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पत्रकार थे लालकृष्ण आडवाणी, जब-जब छोटे कद के लालबहादुर शास्त्री से मिलते, कायल हो जाते, जानें-क्यों?

लालकृष्ण आडवाणी ने कहा, ‘‘नेहरू से उलट, शास्त्री ने जनसंघ और आरएसएस को लेकर किसी तरह का वैमनस्य नहीं रखा। वह श्री गुरुजी को राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार-विमर्श के लिए बुलाया करते थे।’’

Author नई दिल्ली | January 24, 2018 5:19 PM
बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्‍ण आडवाणी (File Photo)

भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने बुधवार को कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ वैचारिक रूप से कोई वैमनस्य नहीं रखते थे और प्रधानमंत्री रहते हुए वह गुरु गोलवलकर को अक्सर विचार-विमर्श के लिए आमंत्रित किया करते थे। शास्त्री को समर्पित कांग्रेसी करार देते हुए आडवाणी ने कहा कि अपने निजी गुणों की वजह से उन्होंने देश का विश्वास जीता। उन्होंने आरएसएस के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ के 70 साल पूरा होने के अवसर पर आए संस्करण में छपे एक संपादकीय यह बात की है। इस लेख में आडवाणी ने कहा, ‘‘नेहरू से उलट, शास्त्री ने जनसंघ और आरएसएस को लेकर किसी तरह का वैमनस्य नहीं रखा। वह श्री गुरुजी को राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार-विमर्श के लिए बुलाया करते थे।’’ आडवाणी का यह लेख उनकी जीवनी ‘माई कंट्री, माई लाइफ’ से लिया गया है।

‘ऑर्गनाइजर’ से 1960 में बतौर सहायक संपादक जुड़ने वाले आडवाणी ने कहा कि वह इस साप्ताहिक के प्रतिनिधि के तौर पर शास्त्री से कई बार मिले। उन्होंने कहा, ‘‘हर मुलाकात में मुझ पर इस छोटे कद, लेकिन बड़े हृदय वाले प्रधानमंत्री की सकारात्मक छाप पड़ी।’’ भाजपा के वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘‘धोती-कुर्ता एक नेता का पहनावा है। यह पत्रकारों को नहीं भाता। मेरे साथियों ने मुझसे यह बात कही थी। मैंने अपने साथियों की ओर से दी गई सलाह में कुछ उचित पाया और फिर से पतलून पहनने लगा।’’

आडवाणी ने लिखा कि 1977 में सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहते हुए वह ख्वाजा अहमद अब्बास और पृथ्वी राज कपूर से मिले और वे दोनों यह जानकर हैरान रह गए कि हमारे यहां एक मंत्री है जो पहले फिल्म आलोचक हुआ करता था। शास्त्री 1964 से 1966 तक देश के प्रधानमंत्री रहे। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी पिछले साल शास्त्री की तारीफ की थी।

वहीं दूसरी तरफ, उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने राम नाम को धर्म से ना जोड़ने का आह्नवाहन करते हुए बुधवार को कहा कि भय, भ्रष्टाचार और भेदभाव से मुक्त शासन ही रामराज्य है और उसके निर्माण के लिये सभी को जाति और मजहब की राजनीति से ऊपर उठकर एकजुट होना पड़ेगा। उपराष्ट्रपति ने उत्तर प्रदेश स्थापना दिवस के उद्घाटन अवसर पर कहा कि पूरी दुनिया अब भी भारत की तरफ देख रही है। इतना पुराना देश होने के बावजूद भारत ने कभी किसी पर हमला नहीं किया, क्योंकि हम ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ में विश्वास रखते हैं।

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