वीर गाथा: महायोद्धा बंदा बैरागी

रबिंद्र नाथ टैगोर ने बांग्ला में लिखी कविता, ‘बंदी बीर’ में बंदा बैरागी की कुर्बानी को बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। वीर सावरकर की मराठी में लिखी कविता ‘अमर मृत’ की विषय वस्तु भी गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की कविता जैसी ही है जिसमें उन्होंने इस महायोद्धा की वीरता देशभक्ति और धर्म के प्रति निष्ठा का चित्रण किया है।

महायोद्धा बंदा बैरागी।

राज सिंह
बंदा बैरागी के प्रशंसकों को इतिहासकारों से हमेशा यह शिकायत रही है कि उनको इतिहास में उपयुक्त स्थान नहीं दिया गया। यद्यपि एक बैरागी कुटिया से शुरू होकर महायोद्धा और राजा बनने तक का उनका सफर अद्भुत और निराला था।
इतिहासकारों से बेशक हमें यह शिकायत हो लेकिन विभिन्न भाषाओं के विश्व प्रसिद्ध साहित्यकारों ने अपनी कविताओं द्वारा उनको भरपूर सम्मान और श्रद्धांजलि दी। इन साहित्यकारों में तीन प्रमुख कवियों का नाम आता है- नोबेल पुरस्कार से सम्मानित, राष्ट्रगान के रचयिता और बांग्ला भाषा के श्रेष्ठ साहित्यकार गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर, स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर तथा राष्ट्रकवि के नाम से प्रसिद्ध हिंदी के कवि मैथिलीशरण गुप्त।

रबिंद्र नाथ टैगोर ने बांग्ला में लिखी कविता, ‘बंदी बीर’ में बंदा बैरागी की कुर्बानी को बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। वीर सावरकर की मराठी में लिखी कविता ‘अमर मृत’ की विषय वस्तु भी गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की कविता जैसी ही है जिसमें उन्होंने इस महायोद्धा की वीरता देशभक्ति और धर्म के प्रति निष्ठा का चित्रण किया है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुुुप्त ने अपनी कविता ‘वीर वैरागी’ में माधव दास बैरागी और गुरु गोविंद सिंह जी की वार्ता का अपनी कविता में समावेश किया।

रविवार, 9 जून 1716 को लक्ष्मण देव, माधवदास, वीर बंदा बैरागी और बंदा सिंह बहादुर के नाम से प्रसिद्ध धर्मयोद्धा ने सच्चाई, देशभक्ति, वीरता और त्याग के मार्ग पर चलते हुए मानव उत्थान यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दी।

इस महायोद्धा की विजयी यात्रा सितंबर 1708 में गुरु गोविंद सिंह जी से मुलाकात के बाद महाराष्ट्र के नांदेड़ से शुरू हुई और 21 फरवरी 1709 को सोनीपत के पास सेहरी खांडा नामक गांव में निंबार्क संप्रदाय और निर्मोही अखाड़े के संत महंत किशोर दास जी के निर्मोही अखाड़ा मठ को उन्होंने अपना प्रथम सैनिक मुख्यालय बनाया। इसी स्थान से उन्होंने गुरु गोविंद सिंह जी के हुक्मनामे पंजाब में सिखों को भेजे और मात्र आठ महीने की अवधि में अपनी सेना का गठन कर लिया। 2 नवंबर 1709 को इसी स्थान से उन्होंने सोनीपत में मुगल ट्रेजरी पर हमला किया और सेना के खर्चों के लिए आर्थिक संसाधनों का प्रबंध किया।

यहीं से बंदा बैरागी का प्रमाणिक एवं दस्तावेजों पर आधारित इतिहास का आरंभ होता है। इससे पहले की उनकी जीवन गाथा जन श्रुति और इतिहासकारों के अनुमानों पर आधारित है।

वीर सावरकर द्वारा बंदा बैरागी पर मराठी में लिखी हुई कविता ‘अमर मृत’, ब्रिटिश इतिहासकार टोडक द्वारा लिखी पुस्तक पर आधारित है। उन दिनों ईस्ट इंडिया कंपनी के नुमाइंदे, दो अंग्रेज अधिकारी, जॉन सरमन एवं ऐडवर्ड स्टिफनसन दिल्ली में तैनात थे और हर महत्त्वपूर्ण घटना की रिपोर्ट ईस्ट इंडिया कंपनी के मुख्यालय कोलकाता भेजते थे।

वे 5 से 12 मार्च 1716 तक हुई बंदा बहादुर के 720 सैनिकों की कुर्बानी के चश्मदीद गवाह थे। 9 जून 1716 को बंदा बैरागी और उनके कुछ साथियों की दिल्ली के कुतुब मीनार के पास हुई शहादत के समय भी ये अंग्रेज अधिकारी उपस्थित थे और उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी को कोलकाता में जो रिपोर्ट भेजी, उसी के आधार पर ब्रिटिश इतिहासकार ह्यटोडह्ण ने इतिहास में इस घटना का उल्लेख किया।

वीर सावरकर ने भारतीय इतिहास पर मराठी में लिखी गई अपनी पुस्तक ‘भारतीय इतिहासतील सहा सोनेरी पाने’ में भी बंदा बैरागी की वीरता का वर्णन करते हुए अपनी कविता ‘अमरमृत’ का जिक्र किया है। इस पुस्तक में बंदा बैरागी के बारे में वे लिखते हैं कि हिंदू इतिहास से उस वीर शहीद का नाम कभी भी नहीं मिटाया जा सकता जिन्होंने मुगलों द्वारा हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों का न केवल विरोध किया बल्कि उन पर सशस्त्र आक्रमण भी किया।
(लेखक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी हैं)

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