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महाराष्ट्र का ‘माउंटेन मैन’, 57 वर्ष में बनाई 40 किमी. लंबी सड़क

महाराष्ट्र का 'माउंटेन मैन' कहे जाते हैं भापकर गुरुजी। उन्होंने बिना रुके और बिना थके जंगल, दुर्गम घाट और पहाड़ी तोड़ कर 57 वर्ष में बनाई 40 किमी. लंबी सड़क बनाई..

नेशनल हाइवे (प्रतीकात्मक चित्र)

केतन मेहता की फिल्म ‘माझी- द माउंटेनमैन’ बिहार के दशरथ माझी के अथक प्रयासों, जिद और जुनून की दास्तां है। इन दिनों महाराष्ट्र में एक और माझी की चर्चा है। उन्हें लोग स्नेह से भापकर गुरुजी कहते हैं। उन्होंने गांव की भलाई और लोगों के जीवन को आसान बनाने के लिए 57 सालों तक बिना थके काम किया। गुरुजी ने जंगल, दुर्गम घाट और पहाड़ी तोड़ कर 40 किलोमीटर का रास्ता बनाया। जहां कभी एक पगडंडी नहीं थी, वहां आज वाहनों की आवाजाही होती है। गुरुजी आज खुद इसी रास्ते पर मोटरसाइकिल दौड़ा कर अहमदनगर जाते हैं।

भपकर गुरुजी स्थानीय स्तर पर तो लोकप्रिय हैं, लेकिन उनका नाम राज्य से बाहर शायद ही किसी ने सुना होगा। अगर माझी फिल्म नहीं आती तो शायद भापकर गुरुजी भी चर्चा का केंद्र नहीं बनते। उनका पूरा नाम राजाराम भापकर है। भापकर गुरुजी 1957 से 1991 तक सरकारी स्कूल में शिक्षक रहे और रिटायर होने के बाद गांव में समाज सेवा कर रहे हैं। अंग्रेजी राज में गुंडेगांव से कोलेगांव जाने के लिए गांववासियों को तीन गांवों, जंगलों और पांच किलोमीटर लंबे घाट को पार करना पड़ता था। बीच में 700 मीटर ऊंची संतोषा पहाड़ी भी थी। गांव में कोई दवाखाना नहीं था। बीमारों को डोली में बिठा कर अहमदनगर ले जाना पड़ता था। नागरिकों की सुविधा के लिए गुरुजी ने प्रशासन से कई बार आग्रह किया कि यहां रास्ता बनाया जाए, मगर कोई सुनवाई नहीं हुई।

तब बिना किसी सरकारी मदद के भापकर गुरुजी ने यह काम खुद करना तय किया। जो तनख्वाह मिलती थी उसका आधा हिस्सा उन्होंने रास्ता बनाने में लगाया। रात को डेढ़-डेढ़ बजे तक रास्ता बनाने का काम चलता था। जो मजदूर काम करते थे उनकी तनख्वाह भापकर खुद देते थे। दो लाख रुपए खर्च कर गुरुजी ने जेसीबी मशीन भी भाड़े पर लेकर काम किया। और उनकी मेहनत रंग लाई। दो गांवों के बीच जोड़ रास्ता तैयार हो गया। 29 किमी का सफर उनके बनाए रास्ते के बाद मात्र दस किलोमीटर का रह गया।

कभी खुद का घर बनाने का विचार नहीं करनेवाले भापकर गुरुजी ने 57 सालों तक सार्वजनिक रास्ता तैयार करने-करवाने का काम किया। यहां तक कि जीवन भर जो कमाया उसका बड़ा हिस्सा इस काम में लगा दिया। जहां पगडंडी नहीं थी, आज वहां वाहन दौड़ रहे हैं। सादा जीवन उच्च विचार को मानने वाले गुरुजी ने एक अपंग लड़की से शादी की क्योंकि उनका मानना था कि शादी ऐसी लड़की से करेंगे जो विचारवान हो। इसके लिए उन्होंने कई लड़कियां देखी। आज अवकाशप्राप्त जीवन जी रहे 84 साल के सादगीपसंद गुरुजी गांव में नशामुक्ति अभियान चलाते हैं। गुरुजी पर्यावरण प्रेमी हैं और अब तक लगभग सात लाख पेड़ लगा चुके हैं।

महाराष्ट्र का माउंटेनमैन

* अंग्रेजों के राज में गुंडेगांव से कोलेगांव जाने के लिए गांववासियों को तीन गांवों, जंगलों और पांच किलोमीटर लंबे घाट को पार करना पड़ता था। बीच में 700 मीटर ऊंची संतोषा पहाड़ी भी थी। गांव में कोई दवाखाना नहीं था। बीमारों को डोली में बिठा कर अहमदनगर ले जाना पड़ता था।

* कभी खुद का घर बनाने का विचार नहीं करनेवाले भापकर गुरुजी ने 57 सालों तक सार्वजनिक रास्ता तैयार करने-करवाने का काम किया। यहां तक कि जीवन भर जो कमाया उसका बड़ा हिस्सा इस काम में लगा दिया। जहां पगडंडी नहीं थी, आज वहां वाहन दौड़ रहे हैं।

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