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देश चर्चिल का सिक्का गांधी का

सिक्का चलना मुहावरा ही नहीं तारीखी तब्दीली का भी प्रतीक है। ब्रिटेन ने अपनी मुद्रा पर महात्मा गांधी को अंकित करने का फैसला जिन हालात में लिया है, उसमें इस तब्दीली को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। नस्लवादी हिंसा की आग के बीच ब्रितानी सरकार और वहां का समाज किस तरह के नैतिक दबावों से गुजर रहा है, यह देखना और समझना काफी दिलचस्प है। गौरतलब है कि ब्रिटेन में यह सब तब हो रहा है जब पूरी दुनिया में गांधी की 150वीं जयंती को महोत्सवी तौर पर मनाने के लिए कई तरह के आयोजन हो रहे हैं। इस फैसले को इस लिहाज से भी अहम माना जा रहा है कि यह फैसला ब्रिटेन के लिए ब्रेक्जिट के बाद लिया गया दूसरा बड़ा निर्णय है। साफ है कि कभी पूरी दुनिया में औपनिवेशिक साम्राज्यवाद का अजेय घोड़ा हांकने वाला ब्रिटेन आज आत्ममंथन के हालात से गुजर रहा है। ब्रिटेन और गांधी से जुड़े ऐसे ही कई सामयिक पक्षों की चर्चा कर रहे हैं प्रेम प्रकाश।

ब्रितानी सिक्के पर महात्मा गांधी की तस्वीर डालने की बात हो रही है।

न मैं चीखा न चिल्लाया
बेशिकन रहा चेहरा
चलता रहा किस्मत का हथौड़ा
सिर पर लहूलुहान हुआ माथा
पर न झुका, न हुआ कभी दोहरा।

विता को किसी भी सभ्यता का पहला लिखित पाठ (ड्राफ्ट) कहा जाता है। यही कारण है कि लोगों से ज्यादा सर्वकालिकता शब्दों के हिस्से आई है। ‘इनविक्टस’ ऐसी ही एक कविता है, जिसे अंग्रेज कवि विलियम अर्नेस्ट हेनली (1849-1903) ने 1875 में लिखा था और यह पहली बार उनके संग्रह में 1888 में प्रकाशित हुई थी। ‘इनविक्टस’ का शाब्दिक अर्थ है- ‘अपराजेय’।

नेल्सन मंडेला ने 27 साल के अपने कारावास के दौरान एक पर्र्ची पर हेनली की इस कविता को लिख कर अपने पास सहेजे रखा था। आज जबकि एक बार फिर दुनिया के कई हिस्सों में नस्लवादी दुराव और हिंसा की बर्बरता दिख रही है, लोग एक तरफ जहां हेनली की कविता को याद कर रहे हैं, वहीं उस महात्मा की सीख भी दोहराई जा रही है, जिसने सत्य, प्रेम और करुणा की के बूते नफरत को तारीखी शिकस्त दी।

भारतीय मूल के ऋषि
नस्लवाद और इसके साथ पूरी दुनिया को एक उपनिवेश में बदल देने की तारीखी सनक को लेकर अगर किसी देश का इतिहास सर्वाधिक संदिग्ध और काला है तो वह है ब्रिटेन। दिलचस्प है कि एक तरफ जहां वहां विंस्टन चर्चिल की मूर्तियों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है तो वहीं वहां की सरकार अपनी मुद्रा पर महात्मा गांधी को अंकित करने के फैसले को इतिहास और सभ्यता के मानवीय संदेश के साथ खुद को जोड़ने का नजरअंदाज न किया जा सकने वाला सामयिक दरकार मानती है।

ब्रिटेन के वित्त मंत्री ऋषि सुनक ने उस अभियान का समर्थन किया है जिसमें ब्रिटेन की विविधता का जश्न मनाने के लिए काले और अल्पसंख्यक नस्लों के लोगों (बीएएमई) को ब्रितानी सिक्कों पर दिखाने की बात की जा रही है। ब्रिटेन के वित्त मंत्री इस बात को लेकर बहुत इच्छुक हैं कि हमारे सिक्के पिछली पीढ़ी के उन लोगों के काम को दर्शाएं जिन्होंने इस देश की और राष्ट्रमंडल देशों की सेवा की है। साफ है कि ब्रिटेन अपने काले इतिहास और कटु अनुभवों से आगे निकलना चाहता है। अलबत्ता उसकी यह कोशिश प्रतीक से आगे स्वभाव या मानस का हिस्सा कब और कैसे बनेगी, इसका उत्तर अब भी संदिग्ध है।

इनायत और मेरी
गौरतलब है कि ब्रिटेन के वित्त मंत्री ऋषि सुनक भारतीय मूल के ब्रितानी नागरिक हैं और भारत की जानीमानी आइटी कंपनी इन्फोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति के दामाद हैं। यह पहली बार नहीं है जब ब्रितानी सिक्के पर महात्मा गांधी की तस्वीर डालने की बात हो रही है।

पूर्व वित्त मंत्री साजिद जावेद ने भी पिछले साल ‘द रॉयल मिंट’ (ब्रितानी टकसाल) को कहा था कि महात्मा गांधी के जन्म की 150वीं सालगिरह के जश्न के मौके पर एक सिक्का जारी करे। महात्मा गांधी के अलावा ब्रितानी सिक्कों पर जिनकी तस्वीर लगाने की बात हो रही है उनमें भारतीय मूल की ब्रितानी जासूस नूर इनायत खान और जमैका मूल की ब्रितानी नर्स मेरी सिकोल हैं।

जिक्र और फिक्र में गांधी
बात करें महात्मा गांधी की तो ब्रिटेन में अल्पसंख्यक और अश्वेत लोगों के बीच वे एक ऐसे प्रतीक हैं, जिनको आगे रखते हुए वहां समाज और व्यवस्था में समानता के लिए कई अभियान चल रहे हैं। ‘वी टू बिल्ट ब्रिटेन’ अभियान का नेतृत्व करने वाली भारतीय मूल की जेहरा जैदी पहले ही ऋषि सुनक को पत्र लिखकर वहां की मुद्रा पर गांधी की स्मृति और संदेश को अंकित करने की मांग कर चुकी हैं। जेहरा ब्रिटेन की कंजरवेटिव पार्टी से जुड़ी हैं और वो पिछले तीन साल से इस बात की लड़ाई लड़ रही हैं कि महात्मा गांधी, नूर इनायत खान और मेरी सिकोल जैसे लोगों की तस्वीर ब्रितानी सिक्कों पर नजर आनी चाहिए। जेहरा मानती हैं कि हमारे लिगल टेंडर, नोटों और सिक्कों पर किनकी तस्वीर है, इससे यह जाहिर होता है कि एक राष्ट्र के तौर पर हम क्या सोचते हैं और हमारी बुनियादी शिनाख्त क्या है।

बड़ा फैसला
अपने नए और काफी हद तक तारीखी फैसले के साथ ब्रिटेन अपने इतिहास और अपनी अस्मिता पर लगे धब्बों को धोना चाह रहा है, उसकी मिसाल है वहां के वित्त मंत्री का वह पत्र जो उन्होंने ‘द रॉयल मिंट’ (ब्रितानी टकसाल) के अध्यक्ष लॉर्ड वॉल्डग्रेभ को पत्र लिखा है। इस महत्त्वपूर्ण पत्र में वे कहते हैं, ‘काले, एशियाई और अल्पसंख्यक नस्ल के लोगों ने ब्रिटेन की साझा संस्कृति के विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया है। पीढ़ियों तक अल्पसंख्यक नस्लों के लोगों ने इस देश के लिए लड़ाई लड़ी है और अपनी जान दी है, इस देश को हमने मिलकर बनाया है, अपने बच्चों को पढ़ाया है, बीमारों की सेवा की है, बुजुर्गों की तीमारदारी की है, और उनके उद्यमी उत्साह से हमने अपने कुछ बहुत ही रोमांचक और सक्रिय व्यापार को शुरू किया है, नौकरियों को पैदा किया है और विकास को बढ़ावा दिया है।’

इसी पत्र में वे आगे लिखते हैं, ‘मैं जानता हूं कि आप भविष्य में आने वाले सिक्कों में विविधता दर्शाने के लिए पहले से ही विचार कर रहे हैं और मैं आपके इन प्रयासों का स्वागत करता हूं। मुझे उम्मीद है कि ये अभियान हम सभी को ऐसा करने के महत्व और जरूरत को याद दिलाता है।’

जाहिर है कि ऋषि की सोच सिर्फ वित्तीय नहीं है। वे कहीं न कहीं यह मानते हैं कि आर्थिक तरक्की का एक छोड़ सभ्यता और समाज से जुड़ा है। लिहाजा वित्तीय फैसले के घेरे में उन सब बातों की फिक्र को शामिल करना होगा, जिससे कोई राष्ट्र नैतिक मूल्यों के किसी भी दबाव का ईमानदारी से सामना कर सके।

आत्ममंथन का दबाव
यहां यह याद रखना जरूरी है कि ब्रिटेन में आज जो बदलाव हो रहे हैं उसका हालिया संदर्भ अमेरिका की एक घटना से जुड़ा है। अमेरिका में मई के महीने में एक अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की पुलिस के हाथों मौत के बाद पूरी दुनिया में इतिहास, उपनिवेशवाद, और नस्ल को लेकर जो नई बहस शुरू हुई, उसमें ब्रिटेन खास तौर पर शामिल है। फ्लॉयड की मौत की घटना के बाद ब्रिटेन की कई संस्थाओं ने भी अपने इतिहास पर दोबारा नजर डालना शुरू किया। यहां तक कि इस दौरान कई संस्थाओं ने अश्वेत, एशियाई और अल्पसंख्यक नस्ल के लोगों की मदद के लिए अभियान शुरू किया। इसके साथ ही सड़कों पर नस्लीय भेदभाव को मिटाने के लिए कई अभियान भी वहां चल रहे हैं, जिसमें कुछ शांत तो पर कुछ में काफी उग्रता है। कहीं न कहीं औपनिवेशिकवादी साम्राज्य को अपराजेय मानने वाले ब्रिटेन के लिए यह आत्ममंथन से गुजरने का दौर है।

नायक से खलनायक बने विंस्टन चर्चिल

मूर्तियों का बनना या गिराया जाना इतिहास का बनना या बिगड़ना हो या न हो, यह कहीं न कहीं यह तो दिखाता ही है कि हम अपने दौर में नायकत्व को लेकर क्या सोचते हैं। अमेरिका में जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद दुनिया भर में जो गुस्सा दिखा, उसमें कई ऐसे नायकों की मूर्तियों को ढहाया या तोड़ा गया, जिनकी एक समय में तूती बोलती थी। ब्रिटेन में जहां नस्लवाद का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों ने 17वीं सदी में गुलामों की खरीद-फरोख्त करने वाले सौदागर एडवर्ड कोलस्टन की मूर्ति गिरा दी, वहीं पूर्व ब्रितानी प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की मूर्ति को भी नुकसान पहुंचाया गया और इस पर प्रदर्शनकारियों ने ‘नस्लवादी’ लिख दिया।

दूसरे विश्वयुद्ध में ब्रिटेन को जीत दिलाने के लिए चर्चिल की सराहना की जाती है। चर्चिल के इस यश को आज ब्रिटेनवासी फख्र के साथ अगर याद नहीं कर पा रहे हैं तो इसलिए क्योंकि चर्चिल के नाम के साथ औपनिवेशिक दासता और नस्लभेदी आग्रह का भी काला अध्याय जुड़ा है। कितना मुश्किल होता है किसी देश या सभ्यता के लिए अपनी स्मृतियों से मुठभेड़ करना और यह मुश्किल आज ब्रिटेन में सरकार और समाज दोनों ही स्तरों पर साफ नजर आता है। गौरतलब है कि राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ रहे चर्चिल बड़े लेखक भी थे। नोबेल उन्हें साहित्य के क्षेत्र में ही मिला था। पर यह पुरस्कार भी उस व्यक्ति की नैतिक चमक के आगे उनके अपने ही देश में फीका नजर आ रहा है जिसे कभी उन्होंने तंज के साथ ‘नंगा फकीर‘ कहा था।

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