पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि इंटरनेशनल बॉर्डर पर नोटिफाइड ऑपरेशनल एरिया में तैनात किसी आर्मी ऑफिसर की मौत अगर ड्यूटी के दौरान होती है, तो उसके परिवार को लिबरलाइज्ड फैमिली पेंशन दी जानी चाहिए। भले ही उस समय ऑफिसर बंकर के अंदर ही क्यों न हो।
यह मामला आर्मी ऑफिसर मेजर सुशील कुमार सैनी से जुड़ा है। उनकी मौत ऑपरेशन रक्षक के दौरान भारत पाकिस्तान बॉर्डर पर तैनाती के समय हुई थी। मेजर सैनी बंकर में सो रहे थे, तभी उनकी तबीयत बिगड़ी और बाद में उनकी मौत हो गई।
लिबरलाइज्ड फैमिली पेंशन का मतलब है वह पेंशन जो किसी सैनिक के शहीद होने के बाद उसके परिवार को दी जाती है। यह पेंशन उतनी ही होती है, जितनी सैलरी सैनिक को आखिरी समय में मिल रही थी। यानी लिबरलाइज्ड फैमिली पेंशन आम पेंशन से ज्यादा होती है। आम तौर पर यह पेंशन उन मामलों में दी जाती है, जब सैनिक की मौत युद्ध के दौरान, युद्ध जैसे हालात में, आतंकवाद विरोधी अभियान में या आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान होती है।
मार्च 2023 में आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल चंडीगढ़ ने मेजर सैनी की पत्नी अनुराधा सैनी को ज्यादा पेंशन देने का आदेश दिया था। ट्रिब्यूनल ने कहा था कि यह मामला लिबरलाइज्ड फैमिली पेंशन से जुड़ा है।
केंद्र सरकार ने फैसले को चुनौती दी थी
केंद्र सरकार ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी। सरकार का कहना था कि चूंकि मेजर सैनी की मौत बंकर में सोते हुए हुई थी, इसलिए इसे ऑपरेशनल एरिया में ड्यूटी के दौरान हुई मौत नहीं माना जा सकता। सरकार ने यह भी दलील दी कि इस मामले में ज्यादा से ज्यादा स्पेशल फैमिली पेंशन दी जा सकती है, लिबरलाइज्ड फैमिली पेंशन नहीं।
इस मामले की सुनवाई जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस विकास सूरी की डिवीजन बेंच ने की। हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि मेजर सैनी को भारत सरकार के आदेश पर ऑपरेशन रक्षक के तहत इंटरनेशनल बॉर्डर पर तैनात किया गया था। यह इलाका पहले से ही ऑपरेशनल एरिया के तौर पर नोटिफाइड था।
हाई कोर्ट ने कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी की रिपोर्ट पर भी भरोसा किया। इस जांच का मकसद यह पता लगाना था कि मेजर सैनी की मौत मिलिट्री सर्विस की वजह से हुई थी या नहीं। कोर्ट ने साफ कहा कि दोनों पक्ष इस बात से सहमत हैं कि कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी में यह माना गया था कि मेजर सैनी की मौत न सिर्फ मिलिट्री सर्विस की वजह से हुई थी, बल्कि ऑपरेशन रक्षक के दौरान सही ड्यूटी करते समय हुई थी।
केंद्र ने कहा कि मेजर सैनी हाइपरटेंशन से पीड़ित थे
कोर्ट ने कहा कि जब यह बात मान ली गई है, तो यह नहीं कहा जा सकता कि उनकी मौत ऑपरेशनल एरिया में ड्यूटी के दौरान नहीं हुई। हाई कोर्ट ने उस रात के हालात पर भी ध्यान दिया। कोर्ट को बताया गया कि मेजर सैनी पहले से ही हाइपरटेंशन से पीड़ित थे। जिस दिन उनकी मौत हुई, उस दिन 25 बांग्लादेशी अवैध रूप से भारत पाकिस्तान बॉर्डर पार करने की कोशिश कर रहे थे।
मामले के अनुसार, 12 और 13 मई 1991 की रात मेजर सैनी ने अपने जिम्मेदारी वाले इलाके की बॉर्डर पोस्ट चेक की थी। इसके बाद वह अपने बंकर में चले गए। रात करीब 2 बजे उन्हें जानकारी मिली कि 25 बांग्लादेशी पाकिस्तान जाने की कोशिश कर रहे हैं। हालात संभालने और रिपोर्ट लेने के लिए उन्होंने सूबेदार वी वी के राव से संपर्क किया।
सूबेदार राव रात में मेजर सैनी के बंकर में पहुंचे और पूरी जानकारी दी। मेजर सैनी ने उनके काम की सराहना की और इसके बाद सो गए। 13 मई की सुबह मेजर सैनी के असिस्टेंट ने उन्हें बंकर में बेहोश पाया। उन्हें एम्बुलेंस से अमृतसर के मिलिट्री हॉस्पिटल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
इसके बाद मेजर सैनी की पत्नी को सिर्फ साधारण फैमिली पेंशन दी गई। उन्हें बताया गया कि मौत हार्ट अटैक यानी एक्यूट मायोकार्डियल इन्फार्क्शन से हुई है और इसे मिलिट्री सर्विस से जुड़ा नहीं माना गया। इसी आधार पर उनका ज्यादा पेंशन का दावा खारिज कर दिया गया था। बाद में कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के बाद यह माना गया कि मेजर सैनी की मौत मिलिट्री सर्विस की वजह से हुई थी। इसके आधार पर अनुराधा सैनी ने लिबरलाइज्ड फैमिली पेंशन की मांग की।
आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल ने उनके पक्ष में फैसला दिया और अब पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने भी उस फैसले पर मुहर लगा दी है। इस फैसले के बाद साफ हो गया है कि ऑपरेशनल एरिया में ड्यूटी के दौरान अगर किसी सैनिक की मौत होती है, तो उसके परिवार को लिबरलाइज्ड फैमिली पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता। (PTI Input के साथ)
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