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जब खाने को पैसा नहीं तो ट्रेन का भाड़ा कहां से लाएं

सूरजभान ने बताया कि रास्ते मे लोगों से जो खाना या पानी की सुविधा मिल जाती है, उससे ही गुजारा कर रहे हैं। बीती रात भी सड़क किनारे सोकर बिताई है।

पूर्णबंदी के 50 दिन बाद देश भर में सरकारी इंतजाम से भी पलायन रुक नहीं रहा है।

पूर्णबंदी के 50 दिन बाद देश भर में सरकारी इंतजाम से भी पलायन रुक नहीं रहा है। दूसरे राज्यों के परिवार हर दिन राजमार्ग से गुजर रहे हैं और हजारों किलोमीटर के सफर के लिए निकल गए हैं। दिल्ली के अक्षरधाम बस स्टॉप पर ऐसे ही तीन परिवार छांव में थकान उतारते नजर आए। ट्रेन टिकट का पैसा नहीं होने के बाद इन परिवारों ने पैदल ही बिहार जाने का फैसला लिया। ये परिवार बुधवार सुबह हरियाणा से चले थे और गुरुवार दोपहर तक मयूर विहार पहुंचे हैं।

इन परिवारों के 7 सदस्य अपने बच्चों के साथ यहां तक पहुंचे हैं। इन्हें 1221 किलोमीटर की दूरी तय करनी है। यह दूरी कार से 26 घंटे और दुपहिया से 25 घंटे में तय हो पाती है। यदि कोई पैदल जाए तो कम से कम 9 दिन का समय लगेगा। क्योंकि परिवार में बच्चे व महिलाएं हैं। इसलिए यह सफर 10 से 12 दिन का भी हो सकता है। परिवार के मुखिया सूरजभान बताते है कि परिवार के पास जितना पैसा था सब खर्च हो गया हैं जब खाने का पैसा नहीं तो ट्रेन से जाने के लिए 3-4 हजार रुपए कहां से आएंगे। धीरे-धीरे चलकर किसी तरह से घर पहुंच जाएंगे और गांव में जाकर परिवार को
बचा सकेंगे।

सूरजभान ने बताया कि रास्ते मे लोगों से जो खाना या पानी की सुविधा मिल जाती है, उससे ही गुजारा कर रहे हैं। बीती रात भी सड़क किनारे सोकर बिताई है। हरियाणा में एक कपड़े की दुकान पर काम कर रहे थे लेकिन जब दुकान बंद हो गई तो काफी दिन वहां रहकर गुजारा करने की कोशिश की। अब वहां भी हालात बिगड़ गए थे। इसलिए पैदल ही जाने का फैसला लिया ।

हरियाणा बार्डर पर ही रहने वाले वीरेंद्र भी इस परिवार के साथ-साथ चल रहे थे। वीरेंद्र इनके साथ कापसहेड़ा बार्डर से साथ थे। वहां वह एक दुकान चला रहे थे। दो ढाई माह से दुकान बंद थी और आमदनी का रास्ता बंद हो गया था। इसलिए अपने गांव बस्ती, उत्तर प्रदेश लौटने का फैसला लिया। उसने बताया कि अब भूखे मरने की नौबत आ गई थी कोई रास्ता भी नहीं था। इस लिए पैदल ही गांव जाने का फैसला किया। इनके साथ उनका परिवार भी जा रहा है।

  • पैसा खत्म होने पर लिया पैदल ही सफर तय करने का फैसला
  • खाने पीने के लिए जो रास्ते में मिल रहा उसी से चला रहे हैं काम
  • सड़क किनारे सोकर बीत रही हैं रातें।

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