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मोदी को शिकस्त देने की तैयारी कर रहीं ममता बनर्जी, जल्द सोनिया गांधी से कर सकती हैं मुलाक़ात

भाजपा चुनाव तंत्र की ताकत के सामने हासिल की गई जीत ने अगले आम चुनाव में विपक्षी मोर्चे में ममता बनर्जी की एक बड़ी भूमिका निभाने की अटकलों को हवा दे दी है।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी। (एक्सप्रेस फोटो)।

बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 25 जुलाई को दिल्ली में होंगी। बनर्जी की दिल्ली यात्रा को 2024 के लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। सूत्रों से यह जानकारी मिली है। मई में बंगाल विधानसभा चुनाव में शानदार जीत के बाद ममता बनर्जी की यह पहली दिल्ली यात्रा है।

भाजपा चुनाव तंत्र की ताकत के सामने हासिल की गई जीत ने अगले आम चुनाव में विपक्षी मोर्चे में ममता बनर्जी की एक बड़ी भूमिका निभाने की अटकलों को हवा दे दी है। सूत्रों ने कहा कि यात्रा के दौरान बनर्जी कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव, आम आदमी पार्टी के प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सहित कई विपक्षी नेताओं से मुलाकात करेंगी।

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की शरद पवार के साथ दो मुलाकातों से शुरू होकर पिछले महीने राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। हालांकि, राकांपा प्रमुख ने कहा कि इस सप्ताह की शुरुआत में किशोर के गांधी परिवार के साथ चार घंटे की बैठक में राजनीति पर बात नहीं हुई थी। जिससे उनके पार्टी में शामिल होने की अटकलें तेज हो गईं हैं।

सूत्रों ने कहा कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ बातचीत यह बताती है कि कांग्रेस में प्रशांत किशोर को रणनीतिकार की भूमिका मिल सकती है क्योंकि पार्टी अगले साल होने वाले राज्य चुनावों और तीन साल बाद होने वाले आम चुनाव के लिए तैयारी कर रही है।

बनर्जी की यात्रा संसद के मानसून सत्र के साथ भी होगी, जहां विपक्षी कांग्रेस द्वारा कोविड से निपटने और महंगाई सहित कई मुद्दों पर सरकार को निशाना बनाने की उम्मीद है। संसद सत्र से पहले विपक्ष का रणनीति सत्र इस बार कोविड महामारी के कारण नहीं हुआ है।

इससे पहले तीसरे मोर्चे के गठन की अटकलों के बीच शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा कि 2024 के आम चुनावों में बीजेपी का मुकाबला करने के लिए सभी विपक्षी दलों को एक साथ लाना और किसी एक चेहरे पर आम सहमति बनाना मुश्किल काम है क्योंकि हर क्षेत्रीय दल खुद को राजा मानता है और अपने ‘‘हिसाब से चीजों को तय करने की कोशिश करता है।’’

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