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कविता ‘शव वाहिनी गंगा’ की तारीफ करने वाले ‘साहित्यिक नक्सल’- गुजरात साहित्य अकादमी प्रमुख ने लिखा; लामबंद हुईं 169 साहित्यिक हस्तियां

साहित्यकारों ने एक बयान जारी करते हुए कहा है कि पंड्या की संपादकीय में मरेली स्थित कवि पारुल खाखर द्वारा लिखी गई कविता 'शव वाहिनी गंगा' की प्रशंसा करने वाले सभी लोगों को "साहित्यिक नक्सली" कहा गया है।

Translated By सिद्धार्थ राय नई दिल्ली | Updated: June 18, 2021 12:31 PM
‘शव वाहिनी गंगा’ की प्रशंसा करने वाले सभी लोगों को “साहित्यिक नक्सली” कहा गया है।

गुजरात के कम से कम 169 प्रसिद्ध साहित्यकारों ने गुजरात साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विष्णु पंड्या द्वारा संपादकीय को वापस लेने की मांग की है। साहित्यकारों ने एक बयान जारी करते हुए कहा है कि पंड्या की संपादकीय में मरेली स्थित कवि पारुल खाखर द्वारा लिखी गई कविता ‘शव वाहिनी गंगा’ की प्रशंसा करने वाले सभी लोगों को “साहित्यिक नक्सली” कहा गया है।

व्यक्तित्वों में कलाकार गुलाम मोहम्मद शेख और मल्लिका साराभाई, विधायक जिग्नेश मेवाणी, समाजशास्त्री घनश्याम शाह, अर्थशास्त्री इंदिरा हिरवे, फिल्म निर्माता मेहुल देवकला और कार्यकर्ता निर्झरी सिन्हा शामिल हैं। पारुल खाखर की लिखी गई कविता ‘शव वाहिनी गंगा’ मोदी सरकार की आलोचना करती है और दूसरी कोरोना वायरस लहर के दौरान भारतीयों की पीड़ा के बारे में बात करती है। खाखर ने 11 मई को अपने फेसबुक पेज पर कविता पोस्ट की थी और तब से इसका हिंदी और अंग्रेजी सहित कम से कम छह भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है।

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इस बीच, गुजरात साहित्य परिषद के कार्यकर्ता, लेखक और अध्यक्ष प्रकाश एन शाह की एक पत्रिका ‘निरीक्षणक’ में खखर ने “तारे बोलवनु नहीं” (आपको बोलना नहीं चाहिए) शीर्षक से एक और कविता लिखी है। इस पत्रिका में लिखने वाले 16 लेखकों में से कम से कम आधे लोग गुजरात साहित्य अकादमी के विरोध में हैं। सलिल त्रिपाठी, रमेश सवानी, मनीषी जानी, योगेश जोशी, प्रवीण दारज़ी सहित अन्य कई साहित्यकार पारुल खाखर के समर्थन में सामने आए हैं।

जैसा कि द इंडियन एक्सप्रेस ने पहले रिपोर्ट किता था, अकादमी के मुखपत्र, शब्दश्रुति के जून संस्करण में पंड्या के संपादकीय ने खाखर की कविता का उल्लेख किए बिना कहा था, “उक्त कविता का इस्तेमाल ऐसे तत्वों द्वारा किया जा रहा है, जो एक साजिश रच रहे हैं। जिसकी प्रतिबद्धता भारत से नहीं बल्कि किसी और के प्रति है, जो वामपंथी हैं, तथाकथित उदारवादी हैं, जिन पर कोई ध्यान नहीं देता, ऐसे लोग भारत में अव्यवस्था फैलाना चाहते हैं और अराजकता पैदा करना चाहते हैं।

उन्होंने आगे कहा, “ऐसे लोग सभी मोर्चों पर सक्रिय हैं और इसी तरह वे गंदे इरादों से साहित्य में कूद पड़े हैं। इन ‘साहित्यिक नक्सलियों’ का उद्देश्य उन लोगों के एक वर्ग को प्रभावित करना है जो अपने दुख और खुशी को इससे (कविता) जोड़ेंगे।”

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