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भूमि विधेयक से अपनी जमीन मजबूत करने में जुटी कांग्रेस

राजग सरकार के भूमि विधेयक में बदलाव को किसान संगठनों और एनजीओ से कोई खास समर्थन नहीं मिलने के बीच कांग्रेस इस बारे में एक संसदीय समिति की ओर से जारी..

Author Published on: July 6, 2015 8:50 AM

राजग सरकार के भूमि विधेयक में बदलाव को किसान संगठनों और एनजीओ से कोई खास समर्थन नहीं मिलने के बीच कांग्रेस इस बारे में एक संसदीय समिति की ओर से जारी एक मसौदा रिपोर्ट को मंजूर किए जाने की वकालत करेगी। जिसमें अनुमति के उपबंध और सामाजिक प्रभाव का आकलन करने जैसे प्रावधानों को शामिल करने के बहुमत के विचार प्रदर्शित होते हैं।

कांग्रेस में ऐसी समझ है कि अगर समिति अपने समक्ष पेश तीन दर्जन उपस्थिति और 500 से अधिक ज्ञापन के माध्यम से आए सामान्य विचार के आधार पर आगे बढ़ती है तब 2013 के भूमि विधेयक के अधिकांश प्रावधानों को बरकरार रखना होगा। करीब 90 फीसद संगठनों ने यूपीए सरकार द्वारा लाए गए 2013 के अहम प्रावधानों को बरकरार रखने की वकालत की। कांग्रेस पार्टी इस विषय पर भाजपा सदस्य एसएस आहलुवालिया के नेतृत्व वाली संयुक्त समिति पर उसके समक्ष आई बहुमत की आवाज पर संज्ञान लेने के लिए दबाव बना रही है जिसके मसौदा रिपोर्ट में भी यह बात परिलक्षित होनी चाहिए।

सूत्रों ने बताया कि कांग्रेस सदस्य दिग्विजय सिंह ने कुछ समय पहले समिति की बैठक में कहा था कि आम सहमति यह है कि ये संशोधन किसान विरोधी और कृषि विरोधी हैं। जब भी समिति का मसौदा रिपोर्ट तैयार होगा तब हमें इसे आम सहमति के आधार पर लेना चाहिए, विरोधाभासी रूप में नहीं। सिंह ने दावा किया कि समिति के समक्ष आए विचारों में 90 फीसद का एकमत था और 10 फीसद लोगों ने भी यह नहीं कहा कि राजग का भूमि विधेयक अच्छा है।

उन्होंने कहा कि अगर मसौदे में कांग्रेस के विचार समाहित नहीं किए गए तब वह असहमति दर्ज कराएगी। उन्होंने कहा कि सरकार को इस मुद्दे पर मेरा मार्ग या कोई मार्ग नहीं (माई वे और हाईवे) के रुख को नहीं अपनाना चाहिए। साथ ही याद दिलाया कि 2013 का विधेयक सभी राजनीतिक दलों की सहमति के आधार पर पारित किया गया था। कांग्रेस के एक अन्य सदस्य और पूर्व खाद्य मंत्री केवी थामस ने कहा कि इस बारे में राजनीतिक विचारों एवं राजनीतिक दृष्टिकोण को छोड़ भी दें तब भी एक विशिष्ट प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए, अगर हम चर्चा की भावना पर विचार करें।

फिक्की और एसोचैम जैसे औद्योगिक निकायों के अलावा राजग के कुछ सहयोगी दलों एवं आरएसएस से जुड़े संगठनों समेत अधिकांश ने राजग के भूमि विधेयक के खिलाफ विचार व्यक्त किया है और कई प्रावधानों पर आपत्ति व्यक्त की है। इनमें सहमति का उपबंध और सामाजिक प्रभाव का मूल्यांकन का विषय शामिल है। इस विषय पर गठित 30 सदस्यीय संयुक्त समिति में 11 सदस्य भाजपा के है। उन्हें बहुमत के आधार पर मंजूरी देने के लिए 5 और सदस्यों की जरूरत होगी।

चूंकि संसद की संयुक्त समिति का स्वरूप विभागीय स्थायी समिति या जांच से जुड़ी संयुक्त संसदीय समिति से अलग होता है। समिति इस विधेयक को सरकार के साथ सदस्यों की ओर से पेश संशोधनों के आधार पर संसद में रखेगी। एक बार संशोधन पेश होने के बाद इनपर उपबंध दर उपबंध के आधार पर चर्चा की जाएगी। अगर एकराय बनती है तब विधेयक को मंजूरी दी जाएगी। अन्यथा संशोधनों पर मतविभाजन होगा।

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