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चौपाल: हिंदी की पहचान

सालाना मौके की तरह हिंदी दिवस और विश्व हिंदी दिवस आकर चला गया। प्रत्येक वर्ष इस अवसर पर बड़े-बड़े कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है और हर आयोजन हिंदी को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने के संकल्प के साथ समाप्त हो जाता है और स्थिति जस की तस बनी रह जाती है।

Hindiसांकेतिक फोटो।

आज ऐसा कोई क्षेत्र नहीं, जो हिंदी से अछूता हो, हिंदी के बढ़ते वैश्विक प्रभाव और दुनिया भर के विश्वविद्यालयों में हिंदी का पठन-पाठन अच्छा है, लेकिन उससे भी आवश्यक है कि वर्तमान और आने वाले युवाओं को उनकी बुद्धि और परिवेश के अनुसार निर्भय एवं स्वच्छंद भाषाई प्रांगण अपने ही राष्ट्र में मिल सके।

आज के युवाओं के सामने छाया हुआ भाषाई अंधकार न सिर्फ उनकी क्षमताओं को चुनौती दे रहा है, बल्कि समय के साथ उनके सपनों को भी कुचलता जा रहा है। नई शिक्षा नीति में ‘त्रिभाषा फार्मूला’ से उम्मीद जगी है कि मातृभाषा के विकास को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन हिंदी या अन्य भाषाओं को रोजगार और शिक्षा के माध्यम से जोड़े बिना यह कैसे पूरा हो सकता है? किसी भी भाषा को हेयदृष्टि से देखने से अच्छा है, मातृभाषा के प्रचार-प्रसार और बढ़ावा पर जोर देने की, जिससे हिंदी को उसकी वास्तविक पहचान मिल सके।
’अनुज कुमार शर्मा,
जौनपुर, उप्र

छोटी सोच

‘नस्लीय दुराग्रह’ (संपादकीय, 12 जनवरी) पढ़ा। मानव सभ्यता के विकास के दौर में आज भी कुछ असामाजिक तत्त्वों द्वारा नस्ल, क्षेत्र, सामुदायिक पहचान को लेकर टिप्पणी करना बेहद अफसोसजनक घटना है। भारत और आॅस्ट्रेलिया के सिडनी टेस्ट मैच के दौरान नशे में धुत कुछ आॅस्ट्रेलियाई दर्शकों द्वारा फील्डिंग करने के दौरान जसप्रीत बुमराह और मुहम्मद सिराज पर नस्लवादी टिप्पणी बेहद दुखद घटना है। खेल को खेल भावना से खेलना और देखना चाहिए।

इस मामले में सकारात्मक यह है कि खिलाड़ियों की शिकायत पर प्रशासन ने फौरन उन दर्शकों को स्टेडियम से बाहर निकाल दिया और आॅस्ट्रेलियाई क्रिकेट बोर्ड ने इस घटना के लिए माफी मांगी। इससे भविष्य को लेकर उम्मीद पैदा होती है। आज के विकसित और सभ्य समाज में जाति, रंग, क्षेत्र आदि को लेकर समाज में वैमनस्य बढ़ाना पूरी दुनिया के लिए चिंताजनक है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने पूरे जीवन में कभी भी इंसानों के बीच भेदभाव नहीं किया। बापू का जीवन सैदव मानवजाति का मार्गदर्शन करेगा। पूरी दुनिया को उनके पदचिह्नों पर चलने की जरूरत है। मानव के अंदर हर दूसरे मानव के लिए समानता का भाव ही सभ्य होने की कसौटी है।
’हिमांशु शेखर, केसपा, गया, बिहार

लापरवाही की कीमत

उत्तर प्रदेश में मोदीनगर के एक श्मशान घाट की चिता अभी ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि महाराष्ट्र के भिंड जिले में सरकारी अस्पताल में उठी आग की लपटों में कई नवजात शिशुओं की जान चली गई। उन मासूमों को अभी यह भी नहीं मालूम था कि वे अपने घर पर या अस्पताल में जीवन हासिल करने आए थे, न कि जान गंवाने।

जिन मांओं के घर के चिराग बुझ गए, वे अपने मासूम बच्चों को लेकर कुछ दिनों बाद ही अपने घर वापस आने वाली थीं और परिवार सहित आसपास के लोगों को खुशखबरी सुनाने वाली थीं। लेकिन उनको क्या पता था कि उनके बच्चों की जिंदगी अस्पताल की लापरवाही की वजह से छिन जाएगी। उन्होंने अपने बच्चों को अपने सामने आग की लपटों में घिरे चीखते देखा होगा, उस समय उन पर क्या बीत रही होगी, इसका दुख केवल वही जानती होंगी।

इससे पहले भी अनेक अस्पतालों में इस तरह के आग की लपटें उठी हैं। एक बार तो आॅक्सीजन बंद होने की वजह से कई मासूमों ने दम तोड़ दिया। एक-दो घटनाओं को हादसे के तौर पर देखा जा सकता है, लेकिन लगातार लापरवाही को कैसे हादसा मान कर शांत हो जाया जाए?
’विजय कुमार धनिया, नई दिल्ली

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