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2019 में नरेंद्र मोदी को कैसे हराएंगे राहुल गांधी? सामने हैं ये पांच बड़ी चुनौतियां!

मंच से भले ही राहुल गांधी आक्रामक अंदाज में पेश आते हों, विपक्षी नेताओं के सामने मुस्कुराते नजर आते हों मगर उनके सामने चुनौतियां बड़ी और कई हैं।

Author September 11, 2018 7:13 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी।(पीटीआई फाइल फोटो)

लोकसभा चुनाव से करीब सात-आठ महीने पहले तेल की बढ़ती कीमतें और गिरते रुपये के मूल्य पर कांग्रेस ने भारत बंद का आह्वान किया और इसी बहाने एक बार फिर से तमाम विपक्ष को एक मंच पर लाने की कोशिश की। लगे हाथ राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ तमाम विपक्षी पार्टियों में जोश भरा। नई दिल्ली के रामलीला मैदान में उन्होंने एक बार फिर कहा कि सभी विपक्षी दल मिलकर साल 2019 में बीजेपी को हराएंगे और केंद्र की सत्ता से नरेंद्र मोदी को हटाएंगे मगर ऐसा होना उतना आसान नहीं है, जितना किसी मुद्दे पर इन तमाम विरोधी पार्टियों का जमावड़ा लगना। मंच से भले ही राहुल गांधी आक्रामक अंदाज में पेश आते हों, विपक्षी नेताओं के सामने मुस्कुराते नजर आते हों मगर उनके सामने चुनौतियां बड़ी और कई हैं।

खजाना खाली: इस वक्त कांग्रेस सबसे खराब आर्थिक दौर से गुजर रही है। उसका खजाना खाली है। एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस की कमाई में पिछले साल के मुकाबले 36.20 करोड़ रुपये की गिरावट हुई है जबकि बीजेपी कमाई के मामले में भी ताकतवर हुई है। बीजेपी को जहां करीब 1000 करोड़ रुपये का चंदा मिला है वहीं कांग्रेस को इस दौरान केवल लगभग 50 करोड़ रुपये बतौर चंदा मिला है। पार्टी के पास आक्रामक चुनाव प्रचार, रैलियों, सोशल मीडिया वार और प्रत्याशियों के खर्चे के लिए जरूरी फंड की कमी है। साथ ही पार्टी की कम राज्यों में सरकार होने की वजह से कॉरपोरेट चंदा बढ़ने के आसार भी नहीं हैं जबकि बीजेपी पैसे के बल पर न सिर्फ अंधाधुंध चुनावी रैलियां और यात्राएं आयोजित कर सकती हैं बल्कि सोशल मीडिया वार, पीएम मोदी की चुनावी रैलियों की लाइव स्ट्रीमिंग, प्रत्याशियों को धन आवंटन, टीवी चैनलों पर लंबे लोक लुभावन विज्ञापन और अखबरों में बड़े-बड़े इश्तेहार छपवा सकती है। कांग्रेस इस मोर्चे पर पीछे रह सकती है। बता दें कि ये साधन आमलोगों के बीच पार्टियों की नीति, लुभावने चुनावी वादे पहुंचाने में कारगर होते हैं।

असरदार नेतृत्व का अभाव: पैसे के अलावा कांग्रेसी खेमा बीजेपी के मुकाबले असरदार नेतृत्व की कमी भी झेल रहा है। राहुल गांधी को छोड़ दें तो कोई ऐसा बड़ा नेता नहीं है जिसकी पूरे देश में स्वीकार्यता है। सोनिया गांधी अस्वस्थ चल रही हैं। प्रियंका बैकडोर से राजनीति कर रही हैं। मनमोहन सिंह की भाषण शैली आक्रामक और आकर्षक नहीं है। ऐसे में कांग्रेस पार्टी के अकेले खेवनहार राहुल गांधी हैं, जिनकी छवि कुछ महीने पहले तक पप्पू की बनी रही है। हालांकि, गुजरात और कर्नाटक चुनावों में उन्होंने बीजेपी और नरेंद्र मोदी- अमित शाह की जोड़ी को तगड़ा झटका दिया और उनके चुनावी मंसूबों को साकार होने नहीं दिया। धीरे-धीरे राहुल का सियासी कद बढ़ रहा है।

विपक्षी एकजुटता नहीं: यह सच है कि 2019 में कांग्रेस अपने दम पर बीजेपी की सत्ता नहीं उखाड़ सकती मगर यह भी सच है कि कांग्रेस ने महागठबंधन की दिशा में जो कदम बढ़ाया है, उससे बीजेपी खेमे में बेचैनी बढ़ी है। मगर समस्या अभी भी कांग्रेस की अगुवाई वाले विपक्षी खेमे में ही बड़ी है क्योंकि यहां गठबंधन तो है लेकिन उन तमाम क्षेत्रीय क्षत्रपों को बीच एकजुटता नहीं है। गाहे-बगाहे ये पलटी मार देते हैं। इससे ऐन मौके पर कांग्रेस की रणनीति फुस्स हो जाती है। राज्यसभा के उप सभापति के चुनाव और अविश्वास प्रस्ताव पर विपक्षी एकजुटता असरदार नहीं रही है। इसके अलावा विपक्षी खेमे के नेतृत्व (चेहरे) को लेकर भी एक बड़ा सवाल है।

मोदी की लोकप्रियता: तमाम सर्वे रिपोर्टों के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में लगातार गिरावट आ रही है बावजूद इसके अभी भी वो पीएम पद की पहली पसंद बने हुए हैं। पिछले महीने इंडिया टुडे-कार्वी इनसाइट्स के मूड ऑफ द नेशन सर्वे में नरेंद्र मोदी को 49 फीसदी लोगों की पसंद के आधार पर पीएम पद का सबसे पसंदीदा चेहरा बताया गया था। अभी हाल ही में प्रशांत किशोर की संस्था इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आई-पीएसी) ने ऑनलाइन सर्वे कराया था। उसके मुताबिक 48 फीसदी देशवासियों ने मोदी को पीएम की पहली पसंद बताया है। राहुल गांधी के मुकाबले पीएम मोदी की भाषण शैली आकर्षक और व्यक्तित्व बड़ा है। वो जनमानस पर गहरी छाप छोड़ने में एक कुशल राजनेता रहे हैं। खुद को जनता के बीच का आदमी, खुद को कभी चौकीदार, कभी प्रधान सेवक, चाय वाले के बेटा कहना ये कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो मोदी की जनता से संवाद की उनकी अनोखी शैली उजागर करती है। इससे आम जनता नेता से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ महसूस करती है। संभवत: यही वजह रही कि साल 2014 में नरेंद्र मोदी पर लोगों ने खूब भरोसा किया और बीजेपी को बड़ी जीत दिलाई।

नवीन, नायडू को मनाना: ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू, ये दो राजनीतिक शख्सियत ऐसी हैं जिनका अपने-अपने राज्यों में गहरा प्रभाव रहा है। इन दोनों नेताओं की पार्टियां कांग्रेस विरोध की राजनीति करती रही हैं और पहले एनडीए का हिस्सा रह चुकी हैं। ऐसे में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि 2019 में अगर त्रिशंकु लोकसभा की स्थिति बनी तो ये एनडीए में शामिल नहीं हो सकते हैं। हालांकि, चंद्रबाबू नायडू इसी साल मोदी सरकार और एनडीए गठबंधन से अलग हुए हैं लेकिन कांग्रेस से अभी भी वो वाजिब दूरी बनाए हुए हैं। इधर, चुनाव बाद अगर नतीजे कांग्रेस की अगुवाई वाले महागठबंधन के पक्ष में गए तब भी राहुल गांधी के लिए चुनौती बड़ी होगा क्योंकि तब ममता बनर्जी, मायावती, शरद पवार जैसे क्षत्रपों को समझाना या उनमें से किसी एक को नेता बनाना आसान नहीं होगा।

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