पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को भारी हार का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में उन प्रमुख कारकों पर ध्यान केंद्रित हो रहा है जो तीन दशक लंबे कम्युनिस्ट शासन को समाप्त करने के 15 साल बाद उनकी हार का कारण बने।

इस परिवर्तन और 2011 के उस परिवर्तन में कई समानताएं हैं। जिसके कारण तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई थी। दोनों ही मामलों में सत्ताधारी दल का नेतृत्व जमीनी स्तर पर व्याप्त असंतोष को भांपने और समय रहते कार्रवाई करने में विफल रहा। और ममता बनर्जी ने भी कम्युनिस्टों की तरह विपक्ष के बढ़ते समर्थन को कम करके आंका। नतीजा: एकतरफा जीत।

यह बदलाव धीरे-धीरे नहीं हुआ। 2024 के लोकसभा चुनावों में, ममता बनर्जी की पार्टी ने अपनी सीटों की संख्या में 7 की वृद्धि की और बंगाल की 42 संसदीय सीटों में से 29 पर जीत हासिल की। ​​भाजपा को झटका लगा और उसकी सीटों की संख्या 18 से घटकर 12 हो गई। लेकिन इसके बाद के 23 महीनों में कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं ने बंगाल के मतदाताओं को निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया, जिससे मौजूदा तृणमूल सरकार का भविष्य तय हो गया।

आरजी कर अस्पताल में बलात्कार-हत्या

अगस्त 2024 में, टीएमसी की लोकसभा में बड़ी जीत के कुछ महीनों बाद, कोलकाता के सरकारी आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में एक महिला डॉक्टर की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई। इस घटना ने बंगाल और पूरे देश में व्यापक आक्रोश पैदा किया और हजारों लोग टीएमसी सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतर आए। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार ने पहले तो इस घटना को कम करके आंकने की कोशिश की और फिर इसे प्रतिद्वंद्वी दलों द्वारा रची गई “राजनीतिक साजिश” के रूप में पेश करने की कोशिश की। जब आक्रोश ज्यादा बड़ा तो मुख्यमंत्री ममता ने पीड़िता के लिए न्याय की मांग करते हुए एक रैली का नेतृत्व किया। लेकिन नुकसान हो चुका था।

इस मुद्दे पर उनके अनिश्चित रुख का असर अस्पताल प्रशासन और उनकी पार्टी के बीच राजनीतिक सांठगांठ के आरोपों के बीच देखने को मिला, जिस पर सबूतों से छेड़छाड़ और मामले को दबाने का भी आरोप लगा था। सरकार को जिम्मेदारी से बचने का प्रयास करते देखा गया, और ऐसा लगता है कि इसका मतदाताओं पर गहरा प्रभाव पड़ा है।

शिक्षकों की भर्ती घोटाले पर फैसला

आरजी कर कांड के महीनों बाद, अप्रैल 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें राज्य विद्यालय सेवा आयोग द्वारा नियुक्त 25,000 से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति रद्द कर दी गई थी। यह फैसला ममता सरकार के लिए एक बड़ा झटका था। जिसने जनता के मन में पार्थ चटर्जी से जुड़े परिसरों से बरामद नोटों के बंडलों की तस्वीरें ताजा कर दीं। पार्थ चटर्जी ममता के विश्वसनीय सहयोगी और बंगाल के पूर्व शिक्षा मंत्री थे।

सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि पूरी चयन प्रक्रिया “पूरी तरह से दूषित और भ्रष्टाचार से ग्रसित” थी। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “चयन की विश्वसनीयता और वैधता पूरी तरह से खत्म हो गई है।” ममता बनर्जी ने बर्खास्त शिक्षकों को राहत देने का वादा किया, लेकिन भ्रष्टाचार का दाग उन पर बना रहा।

शासन व्यवस्था की विफलताएं और ‘सिंडिकेट’

ममता सरकार की शासन व्यवस्था में आई नाकामियों को लेकर बढ़ते असंतोष ने टीएमसी को करारा झटका दिया। प्रतिद्वंद्वियों ने पार्टी की राज्य में भारी उद्योग लाने और पर्याप्त रोजगार पैदा करने में विफलता को मुद्दा बनाया। ‘सिंडिकेट’, यानी वह तंत्र जिसके ज़रिए टीएमसी नेता बुनियादी ढांचे के ठेकों से लेकर फिल्म उद्योग तक हर चीज को कथित तौर पर नियंत्रित करते थे। चर्चा का विषय बन गया। भाजपा के शीर्ष नेताओं ने “कट मनी” की बात की, यानी हर सौदे में टीएमसी नेताओं का कथित “हिस्सा”।

अल्पसंख्यक वोटों का विभाजन

बंगाल चुनाव के नतीजों में एक दिलचस्प बात सामने आई है। पूर्व टीएमसी विधायक हुमायूं कबीर के नेतृत्व वाली आम जनता उन्नयन पार्टी और नौशाद सिद्दीकी के नेतृत्व वाले इंडियन सेकुलर फ्रंट, दोनों ने जीत हासिल की है। कबीर ने अपने दोनों निर्वाचन क्षेत्रों से जीत दर्ज की है। ये दोनों पार्टियां अल्पसंख्यक वोटों पर पकड़ बनाती हैं, क्योंकि इस राज्य में चुनावी दृष्टि से उनका समर्थन बेहद महत्वपूर्ण है। इसका सीधा मतलब है कि ममता बनर्जी के अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध लग गई है। ममता के सहयोगी से कट्टर प्रतिद्वंद्वी बने सुवेंदु अधिकारी ने मतगणना के शुरुआती दौर में कहा था कि भले ही भाजपा के पक्ष में हिंदू वोटों का एकीकरण हुआ है, लेकिन टीएमसी का अल्पसंख्यक आधार टूट गया है।

दीदी ने 2011 से सबक नहीं सीखा

ममता बनर्जी ने बंगाल में 34 साल के शासन के बाद वाम मोर्चे को सत्ता से बेदखल कर दिया, लेकिन बंगाल चुनाव को लेकर आए नतीजे बताते हैं कि उन्होंने अपने पूर्ववर्तियों की कई गलतियों को दोहराया। इनमें सबसे बड़ी गलती अपनी पार्टी पर लगाम लगाने में उनकी विफलता थी। वाम शासन के दौरान पार्टी सरकार से भी बड़ी हो गई थी। अनजाने में ममता ने अपनी पार्टी के साथ भी ऐसा ही होने दिया। राष्ट्रीय स्तर पर भूमिका निभाने के लिए जोर देने और यहां तक ​​कि इंडिया गठबंधन का नेतृत्व करने की दावेदारी पेश करने के कारण शासन व्यवस्था पीछे छूट गई। शासन से लेकर विकास और मनोरंजन तक, जीवन के सभी पहलुओं पर टीएमसी की एकाधिकारवादी पकड़ ने राज्य के मतदाताओं, विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में रहने वाले मतदाताओं को उनसे अलग कर दिया।

बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में टीएमसी से कैसे सत्ता छीनी? ये रही प्रंचड जीत की 5 बड़ी वजह

पश्चिम बंगाल में बीजेपी का सपना आखिरकार पूरा होने जा रहा है। पार्टी ने विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया है और वह अपने दम पर बहुमत (148) से कहीं ज्यादा सीटें जीतने में कामयाब होती दिख रही है। वैसे तो पार्टी की जीत के लिए कई वजहों को गिनाया जा रहा है लेकिन पांच ऐसे बड़े कारण हैं जिनके चलते वह टीएमसी को पश्चिम बंगाल की सत्ता से हटा सकी है। पढ़ें पूरी खबर।