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विशेष: गुलों में रंग भरे…

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले...। फैज अहमद फैज की इस मशहूर गजल को अगर कोई चाहे तो कोविडकाल में नए मन-मिजाज के साथ गुनगुना सकता है। वैसे भी फैज के शेरों में मानी की कई तहें मिलती हैं। कोरोना संकट के बीच गुलों के रंग और फैज का जिक्र इसलिए कि इस दौरान प्रकृति इस तरह धुली-खिली नजर आ रही है, जैसे पर्यावरण संकट जैसी कोई समस्या दुनिया में हो ही नहीं। पूरी आबोहवा में एक नई तरह की ताजगी महसूस हो रही है। सुबह-शाम जानी-अनजानी ऐसी पक्षियों की आवाजें हम सुन रहे हैं, जिन्हें तस्वीरों में ही निहारना मुमकिन था। एक गंभीर महामारी के बीच प्रकृति के इस खुले और खिले रूप की चर्चा कर रहे हैं प्रेम प्रकाश।

प्रकृति इस समय इस तरह धुली-खिली नजर आ रही है, जैसे पर्यावरण संकट जैसी कोई समस्या दुनिया में हो ही नहीं।

ज्यादा पुरानी बात नहीं है। बमुश्किल दो हफ्ते भी नहीं हुए होंगे जब केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावेडकर ने सभी मुख्यमंत्रियों को एक पत्र लिखा। उन्होंने मुख्यमंत्रियों से अनुरोध किया है कि पूर्णबंदी के कारण औद्योगिक गतिविधियों, यातायात आदि में कमी का प्रभाव प्रदूषण पर साफ दिख रहा है। अब हवा-पानी पहले से काफी साफ है और ध्वनि प्रदूषण भी कम हुआ है। लिहाजा ऐसे में इसे एक ‘बेंचमार्क’ मानते हुए आगे के प्रयासों को जारी रखा जाना चाहिए।

सरकार की यह पहल सराहनीय साबित हो सकती थी और कोरोना महामारी के बहाने पर्यावरण को लेकर एक बड़े संकट से बाहर निकलने की राह पर हम साथ मिलकर आगे बढ़ सकते थे। पर ऐसा हुआ नहीं। कोरोना का रोना अब भी जारी है। प्रवासी मजदूर अब भी लाखों की संख्या में घर वापस पहुंचने की बाट जोह रहे हैं। महामारी के कारण लोगों के लगातार संक्रमित होने और मौत का आंकड़ा भी लगातार डरा ही रहा है। ऐसे में इन खबरों का स्वच्छ संदेश कहीं पीछे छूट गया कि उत्तराखंड के कई इलाकों में गंगा का पानी पीने लायक हो गया है तो पंजाब और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों से हिमालय तक साफ दिखने की बात लोग सोशल मीडिया पर कर रहे हैं। इस बीच, गंगा और यमुना नदियों में डॉल्फिन फिर से देखे जाने की खबरें भी आईं।

नई सुबह का अहसास
दरअसल, कोरोना के बढ़े संकट के बीच जिस तरह भारत सहित दुनिया के तमाम मुल्कों ने पूर्णबंदी का फैसला लिया और वह लंबा खिंचता गया, उसने हमें एक नए परिवेश, एक नए जीवन अभ्यास से परिचित कराया। इस दौरान लोग घरों में कैद जरूर रहे पर उन्होंने प्रकृति को इस रूप में इससे पहले कभी नहीं देखा था, जैसा इस बीच देखा।

सुबह टहलने निकलने के आदी लोगों की नींद अब फोन कॉल या अलार्म बजने से नहीं बल्कि उन चिड़ियों की चहचहाहट से खुलने लगी, जिनकी आवाज तक वे भूल चुके थे। खिड़की और बालकनी से जानी-अनजानी पाखियों की उड़ती पांत देखकर मन अंदर तक हुलस से भर जाता है। आसमान जितना साफ इन दिनों नजर आ रहा है वैसा शायद ही पहले नजर आया हो। अपने शहर के ‘स्काईलाइन’ (क्षितिज) की तस्वीरें उतार कर लोग एक-दूसरे को साझा कर रहे हैं। बच्चों ने भी पूर्णबंदी के दौरान घर पर रहकर पौधों-फूलों और पक्षियों के साथ एक नया रागात्मक संबंध विकसित किया है। वे प्रकृति के बारे में अब पहले से ज्यादा जिज्ञासु और संवेदनशील हैं।

स्वच्छ आबोहवा
आलम यह कि कुछ महीने पहले तक देश के जिन शहरों की गिनती सर्वाधिक वायु प्रदूषण वाले शहरों में होती थी, वहां के डॉक्टरों बता रहे हैं कि हवा की गुणवत्ता में सुधार के कारण सांस की समस्या वाले रोगियों की संख्या काफी घट गई है। वायुमंडल में घटे प्रदूषण से उम्मीद यहां तक जगी कि प्रसिद्ध ‘नेचर’ पत्रिका ने कुछ वैज्ञानिकों के हवाले से यह आकलन छाप दिया कि ओजोन परत की स्थिति काफी बेहतर हो रही है और सब कुछ अगर इसी तरह रहा तो ओजोन को लेकर एक बड़ी चिंता के बोझ से दुनिया मुक्त हो सकती है।
खासतौर पर भारत के लिए पर्यावरण में सकारात्मक परिवर्तन की यह खबर सुखद है, क्योंकि 2019 के वायु गुणवत्ता सूचकांक में भारत विश्व का पांचवां सर्वाधिक प्रदूषित देश आंका गया था। यही नहीं, विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित 30 शहरों की सूची में 21 शहर अकेले भारत के थे।

वेनिस ने खींचा ध्यान
दिलचस्प है कि इस दौरान प्रकृति को धुले और खुले रूप में देखने का सिलसिला कोई भारत के भूगोल के साथ ही खत्म हो गया हो, ऐसा नहीं है। बल्कि दुनिया के तमाम हिस्सों से इस तरह की खबरों के आने का क्रम अब भी अबाध बना हुआ है और लोग अपने ही परिवेश को इतने सुंदर रूप में देखकर उल्लास और रोमांच से भर रहे हैं।

कोरोना संकट के दौरान जिस देश की हालत सबसे ज्यादा चिंता बढ़ाने वाली रही, इटली उनमें शुमार रहा है। पर इसी देश से एक सुकून से भर देने वाली खबर भी आई। दुनिया के तमाम अखबारों में यह खबर तस्वीर के साथ छपी कि पर्यटन के लिए सबसे ज्यादा मशहूर और चौबीसो घंटे गुलजार रहने वाला वेनिस शहर इन दिनों खाली पड़ा है। अलबत्ता इस दौरान वेनिस की प्रसिद्ध नहरों का पानी एकदम साफ हो गया है। आलम यह है कि नहरों में तैरती मछलियां नजर आ रही हैं। स्थानीय लोगों ने बताया कि इन नहरों में इतना साफ पानी कभी भी नहीं देखा गया। साथ ही शहर में प्रदूषण स्तर भी काफी कम हो गया।

कार्बन उत्सर्जन में कमी
कोरोना संकट के कारण दुनिया भर में एहतियातन पूर्णबंदी या ऐसे जो दूसरे कदम उठाए गए, उस कारण तमाम छोटे-बड़े कारखाने या तो बंद हैं या फिर वे अपनी क्षमता से काफी कम काम कर रहे हैं। सड़कों पर आम दिनों के मुकाबले वाहन भी काफी कम चल रहे हैं। इस सबका आर्थिक नुकसान तो बहुत बड़ा है, पर अच्छी बात यह है कि कार्बन उत्सर्जन काफी कम हो गया है। अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर की ही बात करें तो पिछले साल की तुलना में इस साल वहां प्रदूषण तकरीबन आधा रह गया है।

इसी तरह चीन में भी कार्बन उत्सर्जन में 25 फीसद की गिरावट आई है। वहां के छह बड़े बिजली घरों में 2019 के अंतिम महीनों से ही कोयले के इस्तेमाल में 40 फीसद की कमी दर्ज की जा चुकी थी। पिछले साल इन्हीं दिनों की तुलना में चीन के 337 शहरों की हवा की गुणवत्ता में 11.4 फीसद तक का सुधार हुआ है। ये आंकड़े खुद चीन के पर्यावरण मंत्रालय ने जारी किए हैं। यूरोप की उपग्रह तस्वीरें बताती हैं कि उत्तरी इटली से नाइट्रोजन डाई आॅक्साइड उत्सर्जन कम हो रहा है। ब्रिटेन और स्पेन की भी कुछ ऐसी ही कहानी है।

सबक याद रहे तो अच्छा
स्वीडन के शोधकर्ता किंबर्ले निकोलस के मुताबिक, दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन का 23 फीसद परिवहन से निकलता है। इनमें से भी निजी गाड़ियों और हवाई जहाज की वजह से दुनियाभर में 72 फीसद कार्बन उत्सर्जन होता है। अभी लोग घरों में बंद हैं। दफ्तर का काम भी घर से ही निपटा रहे हैं। एक-दूसरे के यहां लोग आ-जा नहीं रहे हैं। बाजार भी बंद हैं। जाहिर है कि इन सब बातों का असर पर्यावरण पर भी पड़ रहा है। पर अगर इस परिवर्तन को एक सबक के तौर पर लें तो आगे भी हम संयम से काम ले सकते हैं और पर्यावरण के बिगाड़ के खतरों को कम कर सकते हैं।

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