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लक्ष्मी विलास बैंक के डूबने की कहानी, 10 साल में बदल डाले 5 सीईओ, अपनी क्षमता से ज्यादा बांटे लोन

इस एक दशक में बैंक ने 5 सीईओ देखे और कोई भी दो या तीन साल से ज्यादा वक्त तक नहीं टिक सका। इसके अलावा दूसरी समस्या यह रही कि बैंक ने अपनी आर्थिक हैसियत से ज्यादा लोन बांट दिए।

lakshmi vilas bankजानिए कैसे डूबता गया लक्ष्मी विलास बैंक

बीते कई सालों में डूबे बैंकों की फेहरिस्त में अब लक्ष्मी विलास बैंक का नाम भी शामिल होता दिख रहा है। 94 साल पुराना यह बैंक करीब 80 से ज्यादा वक्त तक सही चलता रहा, लेकिन बीते एक दशक से समस्याएं शुरू हो गईं। इस एक दशक में बैंक ने 5 सीईओ देखे और कोई भी दो या तीन साल से ज्यादा वक्त तक नहीं टिक सका। इसके अलावा दूसरी समस्या यह रही कि बैंक ने अपनी आर्थिक हैसियत से ज्यादा लोन बांट दिए। बैंक ने बड़ी संख्या में मिड साइज कंपनियों को कॉरपोरेट लोन बांट दिए, जिनके फंसने पर बैंक का संभलना मुश्किल था। प्राइवेट सेक्टर के एचडीएफसी बैंक के छठवें हिस्से के बराबर के इस बैंक ने इन्फ्रास्ट्रक्चर, पावर, रियल एस्टेट, कंस्ट्रक्शन और टेक्सटाइल्स जैसे एक दर्जन सेक्टर्स को बड़े पैमाने पर लोन बांट दिए थे।

इन कॉरपोरेट लोन्स के चलते ही बैंक के पतन की शुरुआत हुई थी। YES Bank की असफलता की बात करें तो उसे भी रिस्की सेक्टर्स को बड़े पैमाने पर लोन बांटने के चलते ही संकट का सामना करना पड़ा था। इस दक्षिण भारतीय बैंक में 2007 से 2010 के दौरान वीएस रेड्डी सीईओ थे। यह वक्त भारतीय अर्थव्यवस्था की ग्रोथ का था। उस दौर में इन्फ्रास्ट्रक्चर, मेटल्स, कंस्ट्रक्शन और रियल एस्सेट सेक्टर का तेजी से उभार हो रहा था। लक्ष्मी विलास बैंक ने भी इन सेक्टर्स पर बड़े पैमाने पर दांव लगा दिया और यह ध्यान नहीं दिया कि कितनी पूंजी के लोन देना उसकी सेहत के लिहाज से ठीक रहेगा। फिर अर्थव्यवस्था में जब मंदी का दौर आया तो बैंक की पूंजी फंसती दिखी और यही उसके डूबने का कारण बन गया।

दरअसल बैंकिंग सेक्टर में लोन के बिजनेस की बात करें तो कॉरपोरेट ऋण आसान टारगेट हैं, जबकि रिटेल लोन के बिजनेस में कड़ी प्रतिस्पर्धा है। ऐसे में बैंक तेज ग्रोथ के लिए कॉरपोरेट लोन का रुख करते हैं, लेकिन उसमें रिस्क भी अधिक है। 2007 से 2010 के दौरान बैंक की लोन बुक का अमाउंट लगभग दोगुना होते हुए 3,612 करोड़ रुपये से बढ़कर 6,277 करोड़ रुपये हो गया।

रेड्डी के बाद आरआर सोमासुंदरम ने बैंक की कमान संभाली थी, लेकिन वह भी तो साल तक ही रहे और नवंबर 2012 में रिजाइन कर दिया। सोमासुंदरम के पास हिंदुस्तान यूनिलीवर और विदेशी बैंक स्टैंडर्ड चार्टर्ड में काम करने का अनुभव था, लेकिन वह दौर चुनौतीपूर्ण था। दरअसल अर्थव्यवस्था 2008 की मंदी के दौर से गुजरने की कोशिशों में जुटी थी।

एक तरफ अर्थव्यवस्था में पहले जैसी स्थिति नहीं थी तो दूसरी बैंक ने लोन में और इजाफाकर लिया। मार्च 2010 में बैंक की लोन बुक का अमाउंट 6,277 करोड़ रुपये था, लेकिन मार्च 2013 में यह बढ़कर 11,702 करोड़ रुपये हो गया। इसमें भी सबसे ज्यादा लोन इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को दिया गया था। 2010 में इस सेक्टर के पास 588 करोड़ रुपये का लोन था, जो मार्च 2013 में बढ़कर 1,059 करोड़ रुपये हो गया। इसके अलावा बैंक ने फार्मा, मेटल्स ट्रेडिंग, इंजीनियरिंग और सीमेंट कंपनियों को भी जमकर लोन दिए। यही वजह थी कि बैंक लगातार एनपीए के संकट में घिरता गया और फंडिंग कमजोर होने के चलते डूबने की स्थिति पैदा हो गई।

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