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महाराष्ट्र सरकार ने माना- तीन साल में 12,000 किसानों ने दी जान, सूखा भी कर सकता है चुनाव में बीजेपी को परेशान

प्रदेश के सहकारिता एवं पुनर्वास मंत्री सुभाष देशमुख ने एक सवाल के लिखित जवाब में माना है कि 2015 से लेकर 2018 के बीच 12,000 किसानों ने आत्महत्या की है।

Author Updated: June 22, 2019 10:30 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फोटो सोर्स: एक्सप्रेस आर्काइव)

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, लेकिन परिस्थितियां इस कदर विपरीत हैं जिनसे पार पाना सत्ताधारी पार्टी बीजेपी और शिवसेना के लिए आसान नहीं रहने वाला। सूखे की मार और किसानों की बदहाली ने स्थिति को नियंत्रण से लगभग बाहर कर दिया। राज्य में इसी वर्ष 610 से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली है। प्रदेश के सहकारिता एवं पुनर्वास मंत्री सुभाष देशमुख ने एक सवाल के लिखित जवाब में माना है कि 2015 से लेकर 2018 के बीच 12,000 किसानों ने आत्महत्या की है। तीन साल में इतने बड़े पैमाने पर खुदकुशी का यह आंकड़ों हैरान करने वाला है।

आत्महत्याओं की बढ़ती संख्या के पीछे फसल खराब होने, सूखे की मार और सिंचाई के लिए पानी की कमी, बाजार के मुताबिक फसल का उचित मूल्य नहीं मिलना और अक्सर ओलावृष्टि से फसलों का खराब होना प्रमुख कारणों बताए जा रहे हैं। महाराष्ट्र सरकार ने अपने हालिया बजट में सिंचाई पर खर्च के लिए 12,000 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रावधान बनाया है। इसके अलावा माइक्रो लेवल पर सिंचाई के लिए 350 करोड़ रुपये अलग से खर्च किए जाएंगे। लेकिन इन तमाम कवायदों के बीच आने वाला विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए चुनौतीपूर्ण रहने वाला है। क्योंकि, पिछला विधानसभा चुनाव किसान आत्महत्या और बदहाल कृषि के ऊपर ही लड़ा गया था। अब तीन महीने के अंतराल में ही चुनाव होने हैं, ऐसे में विपक्ष का आरोप है कि प्रदेश में बीजेपी-शिवसेना की सरकार ने कुछ भी बेहतर नहीं किया।

आत्महत्या के मामले में खेतिहर मजदूर सबसे ज्यादा: वैसे तो विभिन्न सरकारें बदहाल कृषि व्यवस्था को दुरूस्त करने के लिए किसान-कर्जमाफी का ऐलान करती है। लेकिन, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े इस मामले में दूसरा ही पहलू उजागर करते हैं। आधिकारिक डाटा के मुताबिक कृषि क्षेत्र से जुड़े आत्महत्या के मामलों में आधा हिस्सा खेतिहर मजदूरों (खेत में काम करने वाले मजदूर) का है। लोकसभा में एनसीआरबी के आंकड़ों का हवाला देकर बताया गया कि 2014 से 2016 के बीच में 45 प्रतिशत खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की है। राज्यों के हिसाब से बात करें तो तमिलनाडु, गुजरात, केरल और राजस्थान में किसान के मुकाबले खेतिहर मजदूरों ने अधिक संख्या में आत्महत्याएं की हैं।

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