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महाराष्ट्र में देशद्रोह पर विवादित परिपत्र वापस

महाराष्ट्र सरकार ने मंगलवार को बंबई हाईकोर्ट को सूचित किया कि उसने देशद्रोह से जुड़ी भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता 124-ए के दुरुपयोग को रोकने के लिए 27 अगस्त को जारी विवादित..

Author , मुंबई | October 28, 2015 12:52 AM
बंबई उच्च न्यायालय (फाइल फोट)

परिपत्र को वापस ले लिया है। इस परिपत्र को लेकर विपक्षी दलों और विभिन्न संगठनों ने सरकार की कड़ी आलोचना की थी और इसे वापस लेने की मांग की थी।

राज्य के महाधिवक्ता श्रीहरि एनी ने न्यायमूर्ति वीएम कनाडे और न्यायमूर्ति शालिनी फणसालकर जोशी के खंडपीठ को मंगलवार को दो याचिकाओं के जवाब में परिपत्र वापस लेने की जानकारी दी। ये याचिकाएं इस परिपत्र की संवैधानिक वैधानिकता को चुनौती देते हुए दायर की गई हैं।

न्यायमूर्ति कनाडे ने जानना चाहा कि यह परिपत्र कैसे जारी किया गया। इसके जवाब में महाधिवक्ता ने जवाब दिया कि राज्य सरकार इसका पता लगाएगी कि यह कैसे हुआ। उन्होंने यह भी सूचित किया कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मंत्रालय में अधिकारियों के साथ हालिया बैठक में इस परिपत्र को वापस लेने का फैसला किया।

बहरहाल, महाधिवक्ता ने यह नहीं बताया कि क्या सरकार ताजा परिपत्र के साथ आएगी। अदालत के बाहर एनी ने संवाददाताओं से कहा कि यह फैसला सरकार को करना है कि क्या वह ताजा परिपत्र जारी करेगी।

महाराष्ट्र की भाजपा नीत सरकार ने पिछले महीने स्वीकार किया था कि परिपत्र में अनुवाद को लेकर गड़बड़ी हुई और उसने संशोधित परिपत्र को लाने का वादा किया था। इससे पहले हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को इस परिपत्र को लेकर कदम उठाने से रोक दिया था। ये दों याचिकाएं कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी तथा वकील नरेंद्र शर्मा की ओर से दायर की गई हैं।

गौरतलब है कि 27 अगस्त को जारी विवादित परिपत्र पर जबरदस्त प्रतिक्रिया जाहिर की गई थी। राजनीतिक दलों, बुद्धिजीवियों ने सरकार के इस कदम की आलोचना करते हुए इसे फौरन वापस लेने की मांग की थी। इस परिपत्र के अनुसार, केंद्र और राज्य सरकार, उसके प्रतिनिधि या जनसेवकों के बारे में ईर्ष्या, तिरस्कार, वैरभाव रखने या सामाजिक सौहार्द को धक्का पहुंचाने के कार्य करनेवाले के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दायर किया जा सकता है। परिपत्र जारी होते ही सोशल नेटवर्किंग साइटों पर लोगों ने इसके विरोध में कड़ी टिप्पणियां की थीं। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों का कहना था कि इस परिपत्र के जरिए सरकार अपने खिलाफ बोलने वालों का मुंह बंद करवाना चाहती है। एक तरह से दूसरा आपातकाल लादने की कोशिश है।

हालांकि महाराष्ट्र सरकार इससे पहले भी देशद्रोह का एक मामला दायर करने के बाद पीछे हट चुकी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ अण्णा हजारे के आंदोलन के दौरान 2011-12 में असीम त्रिवेदी के खिलाफ खार पुलिस ने देशद्रोह का मामला दायर किया था। बाद में जब मामला हाईकोर्ट में चला तो सरकार ने 124 अ धारा हटा ली थी और त्रिवेदी बरी हो गए। इस मामले के सामने आने के बाद अभिव्यक्ति की आजादी और अनुच्छेद 124 अ के इस्तेमाल को लेकर व्यापक स्तर पर बहस छिड़ी थी।

हाईकोर्ट ने 17 मार्च 2015 को एक जनहित याचिका पर फैसला देते हुए देशद्रोह की धारा 124 अ का उपयोग करते समय पुलिस और सरकारी अधिकारियों को जरूरी दिशा निर्देश जारी किए थे। इन दिशा-निर्देशों में कहा गया था कि देशद्रोह का आरोप दर्ज करते समय इस बात का ध्यान रखा जाए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित ना हो। देश की सुरक्षा और संविधान द्वारा बनी सरकार के खिलाफ जनता में वैर और विद्रोह की भावना भड़काने और सामान्य तौर पर की गई आलोचना को लेकर भ्रम पैदा ना हो इसलिए अदालत ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को स्पष्ट परिभाषित किया था।

गृह विभाग ने न्यायालय के दिशा-निर्देशों के आधार पर 27 अगस्त 2015 को परिपत्र जारी किया। गृह विभाग का कहना था कि यह परिपत्र देशद्रोह के मामलों में स्थानीय पुलिस को कार्रवाई के लिए दिशा- निर्देश देने को जारी किया गया है।

बहरहाल पहले इस परिपत्र में कहा गया था कि मौखिक, लिखित, दृश्य या संकेतों से या किसी अन्य तरह से केंद्र सरकार, राज्य सरकार, जनसेवक या सरकार के प्रतिनिधि के बारे में ईर्ष्या, उपेक्षा, अपमान, असंतोष, वैरभाव, विद्रोह भावना, बेईमानी की भावना या हिंसा भड़काने की संभावना पैदा होती है, तो ऐसे अपराधों में 124 अ का इस्तेमाल किया जा सकता है। जनसेवकों में सरकार के मंत्री, जनप्रतिनिधि, जिला परिषद अध्यक्ष, महापौर और सरकारी पदाधिकारियों को शामिल किया गया था।

साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि संवैधानिक तरीके से, बिना ईर्ष्या, तिरस्कार या अपमान की भावना के सत्ता परिवर्तन की कोशिश की जाती हो या आलोचना की जाती हो तो ऐसी स्थिति में अनुच्छेद 124 अ या देशद्रोह का मामला नहीं बनता है। वीभत्सता या अश्लीलता के मामलों में इस धारा का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

महाराष्ट्र सरकार इससे पहले भी देशद्रोह का एक मामला दायर करने के बाद पीछे हट चुकी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ अण्णा हजारे के आंदोलन के दौरान 2011-12 में असीम त्रिवेदी के खिलाफ खार पुलिस ने देशद्रोह का मामला दायर किया था। बाद में जब मामला हाईकोर्ट में चला तो सरकार ने 124 अ धारा हटा ली थी और त्रिवेदी बरी हो गए। इस मामले के सामने आने के बाद अभिव्यक्ति की आजादी और अनुच्छेद 124 अ के इस्तेमाल को लेकर व्यापक स्तर पर बहस छिड़ी थी।

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