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दीपोत्सव: जगमग-जगमग दीप जले

वेद कहते हैं कि माता लक्ष्मी सुखी दांपत्य, स्वादिष्ट अन्न, लहलहाती फसल तथा गोमाता से जुड़ी है। इसलिए यह मानकर लक्ष्मी की आराधना होनी चाहिए कि लक्ष्मी का संबंध धन से नहीं वरन चरित्र और धन की पवित्रता से है।

जगमग-जगमग दीप जले और हो हर तरफ उजियारा, प्रकाश पर्व दीपावली पर दूर हो घर का अंधेरा सारा।

दीपावली का त्योहार भारतीय मनोभूमि से गहरा जुड़ा है, क्योंकि रोशनी से भारत का पुराना रिश्ता है। इसी रिश्ते ने दीपों की माला के त्योहार का सृजन किया। इस दीपमाला की शोभा अलौकिक है। दीप की जिजीविषा चरम सुंदर है। कपास की बाती वाले दीये की नस-नस में प्रवाहित तेल अपनी चेतना से ज्ञान-प्रकाश की रोशनी फैला रहा है। दीपावली मिट्टी से बने दीपों का प्रकाश पर्व है। इन्हें मानव ने अपनी कर्म साधना से बनाया है। यह वैदिक यज्ञ संस्कृति का लघु स्वरूप है।

भाषाविदों का यह भी मानना है कि ‘रोशनी’ ईरानी शब्द है, जिसका मूल संस्कृत रूप ‘रोचना’ है। रोचना का मतलब द्युति है। इसी नाते माता लक्ष्मी का एक नाम ‘रोचनावती’ है। यह भी विश्वास था कि परंपरा नारी में तेज और दीप्ति का प्राधान्य देखती है। इसी से विवाहिता नारी के नाम के साथ ‘देवी’ और कन्या के साथ ‘कुमारी’ शब्द जोड़े गए, जो बड़े ही अर्थ-गंभीर और महिमामय शब्द हैं। पर अब इनका प्रयोग लगभग समाप्त ही हो गया है, जो स्त्री के दिव्य स्वरूप को व्यक्त करता है।
 
दैवीय पर्व
दीप दैवीय शक्ति का प्रतीक है। प्रश्न है कि दीप क्यों व किसके लिए जलाएं? कभी लगता है कि मौजूदा काले व कपटी परिवेश में माता लक्ष्मी का आह्वान और पूजन करना बेतुका है। वैदिक संस्कृति ने जिस लक्ष्मी को दीपावली की तामसी रात में पूजा, वह बैंकों में कैद धनरूपी लक्ष्मी नहीं थी। ऋषियों का तात्पर्य उस लक्ष्मी से था, जो अमृत और चंद्रमा की बहन, समुद्र की पुत्री और भगवान नारायण की प्रिया है।

वेद कहते हैं कि माता लक्ष्मी सुखी दांपत्य, स्वादिष्ट अन्न, लहलहाती फसल तथा गोमाता से जुड़ी है। इसलिए यह मानकर लक्ष्मी की आराधना होनी चाहिए कि लक्ष्मी का संबंध धन से नहीं वरन चरित्र और धन की पवित्रता से है। लक्ष्मी अशुद्ध, अपवित्र और अप्राकृतिक से कभी नहीं जुड़ती है। जिसका आस्वादन अशुद्ध है, जिसकी भाषा-वाणी अपवित्र है, जिसका संस्कार-विहार अप्राकृतिक है, वह लक्ष्मी का आशीर्वाद कैसे प्राप्त कर सकता है। सच्ची और स्थायी लक्ष्मी वही है जो शील-मर्यादा से पाई जाए।

उपभोग नहीं उपयोग
आचार्य कुबेरनाथ राय लिखते हैं, ‘दीपावली को मनुष्य के हाथों अंधकार पर विजय की रात्रि मानते हैं। मनुष्य के बनाए दीप और उसके द्वारा उपजाए तिलों का तेल इसके साधन-द्रव्य हैं। अंधकार से जूझते इन दीपों के साथ सारी मानव जाति का भावात्मक संबंध है, क्योंकि ये दीप हमारी धरती से ही बने हैं। धरती की बेटी माता सीता के सगे भाई हैं ये दीप। इन दीपों से हमारा गहरा पारिवारिक रिश्ता है। हमारे अपने हाथों से बनाये दीप जब जलने लगते हैं तो देवताओं का तारामंडल फीका पड़ जाता है।

सारे अपशकुन तथा सारी अशुभ शक्तियां मनुष्यकृत प्रकाश के सामने नतमस्तक हो अपनी हार मान लेती हैं। दीपावली मनुष्य के लिए गौरव बोध का पर्व है। यह जरूर दुखद है कि कुछ कुटिल दुराचारियों ने दीपावली की पवित्र निशा में ताश खेलने और मद्य पीने की रस्म बना ली है, जिसमें लक्ष्मी का पूजन नहीं बल्कि उसका अपहरण होता है।’

दीपावली श्री, सुख, शोभा, सौभाग्य, शांति, पवित्रता तथा नववधू के गृहप्रवेश की भांति लज्जा, चेतना व आनंद बांटती कमला को पूजने का दिन है न कि दुर्गुणों को अपनाने का। लक्ष्मी का उपयोग होता है, उपभोग नहीं। जो उसके उपभोग का दुस्साहस करता है, वह दशानन रावण जैसी दुर्गति को प्राप्त होता है।

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