Supreme Court News: 1945 में सुभाष चंद्र बोस को ताइवान के ताइपे में हुई एक विमान दुर्घटना में मृत माना गया था। उनके लापता होने के करीब आठ दशक बाद उनकी बेटी अनीता बोस फाफ गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश हुईं। उन्होंने उस याचिका का समर्थन किया जिसमें मांग की गई है कि नेताजी के पार्थिव अवशेष भारत लाए जाएं। माना जाता है कि ये अवशेष रेनको-जी मंदिर, टोक्यो में सुरक्षित रखे गए हैं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली की बेंच ने नेताजी के पोते आशीष रे की तरफ से दायर की गई याचिका पर करने से इनकार कर दिया और कहा कि फाफ को आगे आकर खुद याचिका दायर करनी चाहिए। 84 साल की फाफ ऑस्ट्रिया से वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिये जजों से सामने पेश हुईं।
अभिषेक मनु सिंघवी ने दी दलीलें
जस्टिस बागची ने याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी से कहा, “हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हम उनकी भावनाओं का सम्मान करते हैं और यह सुनिश्चित करेंगे कि उनकी भावनाओं को कानूनी कार्रवाई में बदला जाए। लेकिन उन्हें खुद आगे आना होगा।” जस्टिस बागची ने कहा, “हमारी जानकारी के अनुसार, घटी घटनाओं को लेकर परिवार में ही मतभेद हैं।”
सिंघवी ने बेंच को बताया कि राय नेताजी के परपोते हैं और उनकी याचिका को नेताजी के इकलौते वारिस फाफ का समर्थन हासिल है। जस्टिस बागची ने कहा, “उत्तराधिकारी को हमारे सामने उपस्थित होने दीजिए। यह पर्दे के पीछे की लड़ाई नहीं हो सकती। अगर उत्तराधिकारी चाहता है कि अस्थियां देश में वापस लाई जाएं, तो उसे हमारे समक्ष उपस्थित होना होगा।” सिंघवी ने बताया कि फाफ ऑनलाइन मौजूद थीं और अदालत से उनकी बात सुनने का आग्रह किया, लेकिन बेंच इसके लिए इच्छुक नहीं थी।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी खारिज की कई याचिकाएं
मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि नेताजी से संबंधित याचिकाएं पहले भी सुप्रीम कोर्ट में आ चुकी हैं और खारिज कर दी गई थीं। उन्होंने पूछा, “यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में कितनी बार आएगा?” नवंबर 2024 में, सुप्रीम कोर्ट ने कटक के रहने वाले एक व्यक्ति की तरफ से दायर याचिका को खारिज कर दिया था। अदालत ने उनसे कहा था कि यह मुद्दा न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आता है।
सिंघवी ने कहा कि मौजूदा याचिका में उठाया गया मुद्दा अलग है और इसमें नेताजी की मृत्यु पर किसी तरह की घोषणा की मांग नहीं की गई है। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उनकी मृत्यु का प्रश्न “अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से” उठ सकता है और “हम यह भी समझते हैं कि पिछले साल खारिज होने के बाद यह याचिका फिर से क्यों सामने आ रही है।”
जस्टिस बागची ने भी कहा कि जब तक मृत्यु के मुद्दे पर चर्चा नहीं हो जाती, तब तक राख (ashes) का सवाल ही नहीं उठ सकता। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूछा, “सबसे पहले, राख कहां है? सबूत क्या है।” टोक्यो के उस मंदिर का जिक्र करते हुए, जहां माना जाता है कि अस्थियां सुरक्षित हैं, सिंघवी ने कहा, “यह तथ्य दर्ज है कि भारत के हर राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्रियों ने रेनको-जी मंदिर में दर्शन किए हैं।” मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “सबसे पहले, हमें यह जानना होगा कि उनके कितने जीवित परिवार के सदस्य हैं। वे इस राष्ट्र के महानतम नेता थे। हम सभी उनके सर्वोच्च बलिदान को नमन करते हैं।” सिंघवी ने कहा कि फाफ ही इकलौता वारिस है।
सीजेआई ने याचिका के समय पर उठाया सवाल
मुख्य न्यायाधीश ने याचिका के समय पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा, “हमें समय का भी पता है। हमें कुछ कहने के लिए मजबूर न करें।” सिंघवी ने कहा, “इसमें समय का कोई सवाल ही नहीं है क्योंकि वह लगातार लिखती रही हैं। उन्होंने कभी मना नहीं किया।” जब पीठ ने याचिका पर विचार करने की इच्छा नहीं जताई, तो सिंहवी ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी और साथ ही नई याचिका दायर करने की स्वतंत्रता भी मांगी। न्यायालय ने अनुरोध स्वीकार कर लिया।
एडवोकेट रितिका वोहरा के माध्यम से दायर रे की याचिका में कहा गया है, “नेताजी के अवशेष रेनको-जी मंदिर में ‘कुछ महीनों’ के लिए रखे गए थे, लेकिन वे 80 सालों से ज्यादा समय से वहीं हैं, जो नेताजी की अब दिवंगत पत्नी और बेटी प्रोफेसर अनीता बोस फाफ के लिए मरणोपरांत निर्वासन और अपूर्ण समापन की एक निरंतर स्थिति का निर्माण करते हैं।”
याचिका में कहा गया है, “यह याचिका नेताजी की पुत्री और एकमात्र जीवित उत्तराधिकारी प्रोफेसर अनीता बोस फाफ द्वारा पूर्णतः समर्थित है, जिसमें उनके पिता की अस्थियों के संबंध में उनके हालिया बयान और उनमें व्यक्त की गई उनकी यह इच्छा भी शामिल है कि अंतिम संस्कार के लिए अस्थियों को गरिमापूर्ण और पूर्ण रूप से भारत लाया जाए। याचिकाकर्ता केवल भारत सरकार से नेताजी की अस्थियों की समयबद्ध वापसी या वैकल्पिक रूप से याचिकाकर्ता और प्रोफेसर अनीता बोस फाफ को जापान से भारत में अस्थियों की वापसी में सुविधा प्रदान करने की मांग करती है।”
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में क्रीमी लेयर का दर्जा केवल माता-पिता की आय के आधार पर निर्धारित नहीं किया जा सकता है। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और आर. महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार द्वारा दायर अपीलों के एक समूह को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। पढ़ें पूरी खबर…
