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असहयोग आंदोलन: तारीखी लीक मौजूदा सीख

असहयोग आंदोलन भारतीय समाज के आपसी सहयोग और एकजुटता की भी मिसाल है। भारत ने यह मिसाल गुलाम रहते हुए कायम की थी। आज तो हम स्वाधीन हैं। हालांकि जो हालात हैं उसमें देश और समाज में प्रेम, सद्भाव और सहयोग की दरकार आज ज्यादा है।

Author Updated: September 21, 2020 1:00 AM
एक अगस्त, 1920 वह तारीखी दिन है जब महात्मा गांधी ने स्वराज के लिए देश को ‘असहयोग’ के रूप में एक नई ताकत और हथियार से परिचित कराया था।

भारतीय स्वाधीनता संघर्ष को महज स्वराज की तरफ बढ़ते कदम के तौर पर देखना इस संघर्ष को इकहरे तौर पर देखना-समझना है। तारीखी तौर पर स्वाधीनता का यह संघर्ष भारतीय जनमन के प्रखर आधुनिक गठन की तारीखी प्रक्रिया का नाम है। इस प्रक्रिया में महात्मा गांधी का यशस्वी योगदान यह रहा कि उन्होंने देशवासियों को अहिंसा की रचनात्मक संभावना और शक्ति से परिचित कराया। देश आज उस दौर में है जब इतिहास के ये सुनहरे पन्ने सौ साला सफर पूरा कर रहे हैं। असहयोग आंदोलन को कोराना संकट के कारण बने हालात के बीच याद करना तारीख की सौ साल पुरानी इबारत को सामयिकता के नए सुलेख के तौर पर तब्दील होते देखने जैसा है। असहयोग आंदोलन की तारीखी लीक मौजूदा स्थिति में किस तरह की सीख देती है, बता रहे हैं प्रेम प्रकाश

भारत आज समय के उस दौर में है जब उसके इतिहास के 100-150 साल पहले के पन्ने नए सबक के तौर पर सामने हैं। यह इस लिहाज से भी अहम है कि सात दशक पहले तक हम पराधीनता के उस दौर में थे, जिसमें कुछ भी न तो मन का था न अपना। अगर था कुछ तो वह संघर्ष जिसने आखिरकार ब्रितानी हुकूमत के तौर पर दुनिया के सबसे बड़े औपनिवेशक शासन का अंत कर दिया। देश फिलहाल कोरोना संकट के बीच अपने राष्ट्रपिता की 150वीं वर्षगांठ मना रहा है। स्वच्छता से लेकर स्वदेशी और आत्मनिर्भरता के गांधी के सबक कोरोना के कारण बने नए तरह के हालात में सरकार और समाज दोनों को सकर्मक तौर पर जरूरी लग रहे हैं।

इस लिहाज से कुछ बड़े कदम उठाए भी गए हैं। इसी दौरान हिंदुस्तानी तारीख के एक और सुनहरे अध्याय के सौ बरस पूरे हुए हैं। यह अध्याय है असहयोग आंदोलन का। वह आंदोलन जिसे देश की पहली जनक्रांति भी माना जाता है। 1857 के गदर से 1920 के असहयोग आंदोलन तक भारतीय जनमन आत्मचिंतन और नवजागरण जैसी कई अहम प्रक्रियाओं से होकर गुजरा। असहयोग आंदोलन में शरीक हुआ भारतीय समाज अस्मिता बोध से लेकर स्वराज की ललक तक नई तरोताजगी से लबरेज तो था ही, उसके भीतर ढेर सारे रचनात्मक उद्यम का धैर्य और साहस भी था।

असहयोग की शक्ति
एक अगस्त, 1920 वह तारीखी दिन है जब महात्मा गांधी ने स्वराज के लिए देश को ‘असहयोग’ के रूप में एक नई ताकत और हथियार से परिचित कराया था। असहयोग आंदोलन का लक्ष्य तय करते हुए गांधी ने एक साल के भीतर स्वराज-प्राप्ति का नारा दिया था। उन्होंने देशवासियों से ब्रितानी सरकार से ऐच्छिक संबंधों के परित्याग करने की अपील की और देशवासियों को भरोसा दिलाते हुए कहा कि यदि असहयोग का ठीक ढंग से पालन किया गया तो भारत एक वर्ष के भीतर ही स्वराज हासिल कर लेगा।

हालांकि यह आंदोलन अपने मकसद में पूरी तरह सफल तो नहीं हो सका, लेकिन इसने भारतीय स्वाधीनता संघर्ष को एक नई ऊर्जा व दिशा जरूर प्रदान की। इस आंदोलन ने गांधी को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया। दिलचस्प है कि महात्मा गांधी को दक्षिण अफ्रीका से लौटे तब महज पांच वर्ष का समय ही बीता था। वे भारत की राष्ट्रीय राजनीति के लिए बिल्कुल नए चेहरे थे।

इससे पहले चंपारण सत्याग्रह का उनका प्रयोग अंग्रेजों की सीधी मुखालफत नहीं था। अलबत्ता चंपारण ने गांधी को निश्चित तौर पर वह जमीन दी, जहां उन्होंने भारत में पहली बार सत्याग्रह के प्रयोग और ताकत को आजमाया। इस प्रयोग ने उन्हें यह भरोसा दिया कि अहिंसक और रचनात्मक तरीके से भारतीय समाज को न सिर्फ जगाया जा सकता है बल्कि इनके जरिए बड़ी आंदोलनात्मक सिद्धियां भी हासिल हो सकती हैं। लिहाजा यह समझना भी बेहद जरूरी है कि असहयोग आंदोलन के जरिए पहली बार गांधी की छाया भारत के राष्ट्रीय परिदृश्य पर पड़ी और वे स्वाधीनता संघर्ष के केंद्र में आ गए।

आत्मनिर्भरता की अवधारणा
गांधी की स्वराज की कल्पना में सिर्फ ब्रितानी हुकूमत का खात्मा भर नहीं था। वे इसके साथ एक सबल और आत्मनिर्भर भारत का शील भी रचना चाह रहे थे। कोरोना संकट के बीच सरकारी पहल के कारण लोकप्रिय हुई शब्दावली में कहें तो असहयोग आंदोलन को गांधी ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ की अवधारणा पर केंद्रित रखा था। उनके सामने दो बातें साफ थीं।

एक तो वे ब्रिटेन या ब्रितानी सरकार पर किसी तरह की निर्भरता नहीं चाहते थे, वहीं वे देशवासियों को उनकी क्षमता और परिश्रम की ताकत से भी परिचित करा रहे थे। इस आंदोलन में भारतीयों ने हर स्तर पर फिरंगी सरकार के साथ असहयोग किया, उसका विरोध किया। समाज के संभ्रांत तबकों के साथ किसानों, मजदूरों, आदिवासियों, महिलाओं सभी ने स्वराज की खातिर ब्रितानी सरकार का खुला विरोध किया।

इस तरह 1920 भारतीयों के लिए खुद पर यकीन और बेहतर भविष्य के लिए उम्मीदों का साल साबित हुआ। भारतीयों ने लोभ और स्वहित के छोटे दायरों से बाहर निकलकर देश और समाज के बड़े हित के लिए त्याग का परिचय दिया। स्वराज की खातिर कई लोगों ने अपनी नौकरी छोड़ दी। दिहाड़ी मजदूरों ने काम पर जाना बंद कर दिया। तारीखी तौर पर देखें तो 1857 की आजादी की अंगड़ाई 1920 में भारतीय जनमन को उन तमाम अपेक्षाओं से लैश कर चुकी थी, जिसके बाद किसी बड़ी आंदोलनात्मक शपथ के साथ आप सड़कों पर उतरते हैं।

मौजूदा हश्र और तारीखी सबक
असहयोग आंदोलन के सौ साल पूरे होने का जश्न और इससे जुड़े सबक पर देश में एक रचनात्मक माहौल में बात होनी चाहिए। आज भारत सहित दुनिया के तमाम देश एक ऐसी महामारी से जूझ रहे हैं, जिसने सेहत से ज्यादा हमारे सभ्यतागत विकास और आचरण पर सवाल खड़े किए हैं। कुछ भी सोचने-करने, खाने-पीने, कहीं भी आने-जाने और स्वच्छता को लेकर घर के भीतर से लेकर बाहर तक की लापरवाही आज हम सब पर भारी पड़ रही है।

यही नहीं, इस संकट के बीच हिंसा का दायरा जिस तरह ज्यादा सघनता व जघन्यता के साथ सड़कों से खिसक कर घरों में समा गया है, वह उस आधुनिकता पर भी सवाल है, जिसका उत्तर सर्ग हम 21वीं सदी में विकास के आलीशान दावों के बीच रच रहे हैं।

महामारी और महात्मा
दिलचस्प है कि कोरोना संकट के दौरान अमेरिका, ब्रिटेन से लेकर दुनिया के अन्य हिस्सों में जिस व्यक्ति की सीख को सबसे ज्यादा याद किया गया, वे महात्मा गांधी हैं। लिहाजा, आज जब हम उनके जीवन के पहले सबसे बड़े आंदोलन को सौ साल बाद याद कर रहे हैं तो सीख के कई सामयिक सूत्र हमें सहज ही मिल जाते हैं। मसलन, असहयोग इसलिए क्योंकि परावलंबता कुछ और नहीं, पराधीनता की स्वीकृति है।

गांधी ने तब भी ब्रितानी हुकूमत और संसाधनों के साथ असहयोग और दूरी की बात कहते हुए आत्मनिर्भरता का संदेश दिया था। इसे तारीख का सबक कहें या तारीख की सौ साला इबारतों का आजमाया दमखम कि आत्मनिर्भर भारत का संदेश आज भारतवासियों की समझ और आचरण का स्थायी हिस्सा बने, इस दरकार को बड़ी स्वीकृति मिल रही है।

अभय के नौ सूत्र
प्रसिद्ध गांधीवादी कार्यकर्ता डॉ अभय बंग ने हाल में एक सामयिक पहल करते हुएयह बताया कि आज अगर गांधी होते तो वे इस महामारी से कैसे निपट रहे होते। बंग ने इसके लिए नौ सूत्रीय कार्यक्रम बताए। पहले भाषण और फिर लेख के तौर पर आए इन कार्यक्रमों की इन दिनों काफी चर्चा है।

भयमुक्ति, रुग्णसेवा, धार्मिक सद्भाव आदि की चर्चा के साथ अभय बंग जो एक अहम बात करते हैं वह यह कि गांधी आज अगर होते तो वे प्रवासी मजदूरों की घर लौटने के लिए की गई सैकड़ों-हजारों किमी की पैदलयात्रा के साथ होते। ऐसा हरगिज नहीं होता कि देश के श्रमिक सड़कों पर बिलबिला रहे होें और जैसे हम अपने घरों में बैठ सामयिक चिंतन या विमर्श का कोई सर्ग रचते हुए अपनी मनुष्यता के नकारेपन को रेखांकित कर रहे हैं, वैसा ही गांधी भी करते। वे इन तकलीफ के क्षणों में अपने श्रमिक भाइयों के साथ खड़े होते और उनकी आजीविका और दूसरी जरूरतों के लिए जो भी संभव होता, उसके लिए ईमानदारी से प्रयत्न करते।

असहयोग आंदोलन भारतीय समाज के आपसी सहयोग और एकजुटता की भी मिसाल है। भारत ने यह मिसाल गुलाम रहते हुए कायम की थी। आज तो हम स्वाधीन हैं। हालांकि जो हालात हैं उसमें देश और समाज में प्रेम, सद्भाव और सहयोग की दरकार आज ज्यादा है। इस दरकार पर खरा उतरना ही असहोयग आंदोलन का सबसे बड़ा सबक है। यह सबक एक मुश्किल समय में मानवता के उन गुणों की रक्षा के लिए जरूरी है, जिसके कारण प्रकृति और जैविक रचना के बीच मनुष्य एक संवेदनशील और रचनात्मक हैसियत रखता है।

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