बीजेपी मणिपुर में आज सरकार बनाने का दावा पेश करेगी। युमनाम खेमचंद सिंह को बीजेपी विधायक दल का नेता चुना गया है और वह मणिपुर के नए मुख्यमंत्री होंगे। दिल्ली में मणिपुर के बीजेपी विधायकों की बैठक में यह फैसला लिया गया। बीजेपी ने अपने विधायकों और सहयोगी दल नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) और नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) के विधायकों को रविवार को दिल्ली बुलाया था।

राष्ट्रपति शासन लगने के लगभग एक साल बाद बीजेपी मणिपुर में सरकार बनाने जा रही है। नए सीएम उम्मीदवार पूर्व सीएम एन बीरेन सिंह के आलोचक हैं। बीजेपी ने यह फैसला अचानक नहीं लिया है। यह एक लंबी प्रक्रिया का नतीजा है जो मई 2023 में जातीय हिंसा से शुरू हुई। तत्कालीन सीएम बीरेन सिंह उसके बाद से लगातार राजनीतिक रूप से कमजोर होते हुए। उसके बाद तर्क दिया गया कि राष्ट्रपति शासन, हालांकि कुछ हद तक व्यवस्था बहाल कर सकता है।

बीरेन सिंह का राजनीतिक पतन कैसे हुआ?

मणिपुर में मई 2023 में मैतेई और कुकी समूहों के बीच जातीय हिंसा की शुरुआत में ही कुकी समूहों ने बीरेन सिंह पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए सीएम पद से उनके इस्तीफे की मांग शुरू कर दी थी। समय के साथ इस मांग की गूंज बीजेपी के अंदर भी सुनाई देने लगी। जैसे-जैसे हिंसा बढ़ती गई, अलग-अलग समुदायों के बीजेपी विधायकों की बढ़ती संख्या इस नतीजे पर पहुंची कि बीरेन सिंह अब राजनीतिक रूप से कमजोर हो रहे हैं।

2024 के आखिर तक यह आंतरिक असंतोष स्पष्ट हो गया था। 18 अक्टूबर 2024 को 19 बीजेपी विधायकों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर बीरेन सिंह को हटाने की मांग की। अपने पत्र में उन्होंने चेतावनी दी कि लोग शांति बहाल करने की सरकार की क्षमता पर सवाल उठा रहे हैं और कहा, “हम बीजेपी के कट्टर समर्थक होने के नाते और लोगों से जनादेश मिलने के बाद मणिपुर को बचाने के साथ-साथ राज्य में बीजेपी को पतन से बचाने की ज़िम्मेदारी महसूस करते हैं।” उन्होंने तर्क दिया कि सिर्फ सुरक्षा बलों की तैनाती से संकट हल नहीं होगा और बातचीत और सुलह पर ज़ोर दिया। उसी साल नवंबर में खेमचंद सिंह ने राज्य में कानून-व्यवस्था संकट और अशांति के बीच इस्तीफा देने से इनकार करने पर बीरेन सिंह की खुले तौर पर आलोचना की। उन्होंने कहा था, “मैंने उनसे दो-तीन बार इस्तीफा देने को कहा, लेकिन वह इस्तीफा नहीं दे रहे हैं। वह अब तक शांति नहीं ला पाए हैं, तो वह इस्तीफा क्यों नहीं दे रहे हैं?”

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बीरेन सिंह पर दबाव कैसे बढ़ा?

बीरेन सिंह पर दबाव उस महीने और बढ़ गया जब कॉनराड संगमा की नेशनल पीपल्स पार्टी (NPP) (जो उस समय राज्य में NDA की एक प्रमुख सहयोगी थी) ने सरकार के सामान्य स्थिति बहाल करने में नाकाम रहने का हवाला देते हुए और निर्दोष लोगों की जान जाने पर गहरी चिंता जताते हुए समर्थन वापस ले लिया। हालांकि बीजेपी के पास कागजों पर अभी भी बहुमत था, लेकिन राजनीतिक संदेश साफ था कि जमीनी स्तर पर समर्थन कम हो रहा था। उसी समय, मंत्रियों और विधायकों के घरों को जला रही भीड़ ने उन लोगों के गुस्से को दिखाया जो खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे थे।

बीजेपी के अंदर विधायकों के ग्रुप कई दिनों तक दिल्ली में डेरा डाले रहे, केंद्रीय नेतृत्व से मिलने की कोशिश करते रहे। उन्होंने बताया कि बीरेन सिंह ने पार्टी के ज़्यादातर विधायकों का भरोसा खो दिया है और चेतावनी दी कि अगर कोई बदलाव नहीं हुआ, तो वे अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन कर सकते हैं।

राष्ट्रपति शासन क्यों लगाया गया?

फरवरी 2025 में एक टर्निंग पॉइंट आया। कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव की आशंका और बीजेपी के बागी विधायकों के क्रॉस-वोटिंग के संकेत के बाद बीरेन सिंह ने 9 फरवरी 2025 को इस्तीफा दे दिया। इससे पहले 3 फरवरी को बीरेन सिंह सरकार में ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री खेमचंद सिंह नई दिल्ली पहुंचे थे और बीजेपी नेतृत्व को चेतावनी दी थी कि अगर मुख्यमंत्री को नहीं बदला गया तो सरकार गिर सकती है। राज्यपाल अजय भल्ला भल्ला ने 4 फरवरी को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर उन्हें स्थिति के बारे में बताया।

मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के एक और आलोचक पूर्व स्पीकर थोकचोम सत्यब्रत सिंह के बारे में भी पता चला कि वे उसी समय दिल्ली गए थे और उन्होंने तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष जे पी नड्डा को भी ऐसी ही राय दी थी। 13 फरवरी को राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया और विधानसभा को निलंबित रखा गया। इससे कानून-व्यवस्था बनाए रखने में मदद मिली, लेकिन इससे एक राजनीतिक शून्य भी पैदा हो गया।

विधायक क्यों वापस चाहते हैं सरकार?

अप्रैल 2025 से एक नया दौर शुरू हुआ। विधायक मुख्यमंत्री बदलने के लिए नहीं, बल्कि खुद एक चुनी हुई सरकार को बहाल करने के लिए दबाव डाल रहे थे। 29 अप्रैल 2025 को 21 NDA विधायकों ने प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री को एक ‘लोकप्रिय सरकार’ बनाने की मांग करते हुए पत्र लिखा। हस्ताक्षर करने वालों में बीरेन सिंह या उनके करीबी माने जाने वाले विधायक शामिल नहीं थे। उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्रपति शासन से उम्मीदों के बावजूद, शांति और सामान्य स्थिति लाने के लिए कोई ठोस कार्रवाई नहीं दिख रही थी।

मई में विधायकों के एक समूह ने राज्यपाल से मुलाकात की, जिसमें 44 विधायकों के समर्थन का दावा किया गया। उन्होंने उनसे कहा कि राष्ट्रपति शासन एक आपातकालीन कदम है और यह आखिरी उपाय होना चाहिए। विधायकों को लगा कि अगर वे केंद्र सरकार के शासन में सिर्फ दर्शक बने रहे तो वे अगले चुनाव में जनता का सामना नहीं कर पाएंगे।

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केंद्र शुरू में हिचकिचा क्यों रहा था?

2025 तक केंद्र का आकलन था कि राष्ट्रपति शासन ने सामान्य स्थिति का आभास कराया है और एक अस्थिर सरकार नाजुक शांति प्रयासों को पटरी से उतार सकती है। पहाड़ियों और घाटियों में आवाजाही पर अभी भी विवाद था और हथियारबंद गुटों के साथ बातचीत जारी थी। कुकी गुटों के साथ आवाजाही को मुमकिन बनाने के लिए समझौते और सस्पेंशन ऑफ़ ऑपरेशंस व्यवस्था को फिर से शुरू किया गया। इसके बाद पीएम मोदी का सितंबर 2025 में राज्य का दौरा हुआ।ये सब घटनाक्रम सामान्य स्थिति में लौटने के संकेत के तौर पर दिखाया गया।

राजनीतिक तौर पर भी बीजेपी नेतृत्व ने ज़्यादा सीधे तौर पर जुड़ना शुरू कर दिया। सीनियर नेताओं ने इम्फाल और दिल्ली में सभी समुदायों के विधायकों के साथ बैठकें कीं। हालांकि अगर केंद्र राष्ट्रपति शासन को एक साल आगे बढ़ाता तो विधानसभा भंग करनी पड़ती।

किन चुनौतियां का करना होगा सामना?

हालांकि अभी बनने वाली नई सरकार को काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। यह एक ऐसे राज्य में काम करेगी जो अभी भी सामाजिक रूप से बंटा हुआ है, जिसमें विस्थापित आबादी है, कुछ हिस्सों में आवाजाही सीमित है, हथियार खत्म करने का काम अधूरा है और पीड़ित होने की अलग-अलग कहानियां हैं। लगभग एक साल में विधानसभा चुनाव होने हैं, इसलिए नए नेतृत्व का मुख्य काम लोगों का भरोसा फिर से बनाना होगा कि चुने हुए प्रतिनिधि रिकवरी की बागडोर संभाल रहे हैं।

इसका मतलब है पुनर्वास पर साफ कदम उठाना, रास्ते फिर से खोलना, समुदायों के बीच राजनीतिक बातचीत, और सुरक्षा उपायों में पारदर्शिता लाना होगा। आखिरकार इस सरकार की सफलता का आकलन सिर्फ विधानसभा में बने रहने से नहीं, बल्कि इस बात से किया जाएगा कि क्या आम लोगों को यह महसूस होने लगा है कि मणिपुर में सिर्फ पुलिसिंग नहीं, बल्कि राजनीति भी वापस आ गई है। पढ़ें- मणिपुर से पीएम मोदी ने क्या संदेश दिया था?