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‘धर्म के नाम पर वोट’ मांगने पर में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को वाम दलों ने सराहा

भाकपा महासचिव रेड्डी ने कहा कि यह फैसला स्पष्ट रूप से कहता है कि धर्म, जाति या भाषा का दुरुपयोग भ्रष्टाचार के तहत आता है।

Author नई दिल्ली | January 3, 2017 7:49 PM
भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी। (फाइल फोटो)

धर्म के नाम पर वोट मांगे जाने पर रोक लगाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की वाम दलों ने मंगलवार (3 जनवरी) को सराहना की। साथ ही चुनाव आयोग से इस ऐतिहासिक फैसले को लागू करने के लिए आवश्यक सुधार का सुझाव देने का अनुरोध किया। माकपा ने एक बयान में कहा-माकपा पोलितब्यूरो सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय संविधान पीठ के उस फैसले का स्वागत करता है जिसने चुनाव प्रक्रिया को एक पंथनिरपेक्ष गतिविधि कहा है और इस तरह की गतिविधि में धर्म की कोई जगह नहीं हो सकती। शीर्ष न्यायालय की सात सदस्यीय संविधान पीठ के बहुमत और असहमति वाले विचारों का जिक्र करते हुए पोलित ब्यूरो ने कहा कि एक बारीक रेखा है जो इनके आधार पर मतदाताओं से की गई अपील को अलग-अलग करता है और अन्याय के मुद्दों को उठाता है। इस पर स्पष्टता संविधान के पंथनिरपेक्ष बुनियाद और चुनावी प्रक्रियाओं को मजबूत करने के लिए आवश्यक है। इस फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए भाकपा महासचिव एस सुधाकर रेड्डी ने कहा कि इससे इस मुद्दे पर कुछ निहित हितों को लेकर इस्तेमाल किए गए वाद की समाप्ति होनी चाहिए।

रेड्डी ने कहा कि यह फैसला स्पष्ट रूप से कहता है कि धर्म, जाति या भाषा का दुरुपयोग भ्रष्टाचार के तहत आता है। उन्होंने अनुरोध किया कि यह फैसला संविधान के मूल मूल्यों, पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र को मजबूत करेगा। भाकपा इस फैसले का स्वागत करती है और चुनाव आयोग से अनुरोध करती है कि वह इसके उपयुक्त क्रियान्वयन के लिए तथा धर्म, जाति, भाषा का दुरुपयोग करने वाले उम्मीदवारों या पार्टियों को अयोग्य ठहराने के लिए आवश्यक संशोधन का सुझाव दे। किसी पार्टी का नाम लिए बगैर रेड्डी ने आरोप लगाया कि जिन पार्टियों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक नीतियां नहीं हैं वे चुनावी फायदे के लिए कथित तौर पर धर्म और जाति का दुरुपयोग करने की कोशिश करती हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि सत्ता में आने के बाद ये पार्टियां कॉरपोरेट समर्थक, जन विरोधी नीतियों को आगे बढ़ाती हैं। लोगों को सतर्क रहना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ऐसे तत्वों के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (2 जनवरी) को कहा था कि धर्म, नस्ल, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर वोट की कोई अपील चुनाव कानून प्रावधान के तहत भ्रष्ट व्यवहार माना जाएगा। गौरतलब है कि 1990 के दशक के मध्य में शिवसेना के एक नेता के निर्वाचन से जुड़े मामले में अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में कहा था कि हिंदुत्व एक जीवन शैली है और धर्म नहीं है।

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