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2019 में 2014 जैसी जीत पा सकेंगे नरेंद्र मोदी? चिंता बढ़ाने वाले हैं ये पांच संकेत

सर्वे के मुताबिक 61 फीसदी लोगों ने महंगाई पर लगाम लगाने में मोदी सरकार को विफल बताया है जबकि 55 फीसदी लोगों का कहना है कि मोदी सरकार करप्शन दूर करने में नाकाम रही है।

लोकसभा चुनाव होने में अब आठ महीने रह गए हैं। ऐसे में बीजेपी और कांग्रेस समेत तमाम क्षेत्रीय दलों ने कमर कस लिया है। टीवी चैनलों पर भी कई ओपिनियन पोल प्रसारित हो चुके हैं जिसमें यह बताने की कोशिश की गई है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में कमी आई है या नहीं? इसके अलावा क्या 2019 में भी बीजेपी 2014 जैसी बंपर जीत हासिल कर सकेगी या नहीं? वैसे एक साल पहले तक यह बात लगभग सभी टीवी चैनलों पर कही जाती थी कि पीएम मोदी की अगुवाई में बीजेपी 2019 का भी चुनाव जीतेगी। समाज के लगभग सभी वर्गों का समर्थन उन्हें हासिल है मगर चार महीने पहले यानी मई 2018 में सीएसडीएस-लोकनीति के सर्वे ने यह खुलासा किया कि केवल 22 फीसदी अनुसूचित जाति के वोटरों का ही समर्थन उन्हें हासिल है। जनवरी 2018 में यह आंकड़ा 30 फीसदी था जो पांच महीने में आठ फीसदी गिरा है। यही हाल अनुसूचित जनजाति और किसानों का भी है जिसे बीजेपी के लिए अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता है। सर्वे के मुताबिक बीजेपी को पसंद करने वाले किसानों की संख्या 49 फीसदी से गिरकर 24 फीसदी पर आ गई है।

बीजेपी के खिलाफ बढ़ता असंतोष: सर्वे के मुताबिक 61 फीसदी लोगों ने महंगाई पर लगाम लगाने में मोदी सरकार को विफल बताया है जबकि 55 फीसदी लोगों का कहना है कि मोदी सरकार करप्शन दूर करने में नाकाम रही है। यही नहीं, 61 फीसदी लोग तो यह मानते हैं कि मोदी सरकार भी भ्रष्ट है। 64 फीसदी लोगों ने बीजेपी के शासनकाल में विकास को नकारात्मक बताया है। 57 फीसदी लोगों का मानना है कि मोदी सरकार नौकरी दिलाने के वादे पर फेल रही है। एक साल पहले 27 फीसदी लोग ही मोदी सरकार के कुल कामकाज से नाखुश थे लेकिन वह अब बढ़कर 47 फीसदी हो गया है। सबसे बड़ी बात कि साल 2014 में जिन लोगों ने बीजेपी को वोट दिया था उनमें से 38 फीसदी लोग 2019 में बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को फिर से चुनना नहीं चाहते हैं।

राजनीतिक गठजोड़ बड़ी चुनौती: पिछले एक साल में देश में सामाजिक-राजनीतिक समीकरण में तेजी से बदलाव हुआ है। जहां एनडीए का कुनबा छोटा हुआ है, वहीं विपक्षी कुनबा पहले के मुकाबले बड़ा और मजबूत हुआ है। देश में जातीय और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का दौर भी जारी है। इस लिहाज से राज्यवार आंकलन करें तो संकेत बताते हैं कि साल 2014 के मुकाबले 2019 में बीजेपी की स्थिति चुनौतीपूर्ण रह सकती है। सबसे बड़ा राजनीतिक बदलाव उत्तर प्रदेश में देखने को मिला है। दो क्षेत्रीय दल (सपा और बसपा) लंबे समय बाद एकजुट हुए हैं और उनकी एकजुटता की मंशा सिर्फ बीजेपी को हराना है। इस राज्य में लोकसभा की 80 सीटें हैं। इनमें से 71 पर बीजेपी और उनके सहयोगी दलों का कब्जा है लेकिन 2019 में बीजेपी और उसके सहयोगी इतनी सीटें जीत पाएंगे, ऐसा होना मुश्किल दिखता है क्योंकि सपा, बसपा, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोक दल मिलकर एक महागठबंधन बनाने की कोशिश में हैं। ऐसा होने पर दलित, यादव, मुस्लिम और जाट समेत कुछ ओबीसी वोटर बीजेपी के खिलाफ लामबंद हो सकते हैं।

कर्नाटक-महाराष्ट्र छिटकने का खतरा: बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं। इनमें से 22 पर बीजेपी और 9 पर उसके सहयोगी दलों का कब्जा है। झारखंड में 14 में से 12 सीट बीजेपी के खाते में है, जबकि कर्नाटक की 28 में से 17 सीटों पर बीजेपी का कब्जा है। वहां कांग्रेस और जेडीएस के गठबंधन के बाद बीजेपी के लिए 2014 की जीत दोहराना संभव नहीं दिखता है क्योंकि हालिया निकाय चुनावों ने भी इस गठबंधन पर मुहर लगा दी है और संभवत: दोनों दल लोकसभा चुनावों तक गठबंधन जरूर जारी रखेंगे। ऐसे में यह गठबंधन कुछ ज्यादा सीटें जीत सकता है। महाराष्ट्र में भी अगर शिव सेना ने बीजेपी से किनारा किया तो उसकी जीत का आंकड़ा कम हो सकता है। वहां बीजेपी को 47 में से 23 सीटें मिली थीं। इन चारों राज्यों से कुल 129 सांसद चुनकर आते हैं।

दक्षिण के सहयोगी ने छोड़ा साथ: दक्षिण के राज्यों में केरल, तमिलनाडु, पुदुच्चेरी, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना शामिल है जहां लोकसभा की कुल 102 सीटें हैं। यहां से बीजेपी के कुल चार सांसदों ने जीत दर्ज की थी इनमें से दो आंध्र प्रदेश से थे। वहां 2014 में बीजेपी टीडीपी के साथ गठबंधन में थी लेकिन अब वो गठबंधन टूट चुका है। दिल्ली, हरियाणा, गुजरात, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश से कुल 63 सांसद जीतकर आते हैं। यहां से बीजेपी ने 2014 में 59 सीटों पर जीत दर्ज की थी लेकिन 2019 में इसका दोहराया जाने के संकेत नहीं दिखते हैं। हालांकि, बीजेपी को ओडिशा और पूर्वोत्तर से बहुत उम्मीद है। सर्वे में भी दिखाया गया है कि ओडिशा में बीजेपी आगे बढ़ रही है लेकिन वहां नवीन पटनायक को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। साल 2014 में बीजेपी ने यहां 21 में से सिर्फ एक सीट पर जीत दर्ज की थी।

कांग्रेस-टीएमसी गठजोड़ बड़ी बाधा: पूर्वोत्तर में खासकर असम में बीजेपी को कुछ सीटें बढ़ने की उम्मीद है मगर हालिया सर्वे में उसे भी घटता हुआ दिखाया गया है। इनके अलावा अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में भी बीजेपी के एक-दो सीटों पर ही जीतने के संकेत हैं। पश्चिम बंगाल की 42 सीटों में से बीजेपी ने 2014 में मात्र दो पर ही जीत दर्ज की थी। बीजेपी वहां बहुत मेहनत कर रही है लेकिन 2019 में भी यह आंकड़ा बहुत ज्यादा बढ़ने के आसार नहीं हैं क्योंकि वहां ममता बनर्जी के टीएमसी और कांग्रेस गठबंधन कर चुनाव लड़ सकती है। हालांकि, सर्वे में कहा गया है कि बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी हो सकती है और सहयोगी दलों के साथ मिलकर 2019 में फिर से सरकार बना सकती है मगर उसके लिए छोट-छोटे दलों के बड़े-बड़े नाज-नखड़े सहने पड़ सकते हैं।

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