देसी नस्ल के मवेशियों के संरक्षण की मोदी सरकार की कोशिशें फेल! इन आंकड़ों से हुआ खुलासा

रिपोर्ट के मुताबिक विदेशी और क्रॉस ब्रिड मवेशियों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। गणना में सामने आया है कि विदेशी और क्रॉस ब्रिड मवेशियों की संख्या में 2012 के मुकाबले 29.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

प्रतीकात्मक फोटो (फोटो सोर्स: इंडियन एक्सप्रेस)

मोदी सरकार की देसी नस्ल के मवेशियों के संरक्षण की कवायद फेल होती नजर आ रही है। पशुधन गणना 2019 की अंतरिम रिपोर्ट के आंकड़ें तो यही गवाही दे रहे हैं। देसी गायों के संरक्षण और संवर्धन के लिए ‘राष्ट्रीय गोकुल मिशन’ का भी कुछ खास असर नहीं दिखा। रिपोर्ट के मुताबिक देश में देसी और नवजात पशुओं की आबादी 139.82 मिलियन है जो कि पिछली पशुधन गणना (2012) के मुकाबले 7.5 फीसदी कम है। 2012 में पशुधन गणना के मुताबिक देसी और नवजात पशुओं की आबादी 151.17 मिलियन थी। यह गिरावट 1992 से लगातार जारी है। उस समय में इनकी संख्या 189.37 मिलियन थी।

वहीं रिपोर्ट के मुताबिक विदेशी और क्रॉस ब्रिड मवेशियों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। गणना में सामने आया है कि विदेशी और क्रॉस ब्रिड मवेशियों की संख्या में 2012 के मुकाबले 29.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। 2012 में विदेशी और क्रॉस ब्रिड मवेशियों की कुल संख्या 39.73 मिलियन जबकि 2019 में यह 51.74 मिलियन हो गई है। वहीं बात करें 1992 से 2019 तक की तो इनकी संख्या में 238 प्रतिशत की बढ़ोतरी (15.22 मिलियन से 51.47 मिलियन) हुई है।

बहरहाल इन आंकड़ों से साफ है कि किसान विदेशी और क्रॉस ब्रिड मवेशियों को पालने में ही ज्यादा फायदा देखते हैं क्योंकि ये गाय ज्यादा दूध देने में सक्षम होती हैं। देसी गिर, साहीवाल या लाल सिंधी गाय 300-305 दिनों में 1,500-2,000 लीटर दूध देती है तो वहीं विदेशी और क्रॉस ब्रिड गाय इतने ही दिनों में 7,000-8,000 दूध देती है। पशुधन गणना 2019 में प्राप्त आंकड़े पिछले साल 1 अक्टूबर 2018 से इस साल 17 जुलाई 2019 तक के हैं। पिछली 19 पशुधन गणना के इतर इसबार मैन्यूल एंट्री के जरिए नहीं बल्कि कम्प्यूटर टेबलेट के जरिए डाटा एकत्रित किया गया है।

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मालूम हो कि राष्ट्रीय गोकुल मिशन को केंद्र ने 2014 को स्वदेशी गायों के संरक्षण और नस्लों के विकास को वैज्ञानिक विधि से प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से शुरू किया था। बजट 2019 मे इस योजना के लिए आवंटन को बढ़ा 750 करोड़ रुपए कर दिया गया है। लेकिन सरकार की इन कोशिशों का जमीनी स्तर पर कोई खास असर नहीं दिखा रहा है।

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