उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ ने वायु प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण और हवा की गुणवत्ता सुधारने के प्रयासों के चलते केंद्र सरकार के ‘स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2026’ में एक लाख से अधिक नहीं, बल्कि 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की श्रेणी में पहला स्थान हासिल किया है। देश के सबसे स्वच्छ शहर का दर्जा रखने वाला इंदौर दूसरे और जबलपुर तीसरे स्थान पर रहा।
केंद्र सरकार की ओर से सोमवार को नई दिल्ली में जारी किए गए सर्वेक्षण के परिणामों में शहरों को उनकी आबादी के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर वायु प्रदूषण कम करने के लिए किए गए प्रयासों का आकलन किया गया।
लखनऊ की रणनीति बनी कामयाबी की वजह
लखनऊ ने वायु प्रदूषण कम करने के लिए कई स्तरों पर काम किया। इनमें कचरा संग्रहण के बेड़े में इलेक्ट्रिक वाहनों को शामिल करना, सड़क की धूल नियंत्रित करने के लिए मैकेनाइज्ड स्वीपिंग मशीनों का इस्तेमाल और पुराने कचरे (लीगेसी वेस्ट) का वैज्ञानिक प्रबंधन प्रमुख हैं।
हालांकि, सर्वेक्षण में पहला स्थान हासिल करने के बावजूद लखनऊ अभी भी राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित वार्षिक PM10 मानक 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर को पूरा नहीं कर पाया है। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के पोर्टल के अनुसार, शहर में वार्षिक PM10 स्तर 2017-18 में 250 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था, जो घटकर अब 137 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रह गया है।
इंदौर और जबलपुर भी शीर्ष तीन में
पिछले वर्ष मिलियन-प्लस शहरों की श्रेणी में पहले स्थान पर रहने वाला इंदौर इस बार दूसरे स्थान पर रहा। जबलपुर ने तीसरा स्थान हासिल किया। जबलपुर में वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट, 100 प्रतिशत कचरा संग्रहण और वैज्ञानिक निस्तारण, मैकेनाइज्ड रोड स्वीपिंग तथा इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने जैसे प्रयासों को प्रमुख उपलब्धियों में शामिल किया गया। पिछले साल इंदौर पहले, जबलपुर दूसरे और आगरा तथा सूरत संयुक्त रूप से तीसरे स्थान पर रहे थे।
दिल्ली और मुंबई की स्थिति
मिलियन-प्लस शहरों की सूची में दिल्ली 30वें और मुंबई 37वें स्थान पर रहा। वहीं चेन्नई, जमशेदपुर, कोटा, कोलकाता और मदुरै इस श्रेणी के निचले पांच शहरों में शामिल रहे।
3 से 10 लाख आबादी वाले शहरों में राउरकेला अव्वल
तीन से 10 लाख आबादी वाले शहरों की श्रेणी में राउरकेला ने पहला स्थान हासिल किया। फिरोजाबाद और गुंटूर संयुक्त रूप से दूसरे स्थान पर रहे, जबकि अमरावती तीसरे स्थान पर रही। वहीं तीन लाख से कम आबादी वाले शहरों की श्रेणी में कलिंगानगर पहले, अंगुल दूसरे और तालचेर तीसरे स्थान पर रहे।
किन आधारों पर तय होती है रैंकिंग?
स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में शहरों का मूल्यांकन केवल प्रदूषण के आंकड़ों के आधार पर नहीं किया जाता। कचरा प्रबंधन, सड़क की धूल पर नियंत्रण, निर्माण एवं विध्वंस (C&D) कचरे से होने वाले धूल प्रदूषण का प्रबंधन, वाहनों से होने वाले प्रदूषण में कमी और औद्योगिक प्रदूषण पर नियंत्रण जैसे कई मानकों को महत्वपूर्ण माना जाता है।
दिलचस्प बात यह है कि PM10 की सांद्रता में सुधार को अंतिम रैंकिंग में केवल 2.5 प्रतिशत वेटेज दिया गया है। यानी शहर की रैंकिंग में प्रदूषण के वास्तविक स्तर के साथ-साथ उसे कम करने के लिए किए गए ठोस उपायों की भी बड़ी भूमिका है।
शहरों और कस्बों का प्रारंभिक आकलन राज्य स्तरीय निगरानी समितियों द्वारा किया जाता है। इसके बाद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) मूल्यांकन करता है और स्वतंत्र समितियां जमीनी स्तर पर इन दावों का सत्यापन करती हैं।
पहली बार वार्डों को भी मिला पुरस्कार
इस वर्ष स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में पहली बार उन नगर निगम वार्डों को भी सम्मानित किया गया, जिन्होंने अपनी वायु गुणवत्ता में सुधार किया है। इससे स्थानीय स्तर पर प्रदूषण नियंत्रण के प्रयासों को भी प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।
शीर्ष तीन शहरों और कस्बों को पुरस्कार के साथ नकद राशि और स्मृति चिह्न प्रदान किए जाते हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव ने नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में विजेता शहरों और कस्बों को सम्मानित किया।
NCAP के लक्ष्य और चुनौती
केंद्र सरकार ने जनवरी 2019 में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) शुरू किया था। इसका उद्देश्य देश के चिन्हित प्रदूषण प्रभावित शहरों में PM10 जैसे प्रदूषकों की मात्रा को कम करना है। कार्यक्रम के तहत 130 शहरों के लिए 2025-26 तक 2019-20 के स्तर की तुलना में PM10 सांद्रता में 40 प्रतिशत तक कमी लाने का लक्ष्य रखा गया था।
हालांकि, उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि पहले लक्ष्य अवधि 2019 से 2025-26 के दौरान NCAP के तहत शामिल 130 शहरों में से केवल 14 शहर ही राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों को पूरा कर सके। इससे साफ है कि कई शहरों ने प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में प्रगति तो की है, लेकिन निर्धारित वायु गुणवत्ता मानकों तक पहुंचना अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
NCAP के तहत केंद्र और राज्य स्तर पर विभिन्न स्रोतों से धन उपलब्ध कराया जाता है। इसमें केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के माध्यम से मिलने वाली राशि, 15वें वित्त आयोग के अनुदान तथा आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय और भारी उद्योग मंत्रालय के साथ विभिन्न योजनाओं के समन्वय से मिलने वाली धनराशि शामिल है।
सिर्फ पुरस्कार नहीं, प्रदूषण में वास्तविक कमी जरूरी
स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में लखनऊ की शीर्ष रैंकिंग शहर द्वारा किए गए प्रदूषण नियंत्रण प्रयासों को पहचान देती है। हालांकि, PM10 का स्तर अभी भी निर्धारित सीमा से काफी ऊपर है। ऐसे में चुनौती अब केवल रैंकिंग बनाए रखने की नहीं, बल्कि वास्तविक वायु गुणवत्ता को राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप लाने की है।
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जब किसी शहर की नदी कचरे, प्लास्टिक और गंदगी से भर जाए तो आमतौर पर लोगों की नजर प्रशासन की तरफ जाती है। शिकायतें होती हैं, सफाई की मांग उठती है और फिर लोग अगली कार्रवाई का इंतजार करने लगते हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें।
