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प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना बनी बदहाली का नमूना: सीएसई

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना कागजों में ज्यादा बेहतर व जमीन पर बदहाली का नमूना साबित हो रही है।

Author नई दिल्ली | July 22, 2017 1:10 AM
तस्वीर का इस्तेमाल संकेत के तौर पर किया गय है। (File Photo)

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना कागजों में ज्यादा बेहतर व जमीन पर बदहाली का नमूना साबित हो रही है। इसमें बैंकों की सक्रियता व किसानों की संख्या तो बढ़ी है पर किसानों को फायदा मिल पाना दूर की कौड़ी है। अव्वल तो उन्हें पता ही नहीं चल पा रहा है कि फसल का बीमा हो चुका है। अगर पता चल भी जाए तो भी उसका पूरा मुआवजा मिलने की गारंटी नहीं होती क्योंकि अधिकांश मामले में बैंक अपने हिसाब से फसल का नाम लिख लेते हैं, जबकि किसान के खेत में फसल कोई और होती है। ये वे तथ्य हैं जो सेंटर फोर साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) की ओर से इस योजना पर किए गए अध्ययन में सामने आए हैं।
इस रपट को जारी करते हुए सीएसई के उपमहानिदेशक चंद्र भूषण ने कहा कि यह योजना किसानों को गंभीर सूखा, बाढ़ या दूसरी विपरीत परिस्थितियों में तबाह होने से बचाने के लिए एक ताकतवर उपाय साबित हो सकता है लेकिन इसे अमलीजामा पहनाने में की जा रही कोताही इसक ी राह में बड़ा रोड़ा है। केंद्र की योजना का फायदा कम इसलिए भी है कि यह राज्य के स्तर पर बरती जा रही गड़बड़ी का भी शिकार हो रही है।

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इस अध्ययन के अगुआ विवेक ने कहा कि इस योजना से वर्ष 2016 की खरीफ फसलों के दौरान बैंकों का जो फायदा हुआ है, उसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि बैंकों को इससे 10,000 करोड़ रुपए का मुनाफा हुआ है। विवेक ने बताया कि प्रावधान किया गया है कि किसानों के कर्ज लेते ही फसल बीमा अपने आप ऋण से जुड़ जाता है। लेकिन बैंक वाले यह जानकारी किसान को नहीं देते और ऋण से मनमाने ढंग से प्रीमियम काट कर किसान को कर्ज की राशि का भुगतान करते हैं। पर इसकी न तो कोई रसीद दी जाती है न ही कोई पालिसी संबंधी कागज ही दिया जाता है। इतना ही नहीं कई बार किसान के खेत में कुछ फसल होती है और बीमा में बैंक वाले अपने मन से फसल का नाम कुछ और लिख देते हैं। ऐसे में अगर आपदा या सूखा आए या फसल खराब हो जाए तो किसान को कुछ नहीं मिलेगा।

इसी तरह बीमा वाले हर गांव के हर किसान के खेत का मुआयना नहीं करते बल्कि एक पंचायत के तीन चार खेतों को ही देख कर रपट दे देते हैं। उसी आधार पर पूरे इलाके का फैसला कर दिया जाता है। अब अगर दो चार खेत ठीक भी पाए गए बाकी तबाह हैं, तब भी किसानों को फायदा नहीं मिलेगा। देखने में यह भी आया है कि बैंक या दूसरे संबंधित विभाग के अधिकारी दफ्तर में ही बैठ कर रपट तैयार कर रहे हैं।

एक प्रावधान यह है कि किसी भी आपदा का शिकार होने पर किसान को 48 घंटे के अंदर बैंक को इसकी सूचना देना अनिवार्य है। तभी उसे बीमा का फायदा मिलेगा। पर यह प्रावधान न केवल अनपढ़ बल्कि जागरूक किसान भी नहीं जानते। इससे वे बीमा राशि पाने से महरूम रह जाते हैं। विवेक ने यह भी बताया कि बीमा में सिर्फ 12 तरह की फसलों को ही शामिल किया गया है। एक जैसी नीति व पैमाना विषम परिस्थिति वाले इलाकों जैसे बुंदेलखंड आदि पर भी लागू किया गया गया है जबकि वहां की परिस्थिति व जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है। वहीं के लिए विशष पैकेज देने की सिफारिश की गई है। रपट में बटाई पर खेती करने वाले किसानों को भी बीमाकवर देने की वकालत की गई है।

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