उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले के महुआ डाबर संग्रहालय ने बुधवार को अपनी मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया है। महुआ डाबर संग्रहालय ने मांग की है कि प्रयागराज के स्वरूप रानी नेहरू चिकित्सालय का नाम बदलकर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के नाम पर किया जाए।
महुआ डाबर संग्रहालय के संस्थापक शाह आलम राना ने कहा कि देश जब आजादी का अमृत काल और ऐतिहासिक काकोरी एक्शन की 100वीं वर्षगांठ मना रहा है, ऐसे में काकोरी कांड के इस शताब्दी वर्ष में ऐतिहासिक भूल को सुधारते हुए इस पूरे अस्पताल का नाम तत्काल ‘अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह अस्पताल’ किया जाना चाहिए।
ठाकुर रोशन सिंह के बलिदान आज भी उचित सम्मान नहीं
धरना स्थल पर अन्य समर्थकों ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतियोद्धा ठाकुर रोशन सिंह के बलिदान को आज भी वह सम्मान नहीं मिल पाया है, जिसके वे असल में हकदार हैं। उन्होंने कहा कि ठाकुर रोशन सिंह केवल एक महान स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं थे, बल्कि उनके विचार नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत भी हैं। फांसी से पूर्व तत्कालीन मलाका जेल से लिखे गए उनके पत्र, दुर्लभ चित्र और मुकदमे से संबंधित पत्र आज भी महुआ डाबर संग्रहालय में सुरक्षित हैं, जो उनके संघर्ष और राष्ट्रभक्ति के सबूत हैं।
आगे बताया कि 19 दिसंबर 1927 के तड़के सुबह जब ठाकुर रोशन सिंह को मलाका जेल में फांसी दी गई थी, उस समय हजारों लोग उनका पार्थिव शरीर लेने के लिए जेल के बाहर जमा हुए थे। उनकी अंतिम यात्रा के ऐतिहासिक चित्र आज भी उस जनसैलाब और जनभावना की गवाही देते हैं।
ठाकुर रोशन सिंह को जहां फांसी दी गई वहां अस्पताल
सदस्यों ने कहा कि जिस ऐतिहासिक मलाका जेल में ठाकुर रोशन सिंह को फांसी दी गई थी, उसी जगह पर वर्तमान में स्वरूप रानी नेहरू चिकित्सालय स्थित है। आजादी के अमृत काल में इस चिकित्सा संस्थान का नाम अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के नाम पर रखा जाना उनके सर्वोच्च बलिदान का वास्तविक सम्मान होगा।
संग्रहालय ने यह भी स्पष्ट किया कि वह कई सालों से इस मांग को विभिन्न माध्यमों से उठाता रहा है। काकोरी कांड के 100 साल के बाद भी ठाकुर रोशन सिंह को अपेक्षित सम्मान न मिलना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। जब तक उनकी मांग पूरी नहीं होती, तब तक अनिश्चितकालीन धरना जारी रहेगा।
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इतिहास कभी-कभी बहुत शांत होता है। वह न कोई आवाज करता है, न किसी को पुकारता है। सदियां गुजर जाती हैं। उसके ऊपर खेत बन जाते हैं। लोग घर बना लेते हैं। रास्ते निकल आते हैं। बच्चे खेलते हैं। बैलगाड़ियां गुजरती हैं। फिर भी इतिहास वहीं पड़ा रहता है – बिल्कुल चुप। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
