दो साल पहले महाराष्ट्र में तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली महायुति सरकार ने विधानसभा चुनाव से पहले महिलाओं के वोटों को ध्यान में रखते हुए लाड़की बहिन योजना शुरू की थी। इस योजना के तहत पात्र महिलाओं को हर महीने 1500 रुपये सीधे उनके बैंक खाते में भेजे जाते हैं।
सरकार का गणित साफ था। महाराष्ट्र में कुल 9.5 करोड़ मतदाता हैं जिनमें से 4.6 करोड़ महिलाएं हैं। इनमें 21 से 65 वर्ष आयु वर्ग की करीब 2.46 करोड़ महिलाएं यानी कुल महिला मतदाताओं के 50 प्रतिशत से अधिक इस योजना के लिए पात्र थीं।
सरकार ने इस योजना पर खुलकर खर्च किया और इसका राजनीतिक फायदा भी मिला। लोकसभा चुनाव में झटका खाने के कुछ ही महीनों बाद महायुति गठबंधन ने विधानसभा चुनाव में महाविकास अघाड़ी (एमवीए) को करारी शिकस्त देते हुए शानदार जीत दर्ज की। लेकिन लोकलुभावन योजनाओं की एक कीमत भी होती है। उस समय महायुति सरकार इस योजना पर होने वाले भारी खर्च को नजरअंदाज करने को तैयार थी। अब जुलाई 2026 में मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस के नेतृत्व वाली महायुति सरकार ने 92 लाख महिलाओं के नाम योजना से हटा दिए हैं। सरकार का कहना है कि ये महिलाएं योजना की पात्रता को पूरा नहीं कर रही थीं।
आखिर क्यों हटाए जा रहे योजना से नाम?
अब लाड़की बहिन योजना के तहत 1.51 करोड़ महिलाएं ही पात्र हैं यानी लाभार्थियों की संख्या में करीब 37 प्रतिशत की कमी आई है। सरकार के लिए यह एक सोचा-समझा राजनीतिक फैसला माना जा रहा है। फिलहाल राज्य में कोई बड़ा चुनाव नहीं है और ना ही सत्तारूढ़ गठबंधन किसी बड़े राजनीतिक संकट का सामना कर रहा है।
हालांकि, इस पूरे मामले में कुछ बड़े सवाल अब भी बने हुए हैं। अगर लाभार्थियों की पहले जांच नहीं हुई थी तो योजना लागू क्यों की गई? जो महिलाएं पात्र नहीं थीं, उन्हें दो साल तक योजना का लाभ क्यों मिलता रहा?
इस पर राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री अदिति तटकरे ने कहा कि योजना का दायरा बहुत बड़ा था, इसलिए सभी लाभार्थियों का वेरिफिकेशन करना आसान नहीं था। उन्होंने बताया कि प्रशासन ने यह जिम्मेदारी भी लाभार्थियों पर छोड़ दी थी कि वे खुद सुनिश्चित करें कि वे योजना की सभी शर्तों और नियमों को पूरा करती हैं।
सरकार की यह दलील ज्यादा भरोसेमंद नहीं लगती क्योंकि जब किसान कर्ज माफी के लिए आवेदन करते हैं तो उन्हें लाभ देने से पहले राज्य सरकार पूरी जांच-पड़ताल करती है।
ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि सरकार चुनावों से पहले इस लोकप्रिय योजना के लाभार्थियों की संख्या कम नहीं करना चाहती थी क्योंकि इससे महिला मतदाता नाराज़ हो सकती थीं। इसलिए स्थानीय निकाय और नगर निगम चुनावों सहित सभी चुनाव खत्म होने तक योजना को पहले की तरह जारी रखा गया।
‘लाड़की बहिन योजना बंद नहीं होगी’
अब जबकि भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को चुनावी फायदा मिल चुका है, राज्य सरकार सरकारी खजाने पर पड़ रहे बोझ को कम करने की कोशिश कर रही है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने साफ कहा है कि ”लाड़की बहिन योजना बंद नहीं होगी। इसमें कोई भ्रम नहीं है, यह आगे भी जारी रहेगी।” यह माना जा रहा है कि यह फैसला राजनीतिक मजबूरी के कारण लिया गया है। दूसरी ओर सरकार योजना का खर्च कम करने के लिए अपात्र (अयोग्य) लाभार्थियों को हटाने की प्रक्रिया चला रही है।
सरकार के लिए आर्थिक चुनौती बनी लाड़की बहिन योजना
शुरुआत से ही लाड़की बहिन योजना महाराष्ट्र सरकार के लिए आर्थिक चुनौती बनी हुई थी। जब जून 2024 में इस योजना की शुरुआत हुई, तब इसके लिए 46000 करोड़ रुपये का बड़ा बजट रखा गया था। इससे राज्य सरकार के पास दूसरे कामों के लिए खर्च करने की गुंजाइश काफी कम हो गई और मुख्यमंत्री के सामने वित्तीय संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया।
सूत्रों के मुताबिक, अब लाभार्थियों की संख्या कम करने के बाद भी और कुछ जरूरी बदलावों के बावजूद लाड़की बहिन योजना पर हर साल 22000 करोड़ से 25000 करोड़ रुपये तक खर्च होंगे।
इसके अलावा, राज्य सरकार को 7.5 हॉर्स पावर तक के कृषि पंपों का इस्तेमाल करने वाले किसानों को मुफ्त बिजली देने के लिए 25000 करोड़ रुपये का प्रावधान करना पड़ता है। वहीं कर्ज माफी योजना पर 36585 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। यानी इन तीन बड़ी लोकलुभावन योजनाओं पर ही राज्य सरकार को करीब 1 लाख करोड़ रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं।
राज्य के वित्त विभाग के एक अधिकारी ने तंज कसते हुए कहा, ”जब चुनावी राजनीति की बात आती है तो वित्तीय अनुशासन पीछे छूट जाता है। महाराष्ट्र भी इससे अलग नहीं है।”
लाड़की बहिन योजना महायुति गठबंधन के भीतर भी श्रेय लेने की राजनीति का कारण बनी रही। जब इस योजना की शुरुआत हुई, तब भाजपा और शिवसेना दोनों ही इसका श्रेय लेने की कोशिश कर रहे थे।
बाद में जब योजना को लागू करने की बारी आई तो शिवसेना के मंत्रियों ने अपने-अपने विभागों के बजट से इस योजना के लिए पैसा दूसरी जगह भेजे जाने (फंड डायवर्जन) पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि इससे उनके विभागों के कामकाज और योजनाओं पर असर पड़ रहा है।
लाडकी बहिन योजना: पात्र से अपात्र कैसे हुईं लाखों महिलाएं?
कोई भी सरकारी योजना शुरू करने से पहले लाभार्थियों को केंद्र में रखकर उसके लिए नियम-शर्तें तय की जाती हैं। इसी आधार पर पात्र लोगों का चयन कर संबंधित योजना का लाभ उन तक पहुंचाया जाता है। मगर किसी योजना को चुनाव से ठीक पहले लागू किया जाए और उसी सरकार के फिर से राज्य में कमान संभालने के बाद अगर बड़ी संख्या में लोगों को पात्रता की सूची से बाहर कर दिया जाए, तो उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
