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अंबेडकर ने जहां किया था सत्याग्रह, आज भी उस गांव में दलितों से होता है भेदभाव

एक दलित महिला ने बताया कि पिछले 30 सालों में काफी बदलाव आया है, लेकिन ऊंची जाति के लोग अभी भी उन्हें किसी त्योहार या समारोह में शामिल नहीं होने देते हैं।

डॉ. भीमराव अंबेदकर की प्रतिमा, जिसकी स्थापना महाड़ के तालाब में की गई है। (Express archive photo)

संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव अंबेदकर ने वर्ष 1927 में महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के एक तालुका महाड़ में सत्याग्रह किया था। उनकी मांग यह थी कि जिस तरीके से ऊंची जाति के लोग कुंए और तालाब के पानी का इस्तेमाल करते हैं, उसी तरीके से दलितों को भी इसका इस्तेमाल करने देना चाहिए। आज वर्ष 2019 है लेकिन आज भी यहां दलितों के साथ भेदभाव जारी है। ज्यादा दिन नहीं बीते होंगे, जब ऊंची जाति के लोगों के लिए आरक्षित कुंए से पानी लेने को लेकर रायगढ़ जिले के दलितों को समाज से बहिष्कृत कर दिया गया था। यहां आज भी दलितों को लगभग प्रतिदिन भेदभाव और हिंसा का सामना करना पड़ता है।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, रायगढ़ जिले में महाड़ के समीप एक मुगवली गांव है, जहां दलितों के 3 घर हैं। अब यहां पानी का कनेक्शन भी लग चुका है, बावजूद भेदभाव की घटना जारी है। गांव के रहने वाले दलित महिला कहती हैं, “पिछले 30 सालों में काफी बदलाव आया है, लेकिन ऊंची जाति के लोग अभी भी उन्हें किसी त्योहार या समारोह में शामिल नहीं होने देते हैं। वे न तो कभी हमें खाने पर बुलाते हैं और न हीं हमारे बुलावे पर आते हैं। लेकिन इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है। अब मैं लड़ती हूं और उनसे कहती हूं कि ईश्वर ने मुझे उनके जैसा बनाया है।” महिला के बेटे कहते हैं, “मानसिकता में अभी तक किसी तरह का बदलाव नहीं हुआ है। वे अभी भी ये सोचते हैं कि हम उनसे अलग हैं। वह भावना कभी जाने वाली नहीं है। लेकिन हम तैयार हैं। यदि कभी जरूरत पड़ी तो हम अपने अधिकारों के लिए लड़ेंगे।”

इसी तरह ‘हथकीबौधवाड़ी’ गांव में 10 वीं और 12 वीं कक्षा में पढ़ने वाली लड़कियों ने बताया, “इसमें कोई शक नहीं कि हमारे परिजनों ने बुरे दिन देखे हैं लेकिन अब समय बदल रहा है। हम उनके (सवर्णों) के घर जाते हैँ। साथ खाते हैं। पारिवारिक समारोह में शामिल होते हैं। मुझे लगता है कि 80 प्रतिशत चीजें बदल चुकी है। हम जानते हैं कि ऊंची जाति के लड़के हमसे शादी नहीं करेंगे। हम उनके पारिवारिक समारोह में शामिल हो सकते हैं, लेकिन वे हमारे यहां कभी नहीं आते।”

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