वीर बताए जाने के बावजूद महात्‍मा गांधी की तीखी आलोचना के श‍िकार हुए थे सावरकर, जान‍िए क्‍यों?

महात्‍मा गांधी ने वीर सावरकर की एक समय खूब तारीफ की थी। उन्‍हें वीर देशभक्‍त करार द‍िया था। इसके साथ ही व‍िभाजनकारी नीत‍ियों के ल‍िए उन्‍होंने सावरकर को आड़े हाथ ल‍िया था।

mahatma Gandhi Veer Sawarkar
वीर सावरकर और महात्मा गांधी। (Photo: Twitter/@VPSecretariat and Indian Express Archive

महात्‍मा गांधी ने वीर सावरकर की एक समय खूब तारीफ की थी। उन्‍हें वीर देशभक्‍त करार द‍िया था। इसके साथ ही व‍िभाजनकारी नीत‍ियों के ल‍िए उन्‍होंने सावरकर को आड़े हाथ ल‍िया था। व‍िक्रम संपत ने अपनी क‍िताब Echoes from a Forgotten Past, 1883-1924 में ल‍िखा है क‍ि व‍िनायक दामोदर सावरकर के छोटे भाई नारायण दामोदर सावरकर ने 1920 में एक चौंकाने वाला कदम उठाया। उन्‍होंने अपने भाई के धुर व‍िरोधी व‍िचारधारा वाले मोहनदास करमचंद गांधी को खत ल‍िखा। छह खतों में से यह पहला खत ल‍िखा गया था 18 जनवरी, 1920 को। इसमें उन्‍होंने सरकारी माफी की योजना के तहत अपने दोनों बड़े भाइयों को जेल से र‍िहा करवाने के संबंध में मदद व सलाह मांगी थी।

नारायण सावरकर ने अपने पत्र में लिखा था कि कल (17 जनवरी) मुझे भारत सरकार द्वारा जानकारी मिली कि सावरकार बंधुओं को उन लोगों में शामिल नहीं किया गया है, जिन्हें रिहा किया जा रहा है। ऐसे में अब साफ हो चुका है कि भारत सरकार उन्हें रिहा नहीं करेगी। अपने पत्र में उन्होंने महात्मा गांधी से सुझाव मांगा था कि ऐसी परिस्थितियों में आगे क्या किया जा सकता है। इस चिट्ठी का जिक्र, कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी के 19वें वॉल्यूम के पेज नंबर 384 पर किया गया है।

नारायण सावरकर की इस चिट्ठी का जवाब महात्मा गांधी ने 25 जनवरी 1920 को दिया था, जिसमें उन्होंने सलाह दी थी कि राहत प्रदान करने की एक याचिका तैयार करें, जिसमें तथ्यों के जरिए साफ करें कि आपके भाई द्वारा किया गया अपराध पूरी तरह से राजनीतिक था। उन्होंने अपने जवाब में यह भी लिखा कि वह अपने तरीके से इस मामले में आगे बढ़ रहे हैं। गांधी द्वारा दिए गए इस जवाब का उल्लेख कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी के 19वें संस्करण में भी देखा जा सकता है।

इस चिट्ठी के दो महीनों के बाद सावरकर ने एक याचिका दायर कर शाही क्षमादान का अनुरोध किया था। जहां उन्होंने ब्रिटिश सरकार को सैकड़ों कैदियों को रिहा करने के लिए धन्यवाद देते हुए कहा था कि उन्हें और उनके भाई को भी क्षमादान दिया जाना चाहिए, यह याचिका 30 मार्च 1920 को दायर की गई थी।

26 मई 1920 को महात्मा गांधी ने साप्ताहिक पत्रिका ‘यंग इंडिया’ में लिखा कि मै अपनी तरफ से वायसराय से कहता हूं कि मेरा नाम भी राजनीतिक विरोधियों में शामिल किया जाए, क्योंकि जनता की सुरक्षा और आपके फैसले के हिसाब से यही सही होगा। उन्होंने आगे लिखा कि मैं चाहता हूं कि यह हर उस व्यक्ति पर लागू किया जाए जो राज्य के खिलाफ अपराध या किसी खास कानून के तहत कारावास या आजादी पर प्रतिबंध झेल रहे हैं।

अपने लेख में एम के गांधी ने भारत और प्रांतीय सरकारों को कुछ कैदियों को दिए गए क्षमादान के लिए धन्यवाद भी दिया। यहां उन्होंने लिखा कि कुछ अपराधियों को माफी दी गई इसके लिए सरकार का धन्यवाद, लेकिन यहां मैं सावरकर बंधुओं का जिक्र करना चाहूंगा, जिन्हें बरी नहीं किया गया। उन्होंने लिखा कि इन दोनों ने भाइयों ने माना है कि उनके विचार, राजनीतिक हैं वह किसी क्रांतिकारी वैचारिकता से प्रभावित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा है कि अगर उन्हें रिहा कर दिया जाएगा तो वह सुधार अधिनियम के तहत काम करना चाहेंगे, क्योंकि सावरकर बंधुओं का मानना है कि भारत को राजनीतिक रूप से सक्षम बनाने के लिए सुधार जरूरी है।

उन्होंने लिखा कि सावरकर बंधु स्पष्ट रूप से कहते हैं कि उन्हें ब्रिटिश कनेक्शन से आजादी नहीं चाहिए, बल्कि उनका तो मानना है कि अंग्रेजों की मदद से भारत अपना भविष्य सुनहरा बना सकता है। इसलिए मेरा अनुरोध है कि जब तक इस बात का पूर्ण प्रमाण नहीं मिल जाता है कि सावरकर बंधु, स्टेट के लिए खतरा हैं, तब तक उन्हें रिहा कर देना चाहिए। उन्होंने लिखा कि दोनों ही भाई कारावास के तौर पर लंबी सजा भुगत चुके हैं, उनके शरीर का वजन का खासा कम हो गया है। महात्मा गांधी के लेख के इस हिस्से को भी महात्मा गांधी के कलेक्टेड वर्क्स, वॉल्यूम 20, पेज नंबर 368 पर पढ़ा जा सकता है।

महात्मा गांधी, कारावास के दौरान सावरकर बंधुओं के लिए अच्छी राय रखते थे जोकि उनके लेख में साफ नजर भी आता था। 18 मई 1921 को महात्मा गांधी ने यंग इंडिया के संस्करण में लिखा था कि सावरकर बंधुओं की प्रतिभा का इस्तेमाल जन कल्याण के लिए किया जाना चाहिए। उन्होंने लिखा कि अगर सरकार नहीं जागी तो भारत पर अपने दो वफादार बेटों को खोने का खतरा मंडराता रहेगा। उन्होंने लिखा कि एक भाई को मैं अच्छी तरह से जानता हूं, लंदन में मुझे उनसे मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। वह बहादुर और बुद्धिमान के साथ-साथ एक देशभक्त हैं। उन्होंने लिखा कि जिस सिस्टम के घृणित रूप को मैंने देखा है, वह उसको मुझसे पहले देख चुके थे। भारत के प्रति अपने अटूट प्रेम के कारण वह इन दिनों अंडमान में हैं।

गांधी, सावरकर के हिंसक तरीकों से सहमत नहीं थे। हिंदुत्व विचारक के रूप में सावरकर को जब पहचाना जाने लगा यहां महात्मा गांधी उनकी आलोचना में भी पीछे नहीं हटे थे। 1942 में बॉम्बे में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में गांधी ने कहा था कि किसी जीवित जीव के विभाजन की मांग करना उसके जीवन के लिए पूछने जैसा है, यह युद्ध का आह्वान है। उन्होंने कहा था कि कांग्रेस, भाई हत्या या युद्ध वाली पार्टी नहीं हो सकती है। गांधी ने कहा था कि मैं उस हिस्से का प्रतिनिधित्व नहीं करता हूं जो हिंदू के रूप में डॉक्टर मुंजे (डॉ बालकृष्ण शिवराम मुंजे) और सावरकर के तलवार के सिद्धांत में विश्वास रखते हैं, जो मुसलमानों को हिंदुत्व के प्रभुत्व में रखने की कोशिश करते हैं। विचारधारा से असहमति के बावजूद गांधी ने कहा था कि सावरकर बंधुओं को जेल से रिहा किया जाना चाहिए।

1937 में, जब शंकरराव देव ने गांधी से तात्यासाहेब केलकर के 1925 में एक भाषण के दौरान लगाए गए आरोप के बारे में पूछा था कि गांधी ने सावरकर की रिहाई के लिए मेमोरियल पर हस्ताक्षर नहीं किया था, तो इसके जवाब में गांधी ने कहा था कि यह पूरी तरह से गैरजरूरी था। गांधी के अनुसार, नए अधिनियमों के लागू होने के बाद सरकार, सावरकर को रिहा करने के लिए बाध्य थी और वही हुआ भी, उन्होंने कहा था कि कुछ बुनियादी बातों को लेकर हमारे विचारों में मतभेद हैं लेकिन मैं उनको बंदी बनाए जाने के बारे में नहीं सोचता हूं।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सावरकर को 1924 में रत्नागिरी जेल से इस शर्त पर रिहा किया गया था कि वह रत्नागिरी जिले में रहेंगे, बिना सरकार की अनुमति के वह जिले की सीमा से आगे नहीं जा सकते थे। इस दौरान उन्हें सार्वजनिक या निजी तौर पर राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने की अनुमति नहीं थी। यह प्रतिबंध पांच साल के लिए लगाए गए थे, जिन्हें समय खत्म होने पर आगे भी बढ़ाया जा सकता था।

सार्वजनिक रूप से कोई साहित्य उपलब्ध नहीं है जो यह बताता हो कि विनायक दामोदर सावरकर ने महात्मा गांधी के आग्रह पर ब्रिटिश सरकार के पास दया याचिका दायर की थी। महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में थे जब पहली दो याचिकाएं दायर की गईं थी। बाद में उन्होंने सावरकर के छोटे भाई को एक याचिका दायर करने की सलाह जरूर दी थी लेकिन वह भी तब, जब उन्होंने गांधी से मदद की सलाह मांगी थी।

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