मराठा आरक्षण की मांग कर रहे मनोज जरांगे-पाटिल एक बार फिर अपनी मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शनिवार से शुरू करने जा रहे हैं। मनोज जरांगे ने मराठा समाज के लिए कुनबी सर्टिफिकेट का दायरा हैदराबाद गजट से आगे बढ़ाने की अपनी मांग फिर से उठाई है। इससे महाराष्ट्र के भाजपा सरकार के सामने एक बार फिर राजनीतिक दुविधा सामने आ सकती है। साथ ही अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समुदाय के एक वर्ग से मनोज जरांगे का बढ़ता विरोध भी गले की फांस जैसा बना हुआ है।
महाराष्ट्र में लगभग एक दशक से चल रही आरक्षण की परस्पर विरोधी मांगों के कारण यह मुद्दा सरकार के लिए और भी जटिल हो गया है। हालांकि ऐतिहासिक रूप से मराठा आंदोलन के दौरान ओबीसी के एकजुट होने के भाजपा को फायदा ही हुआ, लेकिन पार्टी के रणनीतिकार मानते हैं कि अब राजनीतिक समीकरण का पहले से अंदाजा लगाना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
भाजपा के लिए ओबीसी दशकों से अहम
भाजपा के एक सूत्र ने कहा, “पहले मराठा प्रदर्शन से ध्रुवीकरण हुआ जिसका हमें फायदा मिला। अब यह पता नहीं कि छात्रों के विरोध और कांग्रेस की ओर से इस मुद्दे को फिर से उठाने की कोशिशों के बाद हालात की ओर मोड़ लेंगे।”
राज्य में भाजपा की सामाजिक समीकरण की रणनीति में ओबीसी दशकों से अहम रहे हैं। अगर ऐसी कोई धारणा बनती है कि सरकार बड़ी संख्या में मराठाओं को ओबीसी कोटे में शामिल होने दे रही है, तो इससे ओबीसी वोट बैंक नाराज हो सकता है।
भाजपा के एक अंदरूनी सूत्र ने कहा, “ओबीसी को अब यह लगने लगा है कि सरकार मराठों को जरूरत से अधिक तवज्जो दे रही है, केवल इसलिए क्योंकि वे सड़कों पर जोरदार आंदोलन करते हैं।”
ओबीसी की क्या हैं शिकायतें?
ओबीसी नेताओं का दावा है कि लगभग 250 उप-जातियों में बंटा ओबीसी समुदाय प्रदेश की आबादी का लगभग आधा हिस्सा है, जबकि मराठा समुदाय की आबादी का अनुमान 30 प्रतिशत है। हालांकि, ओबीसी की हालिया जाति-आधारित गिनती न होने के कारण इन अनुमानों पर राजनीतिक रूप से विवाद बना हुआ है।
भले ही ओबीसी नेता लक्ष्मण हाके ने मुंबई में प्रस्तावित अपना विरोध प्रदर्शन गणेश उत्सव के बाद तक टाल दिया है, लेकिन उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर सरकार समुदाय की चिंताओं का समाधान नहीं करती है, तो आंदोलन और उग्र हो सकता है। इस बीच, राजस्व मंत्री और चंद्रशेखर बावनकुले ने कहा कि वह मुख्यमंत्री और ओबीसी प्रतिनिधिमंडल के बीच बैठक कराने की कोशिश करेंगे।
खास तौर पर दो मुद्दों ने ओबीसी की चिंता बढ़ाई है पहला जाति जनगणना में ओबीसी के लिए अलग कॉलम का न होना और दूसरा कुनबी प्रमाणपत्रों के मामले में सरकार का रवैया।
कुनबी समुदाय ओबीसी कैटेगरी का हिस्सा
महाराष्ट्र में कुनबी समुदाय ओबीसी कैटेगरी का हिस्सा है। अगर कोई मराठा वैध कुनबी सर्टिफिकेट हासिल कर लेता है, तो वह मौजूदा 27 फीसदी ओबीसी कोटे के तहत आरक्षण का दावा कर सकता है।
इसे लेकर मराठा संगठनों का तर्क है कि ऐतिहासिक रिकॉर्ड जिनमें पुराने हैदराबाद राज्य से जुड़े रिकॉर्ड भी शामिल हैं, इस बात की पुष्टि करते हैं कि इस समुदाय के कुछ वर्गों की जड़ें कुनबी समुदाय से जुड़ी हैं। हालांकि, ओबीसी संगठनों को डर है कि इन रिकॉर्ड्स की विस्तृत व्याख्या से ओबीसी आरक्षण के लिए पात्र मराठाओं की संख्या काफी बढ़ सकती है।
देवेंद्र फड़नवीस ने भी बार-बार दोनों पक्षों को भरोसा दिलाने की कोशिश की है। उन्होंने कहा, “सरकार किसी भी समुदाय के साथ अन्याय नहीं करेगी। ओबीसी कोटे के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा।” साथ ही, मुख्यमंत्री ने यह भी कहा है कि मराठा समुदाय के साथ भी कोई अन्याय नहीं होगा और “जो कुछ भी कानूनी और संवैधानिक रूप से सही होगा, वही किया जाएगा।”
हालांकि, मुख्यमंत्री के इन आश्वासनों के बावजूद ओबीसी समुदाय की चिंताएं दूर होती नहीं दिख रही हैं। समुदाय के वरिष्ठ नेता प्रकाश शेंडगे ने कहा कि ओबीसी समुदाय सरकार की ओर से धोखा खाने जैसा महसूस कर रहा है। उन्होंने कहा, “वे न केवल नाराज हैं, बल्कि आहत भी हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि ओबीसी समुदाय भाजपा से दूरी बना रहे हैं।
प्रकाश शेंडगे ने इस बढ़ते मतभेद के संकेत के तौर पर राज्य के मंत्री छगन भुजबल के उस फैसले का हवाला दिया, जिसके तहत उन्होंने इस मुद्दे को देखने वाली सरकार की उप-समिति से बाहर निकलने का फैसला लिया था।
उन्होंने कहा, “अगर कोई कैबिनेट मंत्री सब-कमेटी से बाहर निकल जाता है, तो इससे पता चलता है कि कुछ ठीक नहीं चल रहा है।”
OBC का एक गुट सरकार से भी नाराज
एक OBC नेता ने कहा, “जबकि राधाकृष्ण विखे-पाटिल और उदय सामंत जैसे वरिष्ठ मंत्रियों ने जारांगे-पाटिल से बातचीत की, हम पर बहुत कम ध्यान दिया गया है।”
राष्ट्रीय ओबीसी फेडरेशन के अध्यक्ष बबनराव तायडे ने अपने समुदाय से संयम बरतने की अपील की है, लेकिन साथ ही सरकार को विरोध प्रदर्शन की चेतावनी भी दी है।
उन्होंने कहा, “हमारा तरीका बातचीत के जरिए अपनी माँगें पूरी करवाना रहा है। अगर सरकार OBC के लिए अलग कॉलम के साथ जाति जनगणना की हमारी माँग की ओर ध्यान नहीं देती और यह सुनिश्चित नहीं करती कि OBC कोटा बना रहे, तो हम सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर हो जाएँगे।”
BJP के लिए OBC क्यों अहम हैं?
प्रदेश में भाजपा की रणनीति लंबे समय से राज्य के दबदबे वाले मराठा वर्ग से हटकर एक सामाजिक गठबंधन बनाने की रही है। पार्टी के विचारक वसंतराव भागवत का ‘MADHAV’ फॉर्मूला (माली, धनगर और वंजारी) भाजपा के साथ अहम ओबीसी समुदायों को एकजुट करने की शुरुआती कोशिश थी।
यह रणनीति उस राजनीतिक माहौल को दिखाती थी जिसमें कांग्रेस का मराठा, दलित और मुस्लिम समुदायों पर मजबूत पकड़ थी। भाजपा ने ओबीसी के बीच अपनी बढ़त बढ़ाकर एक वैकल्पिक सामाजिक आधार बनाने की कोशिश की।
समय के साथ, पार्टी ने अपनी पहुँच भी बढ़ाई और इसमें मराठों को भी शामिल किया। हालाँकि, इसके चुनावी विस्तार के लिए ओबीसी अहम बने रहे, खासकर 2017 के बाद जब मराठा आरक्षण आंदोलन तेज हुआ।
2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में, भाजपा ने पारंपरिक ‘MADHAV’ समूह से आगे बढ़कर छोटी और माइक्रो-OBC समुदायों तक अपनी पहुँच बढ़ाई और राज्य की 288 विधानसभा सीटों में से 132 सीटें जीतीं।
इस सफलता के कारण मौजूदा विवाद और भी संवेदनशील हो गया है। अब भाजपा को दो ऐसे चुनावी रूप से अहम समूहों के बीच संतुलन बनाना है जो आरक्षण के एक ही दायरे को अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं।
प्रकाश शेंडगे ने तर्क दिया कि राज्य सरकार ने अब तक एक अहम सवाल पर बात करने से परहेज किया है कि कोई एक समुदाय अलग-अलग तरीकों से असल में कितना आरक्षण पा सकता है?
उन्होंने ‘सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग अधिनियम’ के तहत मराठों को दिए गए 10 प्रतिशत आरक्षण, 10 प्रतिशत EWS कोटे और कुनबी प्रमाण-पत्रों के जरिए योग्य मराठों के OBC आरक्षण का लाभ उठाने की संभावना की ओर इशारा किया।
कोटे के इतिहास को लेकर बहस
हालांकि, सरकार का इस पर कहना कि कोई व्यक्ति एक ही समय में कई कैटेगरी के तहत आरक्षण का दावा नहीं कर सकता और वह केवल उसी कैटेगरी के तहत लाभ उठा सकता है जिसके लिए वह कानूनी रूप से योग्य है।
महाराष्ट्र सरकार के 2018 के कानून को, जिसके तहत मराठाओं को शिक्षा में 12 प्रतिशत और सरकारी नौकरियों में 13 प्रतिशत आरक्षण दिया गया था, सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में रद्द कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि यह आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन करता है और इस सीमा को पार करने के लिए जरूरी असाधारण परिस्थितियां साबित नहीं हो पाई थीं।
2025 में, महायुति सरकार ने एक सरकारी आदेश (GR) जारी किया। इसके तहत मराठवाड़ा क्षेत्र (जो पहले हैदराबाद राज्य का हिस्सा था) के मराठा, हैदराबाद गजट के जरिए अपनी कुनबी वंशावली साबित करके मौजूदा ढांचे में OBC आरक्षण का लाभ उठा सकते थे।
मनोज जरांगे को क्यों मिल रहा लोगों का समर्थन?
मराठा क्रांति मोर्चा के एक कोऑर्डिनेटर ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि आर्थिक तंगी और बेरोजगारी के कारण मनोज जरांगे को समर्थन मिल रहा है।
उन्होंने कहा, “मनोज जरांगे में गरीब और बेरोजगार मराठाओं को उम्मीद दिखती है। उन्हें यह विश्वास दिलाया गया है कि ओबीसी कैटेगरी के तहत आरक्षण से उनकी आर्थिक समस्याएं हल हो जाएंगी।”
उन्होंने तर्क दिया कि कुनबी सर्टिफिकेट की मांग, मराठा आरक्षण के पिछले रास्ते की विफलता का नतीजा भी थी। उन्होंने आगे कहा, “जब सरकार ने 58 लाख कुनबी सर्टिफिकेट देने का वादा किया, तो ओबीसी का प्रतिक्रिया देना स्वाभाविक था।”
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मराठा आरक्षण कार्यकर्ता मनोज जरांगे ने महाराष्ट्र सरकार के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के बाद अपना अनिश्चितकालीन अनशन समाप्त कर दिया। सरकार की ओर से उन्हें 12 सूत्री प्रस्ताव सौंपा गया है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
