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किन हालातों में लगना चाहिए राष्ट्रपति शासन? बोम्मई केस में SC ने किया है स्पष्ट

राज्यपाल कोश्यारी ने संविधान के अनुच्छेद 356 (1) के तहत राज्य में राष्ट्रपति शासन के लिए सिफारिश की थी। हालांकि, 1994 एस.आर. बोम्मई मामला में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर गौर करें तो उनकी यह सिफारिश राजनीतिक दलील या कोरी कल्पना नहीं, बल्कि 'तथ्य परक' होनी चाहिए।

महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगा। (Twitter/PTI Photo)

महाराष्ट्र में 19 दिन तक चली राजनीतिक उठापटक के बाद मंगलवार को राष्ट्रपति शासन लागू हो गया और विधानसभा को निलंबित रखा गया है। चुनाव नतीजों के बाद भाजपा और शिवसेना के गठबंधन को बहुमत मिला था लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर दोनों पार्टियों में बात नहीं बनी। इसके बाद शिवसेना नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट (एनडीए) से अलग हो गई और दोनों पार्टियों के रास्ते अलग-अलग हो गए। गठबंधन टूटने के बाद किसी भी दल के पास बहुमत न होने की वजह से राष्ट्रपति शासन लागू किया गया है। राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की ओर से राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने के विरोध में शिवसेना ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। ऐसे में क्या आप जानते हैं कि किन हालात में किसी राज्य में कब राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है?

महाराष्ट्र की बात करें तो यहां राष्ट्रपति शासन इसलिए लगाया गया है क्योंकि चुनावों में किसी भी दल या गठबंधन के पास बहुमत नहीं है। राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने संविधान के अनुच्छेद 356 (1) के तहत राज्य में राष्ट्रपति शासन के लिए सिफारिश की थी। हालांकि, 1994 एस.आर. बोम्मई मामला में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर गौर करें तो उनकी यह सिफारिश राजनीतिक दलील या कोरी कल्पना नहीं, बल्कि ‘तथ्य परक’ होनी चाहिए।

एस.आर. बोम्मई बनाम भारत सरकार मामले में 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 356 के संदर्भ में जो फैसला दिया था, उसका आज भी हवाला दिया जाता है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की सरकारों को बर्खास्त संबंधी अनुच्छेद की व्याख्या की थी। इसमें उसने कहा था कि अनुच्छेद 356 के तहत यदि केंद्र सरकार राज्य में चुनी हुई सरकार को बर्खास्त करती है तो सरकार बर्खास्त करने के कारणों की सुप्रीम कोर्ट समीक्षा कर सकता है।

क्या है अनुच्छेद 356 – 

अनुच्छेद 356 केंद्र सरकार को किसी राज्य सरकार को बर्खास्त करने और राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुमति उस अवस्था में देता है, जब राज्य का संवैधानिक तंत्र पूरी तरह विफल हो गया हो। संविधान में इस बात का भी उल्लेख है कि राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के दो महीनों के अंदर संसद के दोनों सदनों की इस पर मुहर लगनी जरूरी है। यदि इस बीच लोकसभा भंग हो जाती है तो राज्यसभा द्वारा अनुमोदन किए जाने के बाद नई लोकसभा द्वारा अपने गठन के एक महीने के भीतर अनुमोदन किया जाना जरूरी है।

इस व्यवस्था को राष्ट्रपति शासन इसलिए कहा जाता है क्योंकि, इसके द्वारा राज्य का नियंत्रण एक निर्वाचित मुख्यमंत्री की जगह सीधे भारत के राष्ट्रपति के अधीन आ जाता है। राज्यपाल सदन को 6 महीने की अवधि के लिए निलंबित भी रख सकते हैं। 6 महीने के बाद भी यदि कोई पार्टी बहुमत साबित नहीं कर पाती है तो फिर से चुनाव कराने की सिफारिश की जाती है।

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