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सामयिक : राग विराग

गौरतलब यह कि जिस परिवार संस्था को बचाए रखने के लिए भारतीय समाज की चर्चा दुनियाभर में होती है, उस परिवार के कलह के कारण भी देश में बहुत सारे लोग आत्महत्या कर रहे हैं। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि भारत में आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह पारिवारिक कलह है। इस कारण 26 फीसद लोगों ने अपनी जीवनलीला समाप्त करने जैसा घातक फैसला लिया।

Author Updated: November 25, 2020 1:39 AM
Dagnosisअवसाद से लोग हो रहे हैं बीमार। फाइल फोटो।

मनुष्य के पास कल्पना से लेकर संवेदना तक सब कुछ है। वह धरती के तमाम जीवों के मुकाबले सर्वाधिक चेतना संपन्न भी है। बावजूद इसके जीवन के प्रति निराशा जैसी स्थिति अगर आज एक प्रवृत्ति की शक्ल लेती जा रही है तो यह चिंता बढ़ाने वाली बात है। आत्महत्या को लेकर देश के अंदर और बाहर बन रहे हालात और उनसे जुड़े तमाम तथ्यगत हवालों पर आज का विशेष प्रेम प्रकाश

निराला साहित्य के अध्येता डॉ रामविलास शर्मा ने उनकी कविताओं का ‘राग विराग’ नाम से एक संकलन तैयार किया है। इस संकलन की कविताएं निराला के काव्य वैविध्य के साथ उन तमाम मनोदशाओं से भी हमें परिचित कराती हैं, जिससे गुजरते हुए उन्होंने काव्य लेखन किया। इस पुस्तक में ‘राम की शक्तिपूजा’ सरीखी कविता भी शामिल है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इस कविता को निराला ने जीवन के उस दौर में लिखा था जब जीवन के प्रति वे मोहभंग जैसी मनोदशा में पहुंच गए थे।

पर अच्छी बात यह कि जीवन के प्रति ‘राग’ अंतत: उसके प्रति ‘विराग’ पर न सिर्फ भारी पड़ता है बल्कि यह एक कवि की दिव्य अक्षर चेतना को जन्म भी देता है। मौजूदा हालात में इन बातों का जिक्र इसलिए कि जीवन के प्रति मोहभंग जैसे हालात आज आपवादिकता से आगे वैयक्तिक-सामाजिक प्रवृत्ति के तौर पर रेखांकित किए जा रहे हैं। एक ऐसे दौर में जब आधुनिकता का उत्तर सर्ग लिखा जा रहा हो, विकास और समृद्धि के आरेख गगनचुंबी हो रहे हों, विज्ञान और तकनीक मिलकर मानवीय सभ्यता का घोषित तौर पर श्रेष्ठ अनुशीलन रच रहे हों; जीवन के प्रति हताशा अगर एक प्रवृत्ति के तौर पर पहचानी जा रही है तो यह वाकई चिंता में डालने वाली बात है।

आत्महंता आस्था

दिलचस्प है कि कोराना संकट ने सेहत के मोर्चे पर मनुष्य के लिए जो चुनौती पेश की है, वह तो अहम और जटिल है ही, इस संकट से उबरने के जो वैकल्पि रास्ते हो सकते थे, उस पर हमने पहले ही ताले जड़ने शुरू कर दिए। अवसाद से लेकर अकेलेपन तक कई ऐसे हालात हैं जो अमीर से अमीर और गरीब से गरीब देश में जीवन के प्रति आत्महंता आस्था या दृष्टिकोण के तौर उभार पा रहे हैं। बात करें अकेले भारत की तो 2018 में आई विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट ने चेतावनी दी थी कि भारत में खुदकुशी महामारी का रूप लेती जा रही है। दुनिया के शीर्ष 20 देश जहां लोग हर पल अपनी जान देने को उतारू रहते हैं, उनमें भारत का नाम शामिल है।

एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 2019 में 1,39,123 लोगों ने खुदकुशी की यानी देश में हर रोज करीब 381 लोगों ने अपनी जिंदगी खुद खत्म कर ली। 2018 की तुलना में देश में खुदकुशी की दर करीब 3.4 फीसद ज्यादा है। सीधा मतलब है कि आत्महत्या की प्रवृति बढ़ी है। 2019 में भारतीय शहरों में आत्महत्या की दर 13.9 फीसद रही, जो पूरे भारत में आत्महत्या की दर 10.4 फीसद से अधिक थी। साफ है कि सभ्यता से लेकर संपन्नता तक जिन पैमानों पर हम आज जीवन की खुशहाली या समाज का विकास रेखांकित करते हैं, वे पैमाने जीवन को संत्रास की तरफ घातक तरीके से ले जा रहे रूझानों पर पूरी तरह खामोश हैं। यह मौन और अज्ञान हमारी समझ का भी है।

पारिवारिक फंदा

गौरतलब यह कि जिस परिवार संस्था को बचाए रखने के लिए भारतीय समाज की चर्चा दुनियाभर में होती है, उस परिवार के कलह के कारण भी देश में बहुत सारे लोग आत्महत्या कर रहे हैं। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि भारत में आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह पारिवारिक कलह है। इस कारण 26 फीसद लोगों ने अपनी जीवनलीला समाप्त करने जैसा घातक फैसला लिया। बीमारी के कारण 19, वैवाहिक वजहों से 11, बेरोजगारी के कारण छह फीसद, नशे की लत के कारण पांच और अन्य दूसरी वजहों से 24 फीसद लोगों ने खुदकुशी की। 2019 में सबसे ज्यादा मध्य प्रदेश में 12,457 लोगों ने आत्महत्या की। तमिलनाडु में 13,493 और पश्चिम बंगाल में 12,665 आत्महत्या के मामले बाद राज्य चौथे स्थान पर है।

समझ पर सवाल

खुदकुशी को लेकर जो नए तथ्य और आंकड़े सामने आए हैं, वह देश के हालात और आत्महत्या जैसी समस्या को लेकर हमारी समझ और धारणा को तथ्यगत आधार पर खारिज करते हैं। आमतौर पर लोग मानते हैं कि खुदकुशी की सबसे बड़ी वजह बेरोजगारी है या किसान तुलनात्मक रूप से सबसे ज्यादा खुदकुशी करते हैं। जबकि तथ्यगत स्थिति ऐसी नहीं है। एनसीआरबी के मुताबिक करीब 32.4 फीसद मामलों में लोगों ने पारिवारिक समस्याओं के चलते अपनी जिंदगी खत्म की तो 17.1 फीसद लोगों ने बीमारी से परेशान होकर ये खौफनाक फैसला लिया, वहीं 5.5 फीसद लोगों ने वैवाहिक समस्याओं के कारण और 4.5 फीसद लोगों ने प्रेम संबंधों को लेकर जान दे दी। करीब दो फीसद लोगों की आत्महत्या करने की वजह बेरोजगारी और परीक्षा में असफलता रही। 5.6 फीसद लोगों ने नशे में फंसकर अपनी जान गंवार्ई। मानव सभ्यता के इतिहास में आत्महत्या कोई नई बात नहीं है।

सभ्यता के अलग-अलग चरणों में आत्महत्या के बढ़े आंकड़े लोगों को चौंकाते रहे हैं। पर बीते दो दशक में जिस तरह के हालात पूरी दुनिया में बने हैं, वे वाकई परेशान करने वाले हैं। एक तो इस दौरान आत्महत्या की संभावित वजहों में बड़ा फर्क आया है, वहीं यह समस्या हर देश में अलग-अलग रूप में सिर उठा रही है। इस खतरे को भांपते हुए इंटरनेशनल असोसिएशन आॅफ सुसाइड प्रिवेंशन (आइएएसपी) ने 2003 में आत्महत्या के बढ़ते मामलों पर लगाम लगाने के लिए विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाए जाने की शुरुआत की। आइएएसपी हर साल 10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस का आयोजन करती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इसमें भागीदार है। इस तरह के प्रयास की जरूरत कोरोनाकाल में इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि इस दौरान पूरी दुनिया में अवसाद काफी गहराया है। लोग अगर एक तरफ अपनी सेहत से जूझ रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ अचानक आजीविका छिन जाने से बने हालात ने लोगों को तोड़ कर रख दिया है। विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस हर साल अलग-अलग थीम के अनुसार मनाया जाता है। पर कोरोना के संकट को देखते हुए इस बार खास तैयारी की गई और बहुत सोच-समझकर इस साल इस दिवस का सबक आत्महत्या के मामलों को रोकने के लिए साथ मिलकर आगे आना और इसे रोकने पर काम करना तय किया गया।

फंदे से झूलती घड़ी

महामारी के मौजूदा संकट के पहले से विश्व स्वास्थ्य संगठन इन आंकड़ों के साथ चेताता रहा है कि विश्व में हर 40 सेकंड में एक शख्स खुदकुशी करता है। इसी तरह हर साल तकरीबन आठ लाख से अधिक लोग अलग-अलग कारणों से अपनी जान दे देते हैं। पर कोरोनाकाल में यह स्थिति जाहिर तौर पर और भयावह हुई है। इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों के बर्ताव से खुलासा हुआ है कि भारत में पूर्णबंदी की घोषणा के बाद से ही ‘सुसाइड’ शब्द को लेकर लोगों ने सबसे ज्यादा इंटरनेट खंगाला।

एक अध्ययन के मुताबिक भारत में कोरोना के समय संक्रमण के अलावा जिन कारणों से सबस ज्यादा मौतें हो रही हैं, उनमें खुदकुशी दूसरा सबसे बड़ा कारण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ दुनिया भर के मनोचिकित्सकलगातार इस बात को लेकर आगाह करते रहे हैं हमारी सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था का आधार इस दौरान जिन वजहों से चरमराया है, उससे अवसाद का साया आगे और गहरा सकता है। नतीजतन जीवन को लेकर ‘विराग’ या ‘मोहभंग’ जैसे आत्मघाती फैसले लेने वालों की संख्या आने वाले दिनों में और बढ़ सकती है।

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