Mamata Banerjee Restructuring TMC: पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में बीजेपी की बड़ी जीत हुई है और शुभेंदु अधिकारी राज्य के पहले भाजपाई मुख्यमंत्री बन गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की नए दौर की बीजेपी ने पूर्व सीएम ममता बनर्जी का किला ध्वस्त कर दिया है। इसके बाद ममता बनर्जी लगातार अपनी पार्टी के नए तरह से संगठित कर रही हैं।

खास बात यह भी है कि ममता बनर्जी पुराने नेताओं को बढ़ावा दे रही हैं, जबकि पार्टी में दूसरे नंबर के नेता अभिषेक बनर्जी के खेमे के नेताओं को कोई जगह नहीं मिल रही है। पिछली टीएमसी सरकार में अभिषेक खेमे के कई नेता पार्टी में थे। टीएमसी के कई पुरानी पीढ़ी के नेताओं ने दबे मुंह अभिषेक बनर्जी के खेमे पर चुनाव में हार से जुड़े गंभीर आरोप भी लगाए थे।

2021 के बाद अभिषेक ने मजबूत की थी पकड़

साल 2021 के विधानसभा चुनावों में टीएमसी की शानदार जीत के बाद अभिषेक ने संगठन के भीतर युवा नेताओं के अधिक प्रतिनिधित्व के लिए जोर दिया था। 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले भी उन्होंने सुदीप बंद्योपाध्याय और सौगता रॉय जैसे वरिष्ठ नेताओं को टिकट न देने की कोशिश की थी, लेकिन ममता बनर्जी ने अपने पुराने नेताओं को तव्ज्जो दी थी। इसके चलते नेताओं को पुराने नेताओं को टिकट दिया था।

इस बार के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने कम से कम 74 मौजूदा विधायकों की जगह नए चेहरों को टिकट दिया। इसे कई नेताओं ने निजी तौर पर स्वीकार किया कि इससे कई निर्वाचन क्षेत्रों में आंतरिक असंतोष और गुटबाजी को बढ़ावा मिला। अभिषेक को राजनीतिक परामर्श फर्म आई-पीएसी को लाने और उसका समर्थन करने वाले नेता के रूप में भी देखा जाता था, जिसने पार्टी को 2021 के चुनाव में जीत दिलाने में मदद की थी।

सवालों के घेरे में I-PAC की भूमिका

हालांकि, इस बार I-PAC की भूमिका सवालों के घेरे में आ गई है, और कई नेता इसके काम करने के तरीके की आलोचना कर रहे हैं। I-PAC की आलोचना करने वाले नवीनतम नेता पार्टी के श्रीरामपुर सांसद कल्याण बंद्योपाध्याय हैं, जिनका अतीत में अभिषेक के साथ विवाद रहा है। उन्होंने हाल ही में आनंदबाजार पत्रिका को दिए एक साक्षात्कार में आरोप लगाया कि टीएमसी की हार के लिए राजनीतिक परामर्श फर्म का चुनावी प्रबंधन जिम्मेदार था और पार्टी संगठन की कीमत पर इसे महत्व दिया गया था।

बालीगंज के विधायक चट्टोपाध्याय एक अनुभवी टीएमसी नेता हैं और कई बार भाबानीपुर का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। उन्होंने पिछली राज्य सरकारों में कई मंत्री पद संभाले हैं और पार्टी के भीतर उन्हें एक अनुभवी संसदीय नेता के रूप में देखा जाता है, जो 294 सदस्यीय सदन में विपक्ष का नेतृत्व करने में सक्षम हैं, जहां बीजेपी को 207 विधायकों के साथ स्पष्ट बहुमत प्राप्त है।

TMC में बड़े बदलाव के संकेत

टीएमसी के वरिष्ठतम विधायकों में से एक फिरहाद हकीम ने ममता बनर्जी के भाबानीपुर निर्वाचन क्षेत्र से सटी कोलकाता पोर्ट सीट बरकरार रखी और वे पार्टी के प्रमुख अल्पसंख्यक चेहरों में से एक बने हुए हैं। नियुक्त विधायकों में असीमा पात्रा एकमात्र जिला प्रतिनिधि हैं, जो हुगली के धनेखाली का प्रतिनिधित्व करती हैं, जबकि बंद्योपाध्याय कोलकाता के चौरंगी का प्रतिनिधित्व करते हैं।

टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि पार्टी की यह पसंद विधायी अनुभव के महत्व को दर्शाती है। खासकर, ऐसे समय में जब पार्टी विपक्ष में रहेगी। नेता ने कहा कि शोभंदेब और हकीम को न केवल इसलिए चुना गया है क्योंकि वे ममता के करीबी वरिष्ठ नेता हैं, बल्कि इसलिए भी क्योंकि विपक्ष को ऐसे अनुभवी विधायकों की जरूरत है जो विधानसभा की कार्यप्रणाली को समझते हों।

इन नियुक्तियों के जरिए टीएमसी ने विधानसभा चुनावों में अपनी हार को आधिकारिक तौर पर स्वीकार करने का संकेत दे दिया है, जबकि ममता बनर्जी ने राज्यपाल को अपना इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है। 4 मई को चुनाव परिणाम घोषित होने के अगले दिन, बनर्जी ने दावा किया कि वह और उनकी पार्टी पराजित नहीं हुई हैं और उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वह इस्तीफा नहीं देंगी। उन्होंने आरोप लगाया कि इस चुनाव में भाजपा और चुनाव आयोग ने गंदा खेल खेला। उन्होंने जबरदस्ती वोट हथिया लिए।

‘कांग्रेस मुक्त’ से ‘क्षेत्रीय दलों के सिकुड़ने’ तक, BJP की नई राजनीतिक रणनीति में फंसीं कई राज्यों की पार्टियां

BJP ने साल 2014 के लोकसभा चुनाव में नारा दिया था, ‘कांग्रेस मुक्त भारत’। भले ही उसने लक्ष्य कांग्रेस का रखा हो लेकिन साथ ही भगवा पार्टी ने क्षेत्रीय दलों के प्रभाव को भी काफी कम कर रही है। इनमें से ज्यादातर दल ऐसे भी हैं, जो कि बीजेपी का रास्ता रोक रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को चुनौती दे रहे हैं। ये वही राज्य हैं, जहां तक बीजेपी अभी अपनी पहुंच स्थापित नहीं कर पाई है। पढ़िए पूरी खबर…