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मणिशंकर अय्यर का ब्‍लॉग: मैंने क्‍यों कहा कि मोदी के पीएम रहते पाकिस्‍तान से बातचीत मुमकिन नहीं

मैंने 20 नवंबर को छपे एमजे अकबर के लेख ‘What Mr Aiyar won’t say‘ को बड़ी दिलचस्‍पी से पढ़ा। कटाक्ष को अलग कर दें तो बहस का मुख्‍य मुद्दा यही है कि मैं जो कहा, वो एक गलती थी, गलती क्‍या एक पाप था। मैंने जो कहा कि पाकिस्‍तान के साथ सही रिश्‍तों की तलाश […]

मणिशंकर अय्यर

मैंने 20 नवंबर को छपे एमजे अकबर के लेख ‘What Mr Aiyar won’t say को बड़ी दिलचस्‍पी से पढ़ा। कटाक्ष को अलग कर दें तो बहस का मुख्‍य मुद्दा यही है कि मैं जो कहा, वो एक गलती थी, गलती क्‍या एक पाप था। मैंने जो कहा कि पाकिस्‍तान के साथ सही रिश्‍तों की तलाश के रास्‍ते में पीएम नरेंद्र मोदी एक बड़े रोड़ा हैं। एमजे अकबर ने पाकिस्‍तान से बातचीत के लिए दूरी बनाने की जो भी वजहें बताई हैं, वो सारी की सारी 26 मई 2014 को भी मौजूद थीं। वो दिन जब मोदी ने अपने शपथग्रहण कार्यक्रम में पाक पीएम नवाज शरीफ को बुलाया था। यह तय हुआ था कि दोनों सरकारें विदेश सचिव स्‍तर पर बातचीत करेंगे। कोई शर्त नहीं रखी गई। हुर्रियत का तो जिक्र तक नहीं आया।

यह पहल उस वक्‍त नाकाम हो गई, जब भारत सरकार ने पाकिस्‍तान हाई कमिश्‍नर से कहा कि वे मीटिंग से पहले हुर्रियत से किसी किस्‍म का सलाह मशविरा न करें। हुर्रियत और पाक अफसरों की इस तरह की मुलाकातें बीते दो दशक से चल रही हैं। इससे पाकिस्‍तान का कुछ भला तो हुआ लेकिन भारत का कोई नुकसान नहीं हुआ। देखा जाए तो यह पाकिस्‍तान पर मीटिंग से कुछ वक्‍त पहले एकतरफा शर्त थोपी गई। अगर यह मोदी के लिए इतनी बड़ी शर्त थी, तो उन्‍होंने नवाज से पहली मुलाकात में ही इसका जिक्र करना चाहिए था। अगर उस वक्‍त मुमकिन नहीं था तो राजनयिक चैनल के हवाले से मीटिंग से काफी पहले पाकिस्‍तान को इत्‍त‍िला करना चाहिए था। जब पाकिस्‍तान से आखिरी वक्‍त में आदेश के अंदाज में कहा गया कि वे हुर्रियत से बातचीत न करें तो जो हुआ उसका अंदाजा लगाना मुश्‍कि‍ल नहीं था। पाकिस्‍तान भारत की इस जबरदस्‍ती के आगे नहीं झुका और बातचीत से पीछे हट गया। किसी भी द्विपक्षीय बातचीत की आत्‍मा एक दूसरे की संप्रभुता का सम्‍मान करना है। इसके बाद, दोनों पीएम उफा में मिले। पहले से कोई तैयारी नहीं थी। यह मोदी का आखिरी मिनट में लिया हुआ फैसला था ताकि‍ वे विदेश नीति के मामले पर अपनी निजी दखल जाहिर कर सकें। हुर्रियत जैसे जटिल मुद्दों से निपटने के लिए पहले से कोई तैयारी नहीं की गई। इस मुलाकात के बाद निश्‍च‍ित तौर पर दोनों देशों के बीच एनएसए स्‍तर की बातचीत पर सहमति बनी, जो बाद में रद्द करनी पड़ी। हम वहीं हैं, जहां थे।

मोदी की वजह से भारत ने पाकिस्‍तान से साफ कर दिया कि अगर वे हुर्रियत से बातचीत करेंगे तो उनसे कोई बात नहीं होगी। इसके बाद, पाकिस्‍तान ने भी अपना रुख साफ कर दिया। उसने कहा कि अगर वे हुर्रियत से बातचीत नहीं कर सकते तो हमसे भी बातचीत नहीं करेंगे। इस वजह से हालात जस के तस रहे। इसके लिए सिर्फ मोदी जिम्‍मेदार हैं क्‍योंकि उन्‍हें पूर्व की परंपरा को तोड़ा है और बातचीत के लिए शर्त रख दी, जिसे पूरा नहीं किया जा सकता। ऐसे में यह निष्‍कर्ष निकालना क्‍या गलत है कि मोदी के पीएम रहते बातचीत को आगे बढ़ाना मुमकिन नहीं है? चूंकि अगले चार साल तक मोदी ही पीएम बने रहेंगे, यह मानने में कोई हर्जा नहीं कि बातचीत के मामले में अगले चार साल तक बात आगे नहीं बढ़ने वाली। कोई नहीं जानता कि दोनों देशों के बीच पर्दे के पीछे बातचीत कितनी आगे बढ़ी। मोदी सरकार से पहले बैक चैनल में जो कुछ हुआ, उसकी फाइल्‍स और रिकॉर्ड पहले से मौजूद हैं। मोदी को बस वहीं से शुरुआत करनी है, जहां तक हम पहुंच चुके थे। हालांकि, 18 महीने गुजर चुके हैं। यह साफ हो चुका है कि उनकी ऐसी कोई मंशा नहीं है।

क्‍या इस बात की संभावना है कि मोदी अपने चरि‍त्र में इतना बदलाव करेंगे कि अपने से पहले के पीएम के अच्‍छे काम की सराहना कर सकें? अगर ऐसा नहीं है तो मोदी सरकार के बाकी बचे सालों में भारत और पाकिस्‍तान के बीच एक अर्थपूर्ण और ठोस बातचीत की क्‍या उम्‍मीद की जाए? यह सवाल अब पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुका है कि मनमोहन सिंह अपने दस साल के शासन के दौरान पाकिस्‍तान क्‍यों नहीं गए? इसका जवाब यह है कि मनमोहन मोदी की तरह विदेश नीतियों को अपने ढंग से चलाते थे। उनका मानना था कि पूरी तैयारी के बाद ही मुलाकात की जाए। ऐसी ही तैयारियों के बाद मार्च 2007 में उनके इस्‍लामाबाद जाने का कार्यक्रम तय हुआ। हालांकि, उस वक्‍त मुशर्रफ अपने ही देश के न्‍यायपालिका से उलझे पड़े थे, जिसकी वजह से यह मुलाकात नहीं हो सकी।

बहुत ही चपलता के साथ अकबर ने अपने नए मालिकों की जुबान सीख ली है। वे हम पर तुष्ट‍िकरण की आवाज बनने का आरोप लगाते हैं। पाकिस्‍तान के साथ सार्थक बातचीत की पहल तुष्‍ट‍िकरण नहीं है। यह मानने के लिए कि बीजेपी के सत्‍ता में रहते इस तरह की सार्थक बातचीत मुमकिन नहीं है, किसी को बस आखिरी 18 महीनों के खराब रिकॉर्ड पर नजर भर डालनी है। यह वो बात है, जिसका जिक्र अकबर नहीं करेंगे।

(लेखक कांग्रेस के राज्‍यसभा सांसद हैं)

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