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कृषि कानून और संवैधानिकता: राज्यों के अधिकारों पर बहस कितनी जरूरी

विरोध कर रहे राज्यों का तर्क है कि संघ सूची की चीजें जिन पर संसद को कानून बनाने का अधिकार है, उनमें साफ बताया गया है कि कृषि पर कानून बनाने का अधिकार संसद के पास नहीं होगा। आयकर पर केंद्र सरकार कानून बना सकती है, लेकिन इसमें कृषि से अर्जित आय शामिल नहीं है। कृषि को स्थानीय विषय माना गया है।

केंद्र सरकार के बनाए गए कृषि कानूनों के लाभ-हानि पर विशेषज्ञ एकमत नहीं हैं।

केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए नए कृषि कानूनों को लेकर कई विपक्षी पार्टियों और विपक्ष शासित राज्य सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इन कानूनों और इन्हें अदालत में चुनौती देने को लेकर संविधान की व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं। अहम सवाल यह है कि क्या संविधान के अनुच्छेद 254 (2) के तहत राज्यों को शक्तियां मिली हैं, जिससे वे कानून बनाकर अपने राज्य में केंद्र के पारित कृषि कानूनों को निष्प्रभावी कर दें? क्या सुप्रीम कोर्ट जाकर संसद में पारित कृषि कानूनों को रद्द कराया जा सकता है? जब संवैधानिक रूप से कृषि क्षेत्र में निर्णय लेना राज्यों का अधिकार क्षेत्र माना गया है तो क्या नए कृषि कानूनों को खेती के विषय में केंद्र का अतिक्रमण माना जा सकता है?

क्या है संविधान का अनुच्छेद 254 (2)
कृषि कानूनों को लेकर पंजाब और हरियाणा के साथ ही देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। हरियाणा में भाजपा और पंजाब में कांग्रेस की सरकार है। कांग्रेस पार्टी आलाकमान ने अपने मुख्यमंत्रियों से कहा है कि वे संविधान के अनुच्छेद 254 (2) के तहत स्थानीय स्तर पर कानून बनाएं, जिससे कृषि कानून को निष्प्रभावी बनाया जा सके।

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने ट्वीट कर पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली का हवाला दिया है। जेटली ने वर्ष 2013 में लिखे अपने एक ब्लॉग में संविधान के इस अनुच्छेद का हवाला दिया था। जयराम रमेश ने ट्विटर पर लिखा है, ‘वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राज्यों से संविधान के अनुच्छेद 254 (2) का इस्तेमाल करके भूमि अधिग्रहण कानून-2013 के प्रावधानों को निष्प्रभावी बनाने के लिए कहा था।

राज्यसभा में विपक्ष के नेता के रूप में उन्होंने इसका पूर्ण समर्थन किया था। अब राज्य उसी सलाह का पालन करके कृषि अधिनियमों (जो अब कानून बन गए हैं) से हुए नुकसान की भरपाई कर सकते हैं।’

राज्यों के अधिकार
राजनीति से इतर इस अनुच्छेद को लेकर सवाल उठ रहा है कि क्या इससे राज्यों को यह ताकत मिलती है कि वे ऐसे कानून बना सकें जिससे उनके राज्य में नए कृषि कानून निष्प्रभावी हो जाएं। जिस अनुच्छेद 254 (2) के इस्तेमाल की बात कही गई है, वो समवर्ती सूची में शामिल विषयों से जुड़ा है।

संविधान में तीन सूचियां बनाई गई हैं- संघ सूची (वे विषय जिन पर केंद्र सरकार को कानून बनाने का एकाधिकार है), राज्य सूची (वे विषय जिन पर राज्य सरकारें कानून बना सकती हैं) और समवर्ती सूची (वह सूची जिन पर राज्य और केंद्र सरकारें कानून बना सकती हैं)।

संविधान के अनुच्छेद 254 (2) के मुताबिक, राज्य विधानसभा की ओर से समवर्ती सूची में शामिल विषयों के संबंध में कानून बनाया जा सकता है जो कि संसद द्वारा बनाए गए पहले के कानून के प्रावधानों, या उस विषय के संबंध में मौजूदा कानून के खिलाफ हैं। इस अनुच्छेद के साथ शर्त यह है कि राज्य सरकारों को इन अधिनियमों के लिए राष्ट्रपति की स्वीकृति चाहिए होती है।

अदालती विकल्प क्या हैं
विपक्ष शासित राज्य सरकारें इन कानूनों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला कर चुकी हैं। जानकारों के मुताबिक, संसद में पारित कानूनों की संवैधानिकता को इस पर चुनौती दी जा सकती है कि कानून का विषय राज्य सूची का हो या ये मूल अधिकारों का उल्लंघन करता हो। एक बार जब कोई कानून संसद में पास हो गया हो तो जब उस कानून की संवैधानिकता को चुनौती दी जाती है तो आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट उस पर स्टे नहीं लगाता। यूएपीए और सीएए कानून में अदालत ने स्टे नहीं दिया।

विरोध कर रहे राज्यों का तर्क है कि संघ सूची की चीजें जिन पर संसद को कानून बनाने का अधिकार है, उनमें साफ बताया गया है कि कृषि पर कानून बनाने का अधिकार संसद के पास नहीं होगा। आयकर पर केंद्र सरकार कानून बना सकती है, लेकिन इसमें कृषि से अर्जित आय शामिल नहीं है। कृषि को स्थानीय विषय माना गया है। राज्य सूची में 14वां विषय कृषि से जुड़ी शिक्षा एवं शोध, कीटों से सुरक्षा और पौधों में लगने वाली बीमारियां है। राज्य सूची के 28वें विषय में बाजार और मेलों को रखा गया है। कृषि उपज बेचने की व्यवस्था करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास नहीं है।

मूल्य नियंत्रण का अधिकार
समवर्ती सूची की प्रविष्टि 34 में केंद्र के पास मूल्य नियंत्रण अधिकार का जिक्र है, जो एक बार फिर कृषि मामलों में केंद्र सरकार की घुसपैठ और राज्यों की शक्तियों को सीमित करने का मौका बनाता है। तमिलनाडु ने इसको लेकर कहा है कि समवर्ती सूची की प्रविष्टि 33 और 34 राज्यों की सार्वभौमिकता पर चोट है। उसने कई मौकों पर मांग की है कि उक्त प्रविष्टियों को समवर्ती सूची से निकालकर राज्य सूची में डाला जाए।

क्या कहते हैं जानकार
कृषि एक पेशा है, वो व्यापार या उद्यम नहीं है। अगर कृषि को व्यापार या उद्यम मान लिया तो फिर अंतरराज्यीय व्यापार एवं उद्योग प्रावधान लागू होगा, जिससे राज्यों के कृषि से जुड़े सारे अधिकार समाप्त हो जाएंगे। इससे हमारी संघीय व्यवस्था पर सवाल खड़ा हो सकता है।
-फैजान मुस्तफा, संविधान विशेषज्ञ

नए संशोधनों का उद्देश्य हाशिए पर बैठे, लघु और मध्यम किसानों को कमजोर करना है ताकि घाटे से तंग आकर वे अपनी जमीन को देशी-विदेशी बड़े कृषि-व्यापारिक कॉरपोरेट को औने-पौने दामों पर बेचने को मजबूर हो जाएं। इस वर्ग में आने वाले कृषक छोटी जोत वाले खेत बेचने के बाद दिहाड़ी मजदूर बनते रहे हैं।
– प्रीतम सिंह, विजिटिंग प्रोफेसर, आक्सफोर्ड

राज्यों की घटती निर्णय शक्ति
संविधान के भाग 11वें के अनुच्छेद 248 के अंतर्गत केंद्र के पास किसी भी उस विषय पर, जिसका जिक्र तीनों सूचियों में नहीं है, निर्णय लेने की अवशिष्ट शक्तियां हैं। अनुच्छेद 249 के अंतर्गत संसद के पास किसी भी विषय पर कानून बनाने का हक है, यहां तक कि अगर संसद को मुनासिब लगे कि ऐसा राष्ट्रीय हित में जरूरी है तो वह राज्य सूची के विषयों पर भी यही करने का अधिकार रखती है।

समवर्ती सूची की प्रविष्टि-33, जहां एक ओर कृषि विषयों पर राज्यों की शक्ति को सीमित करती है वहीं दूसरी तरफ केंद्र को यह अधिकार देते हुए ताकतवर बनाती है कि वह कृषि उत्पादन, कृषि-व्यापार, खाद्यान्न वितरण और कच्चे कृषि उत्पाद संबंधी मामलों पर कानून बनाए।

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