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जीवन जगत: जीवन का बस एक ही मकसद हो…आनंद

कई बार ऐसा जीवन में महसूस किया जाता है कि बहुत सी चीजें हम फिजूल ही करते आए हैं और अपना जीवन जटिल कर लेते हैं। जैसे ही उस चीज को या उस कार्य को हम छोड़ते हैं, तो जीवन आसान हो जाता है।

दिव्यता को प्रकट कर मनुष्य रह सकता है सदा आनंदित।

राधिका नागरथ

शास्त्र बतलाते हैं कि हमारे जीवन का केवल एक ही मकसद है और वह है अपने आनंद को प्रकट करना। जीवन का कदापि अर्थ दुखी होना नहीं है क्योंकि हमारा स्वरूप सत चित आनंद है, इसलिए अपने अंदर के आनंद को प्रकट कर, जीवन जीना उत्तम जीवन है। स्वामी विवेकानंद ने बहुत खूबसूरत शब्दों में कहा कि हर मनुष्य के अंदर दिव्यता है और इस सुषुप्त दिव्यता को प्रकट करने के लिए ही मनुष्य जन्म मिला है। इस दिव्यता को हम कर्म से प्रकट करें, चाहे ज्ञान से, चाहे भक्ति से, या फिर मन को वश में करके राजयोग से। इस दिव्यता को प्रकट कर मनुष्य सदा आनंदित रह सकता है।

एक पल के लिए जब यह एहसास होता है कि वास्तव में हम वही ब्रह्म स्वरूप हैं जो एक से बहु हुआ है, अपनी प्रकृति द्वारा, यह एहसास हमें आनंद से भर देता है और हम चाहे तो सदा इस आनंद से ओतप्रोत रह सकते हैं किंतु आदत पड़ी है कि भूत को पकड़े रहना, भविष्य की चिंता करना और वर्तमान को यूं ही जाने देना।

कई बार ऐसा जीवन में महसूस किया जाता है कि बहुत सी चीजें हम फिजूल ही करते आए हैं और अपना जीवन जटिल कर लेते हैं। जैसे ही उस चीज को या उस कार्य को हम छोड़ते हैं, तो जीवन आसान हो जाता है।

आज की इस करोना महामारी को ही ले ले। पूर्णबंदी के दौरान प्रकृति कितनी निर्मल रही, गंगा अपने मूल रूप में, स्वच्छ, निर्मल बहती रही। चिड़ियों का चहचहाना, वह दुर्लभ जाति के परिंदों का हमारे घरों तक आहट देना, यहां तक कि हाथियों की भी वन्य क्षेत्र से जुड़े हुए आवासों में चहलकदमी पाई गई। मानो हर जीव स्वतंत्र महसूस कर रहा था। स्वतंत्र उस प्रदूषण से, स्वतंत्र मनुष्य के बनाए अनगिनत यंत्रों से, उनकी ध्वनि से और वायु में विसर्जित होने वाले कई प्रकार के विषैले तत्वों से, जो कल कारखानों से निकलते वायुमंडल को प्रदूषित करते हैं।

वैसे इस तरह विकास किया जा सकता है पर हमारे पास समय नहीं है। आपाधापी में जो काम जल्दी हो जाए, सस्ता हो जाए, उसी ओर लगे हैं सब। तो फिर वह आनंद का कारण कैसे बन सकता है? आनंद तो अपने स्वरूप में है, प्रकृति का स्व-स्वरूप, मनुष्य का स्व-स्वरूप। और कुछ पाने की चाह में हम अपने आनंद को दरकिनार कर देते हैं और वह क्षणिक सुख देने वाले संसाधनों को जोड़ने में जुट जाते हैं।

सबसे बड़ी विडंबना तो यह है की जितनी चर्चाओं का दौर बड़ा है, पर्यावरण को स्वच्छ रखने का, प्रकृति को अपने निजस्वरूप में जीने देने का और मनुष्य को भी उस आंतरिक आनंद को प्रकट करने का, उतना ही मनुष्य स्वयं भी डिस्टर्ब परेशान हो गया है और पर्यावरण तो तहस-नहस होता दिख ही रहा है। यहां तक कि दुनिया भर में जितनी कॉन्फ्रेंस, सेमिनार, संयुक्त राष्ट्र संघ की संगोष्ठियां इसको मिटाने के लिए हो रही हैं, उतना ही यह जंजाल बढ़ता जा रहा है। चिरकाल सुख के बजाय छोटे-छोटे सुख के लोभ में हम चिरकाल दुखी हो जाते हैं, और जीवन का मकसद कहीं दूर पीछे रह जाता है।

अगर हम चाहे तो एक ही झटके में, एक ही क्षण में उस अपने खोए हुए आनंद को पाकर, प्रकट कर सकते हैं जिससे हम स्वयं भी खुश होंगे और हमारे आसपास का वातावरण भी। जरूरत है तो केवल एक विचार की। आदि गुरु शंकराचार्य ने कितने सरल शब्दों में समाधान दिया कि संसार हमारे मन को दुखी नहीं कर रहा है बल्कि हमारे मन के कारण यह सारा संसार है, इसकी सत्ता है और हमारा दुखी रहने का यह कारण भासित होने लगता है।

वे कहते हैं शांत मन में संसार कहां? संसार यानी जो हो कुछ और, और दिखे कुछ और जो वास्तविक नहीं है, जो सदा एक सा नहीं है। तो अगर अपना मन शांत हुआ, तो इस संसार की कोई भी सत्ता ही नहीं रहेगी, फिर उस संसार से जनित दुख कहां। फिर तो बस आनंद ही आनंद है अपने भीतर भी और बाहर भी।

सुख और दुख की वास्तविक सत्ता हैं नहीं, उसे हमारा मन ही बल देता है क्योंकि मन में उठने वाले विचार उसे जितना दोहराते हैं उतना वह पक्का होता है, संस्कार बनता जाता है। ऐसा जीवन में बहुत बार अनुभव किया है कि हम शारीरिक कष्ट से कई बार कितने भी परेशान होते हैं किंतु जब मन किसी दूसरे में लगा ले, तो वह दुख बिल्कुल भूल जाता है। जबकि कष्ट तो वहीं का वहीं है, अगर वह कष्ट चोट के कारण है तो चोट कहीं कम नहीं हुई, पर अपना मन अगर वहां पर नहीं है और किसी दूसरी चीज में लग गया है तो वह अपने वास्तविक आनंद स्वरूप में रह सकता है। इसलिए सब कुछ भुला कर केवल आनंद में रहना और उस आनंद को प्रकट करना ही जीवन का मुख्य उद्देश्य रखना चाहिए।

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