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Lal Bahadur Shastri Jayanti 2018: जातिवाद के धुर विरोधी थे ‘शास्‍त्री’ जी, यहां जाने के बाद बदला था अपना सरनेम

Lal Bahadur Shastri Jayanti 2018: देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्‍त्री सादगी और ईमानदारी की प्रतिमूर्ति थे। वह जाति प्रथा के भी घोर विरोधी थे। यही वजह है कि काशी विद्यापीठ से शास्‍त्री की उपाधि मिलते ही उन्‍होंने अपना सरनेम बदल लिया था।

Author नई दिल्‍ली | October 2, 2018 5:36 PM
लाल बहादुर शास्‍त्री। (फोटो सोर्स: इंडियन एक्‍सप्रेस आर्काइव)

देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्‍त्री अपनी ईमानदार छवि के लिए देश ही नहीं दुनिया भर में मशहूर थे। शास्‍त्री जी का पूरा जीवनकाल सरलता और सादगी भरा रहा। वह व्‍यक्तिगत तौर पर ईमानदारी बरतने के साथ ही सरकारी कामकाज में भी इस सिद्धांत के न केवल प्रबल समर्थक थे, बल्कि सार्वजनिक जीवन में पूरी निष्‍ठा के साथ इसका पालन भी किया। लाल बहादुर शास्‍त्री के पिता का नाम शारदा श्रीवास्तव प्रसाद और माता का नाम रामदुलारी देवी था। उनका जन्‍म 2 अक्‍टूबर, 1904 में हुआ था। शास्‍त्री जी जातिवाद प्रथा के प्रबल विरोधी थे। काशी विद्यापीठ से ‘शास्‍त्री’ की उपाधि मिलते ही उन्‍होंने जन्‍म से चले आ रहे जातिसूचक सरनेम श्रीवास्‍तव को हटाकर नाम के आगे हमेशा के लिए शास्‍त्री लगा लिया था। उनका परिवार आज तक इसका निर्वाह करता आ रहा है। बता दें कि भारत में जातिवादी प्रथा की जड़ें काफी गहरी हैं। इसके उन्‍मूलन को लेकर समय-समय पर सामाजिक जनजागरण का अभियान चलता रहा है। लाल बहादुर शास्‍त्री ने भी इस मुहिम में बढ़-चढ़कर हिस्‍सा लिया था। बता दें कि शास्‍त्री जी को शादी में दहेज के तौर पर एक चरखा और कुछ गज कपड़े मिले थे।

नाव वाले को देने के लिए जेब में नहीं थे पैसे: शास्‍त्री जी बेहद साधारण परिवार से ताल्‍लुक रखते थे। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि वह स्‍कूल जाने के लिए नाव का पैसा भी चुका पाने में भी असमर्थ थे। ऐसे में वह तैर कर नदी पार कर स्‍कूल जाते थे। उनसे इसी तरह का एक और किस्‍सा जुड़ा है। दरअसल, एक बार उनके पास के एक गांव में मेला लगा था, जहां नदी पार कर जाना पड़ता था। वह भी अपने दोस्‍तों के साथ मेला देखने गए थे। मेले में उनके सारे पैसे खर्च हो गए। जब अपना गांव जाने के लिए नदी किनारे पहुंचे तो उनकी जेब में नाव वाले को देने के लिए पैसे ही नहीं थे। उस वक्‍त उन्‍होंने अपने दोस्‍तों से कहा था कि उन्‍हें कुछ काम है, इसलिए वह बाद में घर जाएंगे। शास्‍त्री जी के सभी दोस्‍त नाव में सवार होकर गांव चले गए थे। इसके बाद शास्‍त्री जी तैर कर नदी पार की थी और अपने घर पहुंचे थे। शास्‍त्री जी नहीं चाहते थे कि उनके दोस्‍त उनके किराये का बोझ उठाएं।

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