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विशेष: मुगलिया दौर में सावन

आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को सावन काफी रास आता था। बरसात का मौसम वे दिल्ली के महरौली में बिताना पसंद करते थे, सावन में यहां हर पेड़ पर झूले पड़ जाते और मल्हार की स्वर लहरियां सावन का समां बांधतीं।

Radha-Krishan, Delhi Sawan, Mughal Periodभारतीय पौराणिक कथाओं में प्रचलित कहानियों में राधा-कृष्ण के प्रेम का वर्णन मिलता है। सावन में झूले पड़ने और बारिश का आनंद लेने का चित्रण है।

तारीखी और पारलौकिक किस्सागोई के क्षेत्र में आरवी स्मिथ एक बड़ा नाम है। उन्होंने लंबे समय तक अखबारों में इस तरह के सैकड़ों दिलचस्प किस्से पाठकों को पढ़ने के लिए दिए। स्मिथ ने सावन को लेकर भी कई दिलचस्प जानकारियां साझा की हैं। वे बताते हैं कि मुगलिया दौर में सावन को लेकर दीवानगी का आलम यह था कि प्रेम और मनुहार से लेकर राजकाज के कई बड़े फैसलों के लिए खासतौर पर सावन के महीने को ही चुना जाता था। बाबर, हुमायूं, अकबर और शाहजहां भी गर्मियों से राहत के लिए सावन का इंतजार करते थे।

स्मिथ मुगलों के सावन से जुड़े कई ऐसे किस्से बताते हैं, जो तारीखी तौर पर सजिल्द नहीं हैं। मसलन, जहांदार शाह अपनी पत्नी लाल कंवर को प्यार करने के लिए बरसात के मौसम को सबसे बेहतर मानते थे। उनके बाद आए फारूक सियार, जिन्होंने आगरा में दिल्ली गेट बनाने के लिए खासतौर पर सावन का महीना चुना था। मोहम्मद शाह रंगीला की कृति ‘बरसात की रातें’ भी सावन के लिए उनकी चाहत का सबूत है।

अली गौहर जब युवा थे तो उन्हें तैराकी काफी पसंद थी। वैसे ही अकबर भी तैराकी के बेहद शौकीन थे। सावन के तुरंत बाद महरौली में फूलवालों की सैर की परंपरा तो आज भी जारी है। आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को भी सावन काफी रास आता था। बरसात का मौसम वे महरौली में बिताना पसंद करते थे, सावन में यहां हर पेड़ पर झूले पड़ जाते और मल्हार की स्वर लहरियां सावन का समां बांधतीं।

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