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भाषा विवाद पर जर्मनी के राजदूत की सक्रियता से मोदी सरकार ख़फ़ा

करीब 500 केंद्रीय विद्यालयों में तीसरी भाषा के रूप में जर्मन को रद्द करने के सरकार के फैसले के खिलाफ लॉबिंग कर रहे जर्मनी के राजदूत मिशेल स्टीनर की गतिविधियों से सरकार की भौहें तन गई हैं। जो उनके इस प्रयास को किसी दूत की भूमिका के अनुरूप नहीं मानती। केंद्र सरकार संचालित केंद्रीय विद्यालयों […]

मोदी सरकार का कहना है कि जर्मनी के राजदूत मिशेल स्टीनर जर्मन भाषा के लिए लॉबिंग कर रहे हैं।

करीब 500 केंद्रीय विद्यालयों में तीसरी भाषा के रूप में जर्मन को रद्द करने के सरकार के फैसले के खिलाफ लॉबिंग कर रहे जर्मनी के राजदूत मिशेल स्टीनर की गतिविधियों से सरकार की भौहें तन गई हैं। जो उनके इस प्रयास को किसी दूत की भूमिका के अनुरूप नहीं मानती। केंद्र सरकार संचालित केंद्रीय विद्यालयों में तीसरी भाषा के रूप में जर्मन की जगह संस्कृत को वापस लाए जाने के बाद संस्कृत शिक्षक संघ से संपर्क साधने और यहां निजी स्कूलों के साझेदारों के साथ बैठकें करने सहित राजदूत की अन्य गतिविधियों को यहां अनुचित माना जा रहा है। यह भी देखा गया है कि देश भर के केंद्रीय विद्यालयों में तीसरी भाषा के रूप में जर्मन पढ़ाए जाने के मुद्दे के हल के लिए उनका जोरदार हिमायत किया जाना केंद्र संचालित स्कूलों के लिए त्रिभाषी फार्मूले पर राष्ट्रीय नीति के खिलाफ है।

स्टीनर ने बैठक के बाद ट्वीट किया कि संस्कृत शिक्षक संघ ने ‘इंडो जर्मनी’ भाषा परिवार पर 2015 के शुरुआत में सम्मेलन किए जाने के मेरे विचार का समर्थन किया है और उनकी संस्कृत व जर्मन भाषा पर संघ के नेताओं के साथ दोस्ताना माहौल में गंभीर चर्चा हुई। बैठक के बाद संघ के अधिकारियों ने बताया कि उन्होंने जर्मन पक्ष को बताया कि केंद्रीय विद्यालयों में तीसरी भाषा के रूप में जर्मन पढ़ाए जाने के लिए भारत और जर्मनी के बीच हुआ समझौता राष्ट्रीय शिक्षा नीति और त्रिभाषी फार्मूले के खिलाफ है।

हालांकि यह माना जा रहा है कि जर्मन राजदूत के अथक प्रयासों के बावजूद, जर्मन भाषा की जगह संस्कृत पढ़ाए जाने के फैसले पर कोई पुनर्विचार नहीं होगा। लेकिन जो छात्र विदेशी भाषा पढ़ना चाहते हैं वे अतिरिक्त विषय के रूप में इसका अध्ययन कर सकते हैं क्योंकि सरकार ने इसके शिक्षण के लिए रखे गए शिक्षकों को सेवा में बनाए रखने का फैसला किया है।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने केंद्रीय विद्यालयों में जर्मन की जगह संस्कृत पढ़ाए जाने का पिछले हफ्ते फैसला किया था। इसके पीछे तर्क दिया गया था कि मौजूदा व्यवस्था त्रिभाषी फॉर्मूले के खिलाफ है और यह शिक्षा पर राष्ट्रीय नीति का उल्लंघन करता है।

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