकारी अधिकारियों द्वारा उत्पीड़न के डर के साये में रहते हैं। प्रतिशोध के डर से बैंकर नए ऋण लेने के लिए अनिच्छुक हैं। विपरीत परिणामों और असफलता के डर से उद्यमी नए प्रोजेक्ट शुरू करने में हिचकिचा रहे हैं। आर्थिक विकास और नौकरियों की दृष्टि से महत्वपूर्ण टेक्नॉलजी स्टार्ट-अप्स पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।’

पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा ‘सरकारी पदों पर तैनात पॉलिसी मेकर्स और संस्थाएं आर्थिक हालातों पर बोलने से डर रहे हैं। मीडिया, न्यायपालिका, नियामक प्राधिकरण और जांच एजेंसियों जैसे स्वतंत्र संस्थानों में जनता का भरोसा बुरी तरह से चरमरा गया है। गहरे अविश्वास, बढ़ता डर और हमारे समाज में निराशा की भावना का यह संयोजन आर्थिक गतिविधि को प्रभावित कर रहा है। एक देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति भी अपने समाज की स्थिति का प्रतिबिंब है। एक अर्थव्यवस्था लोगों और विभिन्न संस्थानों के बीच कई आदान-प्रदान और सामाजिक संबंधों का कार्य है।’

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