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AIIMS: ऑपरेशन से पहले पता चला फेफड़ा लगाने लायक नहीं

देश में पहला हृदय प्रत्यारोपण करने वाला एम्स अभी तक फेफड़े के प्रत्यारोपण के लिए अधीकृत नहीं था। हाल ही में इसके लिए लाइसेंस मिला है।

अफवाहों के चलते कुछ मकान मालिकों ने इन डॉक्टरों को घर से निकल जाने का फरमान सुनाया है। (file)

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में फेफड़े का पहला प्रत्यारोपण करने की तैयारी को बड़ा झटका लगा है। देर रात यह प्रत्यारोपण होने की उम्मीद थी लेकिन जब फेफड़े को निकाला गया तो पता चला कि वह लगाने लायक नहीं है। देश में पहला हृदय प्रत्यारोपण करने वाला एम्स अभी तक फेफड़े के प्रत्यारोपण के लिए अधीकृत नहीं था। हाल ही में इसके लिए लाइसेंस मिला है। इस बीच रविवार को एम्स में ही लीवर (यकृत) का प्रत्यारोण किया गया, जिसे एक निजी अस्पताल के चिकित्सकों ने एम्स में अंजाम दिया है।

एम्स में हृदय, वक्ष और तंत्रिका विज्ञान कें द्र (सीटीवीएस) तो लंबे समय से बना है लेकिन अभी तक फेफड़ों का प्रत्यारोपण नहीं किया जा सका था। हाल ही में एम्स ने इसके लिए लाइसेंस लेने की प्रक्रिया पूरी की। इसके बाद एम्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती फेफड़े के लिए दानकर्ता मिलने की थी। इससे पहले भी एम्स एक मरीज में फेफड़े के प्रत्यारोपण की तैयारी में था लेकिन दानकर्ता मिलने से पहले ही उस मरीज ने दम तोड़ दिया था। सोमवार को एम्स को फेफड़े का एक दानकर्ता मिल गया था। जिसने सभी अंग दान करने क ा फैसला लिया था। वह अभी एम्स के पल्मोनरी मेडिसिन के गहन चिकित्सा कक्ष (आइसीयू) में भर्ती था। ब्रेन स्ट्रोक के बाद इस मरीज की दिमागी मौत हो चुकी है। फिर इस मरीज को एम्स के सीटीवीएस में ले जाया गया। जहां पर प्रत्यारोण की तैयारी थी।

सूत्रों के मुताबिक, अब जो दानकर्ता मिले थे उनके उत्तकों का इस प्रत्यारोपण के लिए बुलाए गए मरीज के उत्तकों से मिलान हो चुका है। चूंकि दानकर्ता की उम्र 60 साल है इसलिए इस प्रत्यारोपण के सफल होने की संभावना सुनिश्चत करने के लिए कुछ और जांचें की गई। एक वरिष्ठ सर्जन ने बताया कि प्रत्यारोपण की पूरी तैयारी हो चुकी थी लेकिन फेफड़ा निकाले जाने के बाद मालूम चला कि वह लगाने लायक नहीं है। एम्स प्रवक्ता के मुताबिक हमारी तैयारी पूरी थी लेकिन तकनीकी दिक्कतों की वजह से यह प्रत्यारोपण रोकना पड़ा। अगर यह प्रत्यारोपण होता तो एम्स दिल्ली में पहला व देश का दूसरा सरकारी संस्थान बन जाता जो फेफड़े का प्रत्यारोपण करता।

एम्स निदेशक डॉ रणदीप गुलेरिया यह प्रत्यारोपण शुरू करने व मुफ्त में करने की कोशिश में हैं। इससे पहले फेफड़े का प्रत्यारोण सरकारी संस्थान में केवल पीजीआइ चंडीगढ़ में ही होता है। इसके अलावा दक्षिण भारत के कुछ निजी अस्पताल यह प्रत्यारोपण करते हैं। 1963 से दुनिया में शुरू हुए फेफड़े के प्रत्यारोपण में अब तक करीब 4000 जिंदगियों को बचाया जा सका है। इनमें से करीब 200 मरीजों का प्रत्यारोपण भारत में हुआ है जिनमें से अधिकांश प्रत्यारोपण दक्षिण भारत मे व पीजीआइ चंडीगढ़ में किए गए हैं।

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