महाराष्ट्र में जन्म के समय लड़कियों की संख्या को लेकर चिंता बढ़ाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। हाल ही में जारी सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) स्टैटिस्टिकल रिपोर्ट 2024 के अनुसार, राज्य में प्रति 1,000 लड़कों पर केवल 899 लड़कियों का जन्म हो रहा है, जो राष्ट्रीय औसत 918 से काफी कम है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 10 साल में महाराष्ट्र के कुल लिंगानुपात में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ है। साल 2012-14 में यह आंकड़ा 896 था, जो 2022-24 में बढ़कर केवल 899 तक पहुंचा है। हालांकि, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के आंकड़ों में बड़ा अंतर देखने को मिला है। ग्रामीण महाराष्ट्र में जन्म के समय लिंगानुपात 888 से बढ़कर 910 हो गया, लेकिन शहरी क्षेत्रों में यह 908 से गिरकर 885 पर पहुंच गया। शहरों में आई इस गिरावट ने राज्य के कुल लिंगानुपात पर नकारात्मक असर डाला है।

देश के पिछड़े राज्यों में शामिल

लिंगानुपात के मामले में महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ (978), केरल (974), हिमाचल प्रदेश (956), आंध्र प्रदेश (946) और असम (946) जैसे राज्यों से काफी पीछे है। महाराष्ट्र का आंकड़ा केवल बिहार (896), हरियाणा (885), दिल्ली (876) और उत्तराखंड (872) से थोड़ा बेहतर है।

विशेषज्ञों के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर जहां शहरी क्षेत्रों में जन्म के समय लिंगानुपात बेहतर रहता है, वहीं महाराष्ट्र में इसके उलट स्थिति देखने को मिल रही है। राज्य के शहरी क्षेत्रों का लिंगानुपात 885 है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 910 दर्ज किया गया है।

अन्य सामाजिक संकेतकों में बेहतर प्रदर्शन

दिलचस्प बात यह है कि लिंगानुपात के कमजोर आंकड़ों के बावजूद महाराष्ट्र अन्य कई सामाजिक और स्वास्थ्य संकेतकों में बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। राज्य की कुल प्रजनन दर (TFR) 1.4 है, जो राष्ट्रीय औसत 1.9 से काफी कम है। महिलाओं की औसत विवाह आयु 23.4 वर्ष है, जबकि राज्य में बाल विवाह की दर सिर्फ 1 प्रतिशत है।

महाराष्ट्र में अस्पतालों में प्रसव का प्रतिशत भी ऊंचा है। हालांकि, यहां सरकारी अस्पतालों की तुलना में निजी अस्पतालों पर अधिक निर्भरता देखी गई है। राज्य में 40.9 प्रतिशत प्रसव निजी अस्पतालों में होते हैं, जो बड़े राज्यों में केरल के बाद दूसरा सबसे अधिक आंकड़ा है।

बुजुर्ग आबादी बढ़ने का संकेत

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि महाराष्ट्र की आबादी तेजी से बुजुर्ग हो रही है। राज्य में 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों की हिस्सेदारी 10.4 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत 9.7 प्रतिशत से अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और महिलाओं के कल्याण से जुड़े कई मानकों पर अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद जन्म के समय लिंगानुपात में सुधार न होना, खासकर शहरी क्षेत्रों में महाराष्ट्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है।