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ललित नारायण मिश्र हत्याकांड में 4 अभियुक्त दोषी

बिहार के समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर बम विस्फोट में तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र की हत्या के करीब 40 साल बाद दिल्ली की अदालत ने सोमवार को मिश्र और दो अन्य की हत्या और साजिश रचने के जुर्म में तीन आनंद मार्गियों और एक वकील को दोषी ठहराया। 1975 के इस मामले में संतोषानंद […]

Author December 9, 2014 10:37 AM
40 साल पहले हुए एक विस्फोट में तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र और दो अन्य की हत्या के कसूरवार ठहराए गए चार लोगों को दिल्ली की एक अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई।

बिहार के समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर बम विस्फोट में तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र की हत्या के करीब 40 साल बाद दिल्ली की अदालत ने सोमवार को मिश्र और दो अन्य की हत्या और साजिश रचने के जुर्म में तीन आनंद मार्गियों और एक वकील को दोषी ठहराया।

1975 के इस मामले में संतोषानंद अवधूत (75), सुदेवानंद अवधूत (79), गोपाल जी (73)(तीनों आनंदमार्गी)और 66 वर्षीय अधिवक्ता रंजन द्विवेदी को हत्या का दोषी ठहराया। द्विवेदी अभी तक जमानत पर थे और विभिन्न अदालतों में वकालत कर रहे थे।

उन्हें भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) की धाराओं 302(हत्या), 120 बी (आपराधिक साजिश), 326 (खतरनाक हथियार या तरीके से स्वेच्छा गंभीर चोट पहुंचाना)और 324 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना)सहित विभिन्न प्रावधानों के तहत अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया। अदालत ने उन्हें विस्फोटक सामग्री अधिनियम के तहत भी दोषी ठहराया।

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आनंद मार्गी संगठन एक वैश्विक, आध्यात्मिक और सामाजिक सेवा संगठन होने का दावा करता है। मिश्र की हत्या के बाद इस संगठन को दो साल से कम समय के लिए प्रतिबंधित किया गया था। जिला न्यायाधीश विनोद गोयल ने अपराह्न तीन बजकर 15 मिनट पर फैसला सुनाते हुए कहा,‘चारों अभियुक्त एलएन मिश्रा की हत्या के दोषी हैं।’

न्यायाधीश ने कहा कि आरोपी रंजन द्विवेदी, संतोषानंद अवधूत, सुदेवानंद अवधूत और गोपालजी को भारतीय दंड संहिता की धाराओं 120 बी, 302, 326, 324, 34 (समान आशय)के तहत अपराधों के लिए दोषी ठहराया जाता है। अदालत ने इस मामले में सजा की अवधि पर दलीलें सुनने के लिए 15 दिसंबर की तारीख तय की है। इस मामले में दोषियों को उम्रकैद से मृत्युदंड तक की सजा हो सकती है।

अदालत में सोमवार को यह फैसला मिश्र के करीबी रिश्तेदारों, रंजन द्विवेदी की पत्नी और गोपालजी की बेटी सहित दोषियों के रिश्तेदारों की उपस्थिति में खचाखच भरे कक्ष में सुनाया। दो अन्य दोषियों संतोषानंद और सुवेदानंद के साथ आनंद मार्ग के सदस्य मौजूद थे।

फैसला सुनाए जाने के बाद, न्यायाधीश ने दोषियों को हिरासत में लेने का आदेश दिया। बाद में उन्हें जेल भेजा गया। सुदेवानंद को जेल से लाकर अदालत में पेश किया गया था क्योंकि वह 1975 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश एएन राय की हत्या के प्रयास के जुर्म में पहले से ही जेल में बंद था।
सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 1986 में संतोषानंद, सुदेवानंद और गोपालजी को जमानत दी थी जबकि रंजन द्विवेदी को 1978 में जमानत पर रिहा किया गया था। दो जनवरी 1975 को हुए विस्फोट के कारण घटना के अगले दिन मिश्र की मौत हो गई थी और उनके भाई, जगन्नाथ मिश्र सहित 25 लोग घायल भी हुए थे। एलएन मिश्र के अलावा विस्फोट में मरने वाले दो अन्य लोग सूर्य नारायण झा और राम किशोर प्रसाद सिंह किशोर थे।

इतने लंबे समय तक चले इस मामले में 20 से ज्यादा न्यायाधीशों ने सुनवाई की। मिश्र के एक पड़पोते वैभव ने इतने लंबे समय तक कार्यवाही चलने पर निराशा जताई।

वैभव(26)ने कहा, ‘इस मामले में फैसला आने में बहुत लंबा समय लगा। यह सबसे बड़ी निराशा है। कोई मामला इतना लंबा नहीं चलना चाहिए।’वहीं दूसरी ओर, घटना के समय चारों दोषियों में सबसे युवा(24 वर्षीय) रहे द्विवेदी ने कहा, ‘हम इस संकट की घड़ी में भी मजबूत हुए हैं।’ द्विवेदी का परिवार अमेरिका में बस गया है।

दो अन्य दोषियों सुदेवानंद और गोपालजी ने इस मामले के फैसले पर टिप्पणी करने से इनकार किया लेकिन तीसरे दोषी संतोषानंद ने कहा कि यह मामला ‘राजनीतिक साजिश’थी और वे इसके पीड़ित हैं।

उन्होंने कहा,‘हमारी जंग जारी रहेगी। यह फैसला कानून व तथ्यों पर आधारित नहीं है। हम राजनीतिक साजिश के शिकार हैं और ऊपरी अदालतों में इसका खुलासा होगा।’ विशेष लोक अभियोजक एनके शर्मा ने कहा कि अभियोजन पक्ष की तरफ से देरी के आरोप गलत हैं।

उन्होंने कहा,‘इस मामले का लंबा खिंचने का कारण यह था कि ऊपरी अदालतों में कई बार इस मामले को चुनौती दी गई। इस मामले में देरी के लिए अभियोजन की गलती नहीं है और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट से इसे स्वीकार किया है।’

दोषियों संतोषानंद और रंजन द्विवेदी की ओर से पेश अधिवक्ताओं फिरोज अहमद और आरएस शर्मा ने कहा कि इस मामले का फैसला ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ और ‘अप्रत्याशित’ है और वे ऊपरी अदालत में इस फैसले को चुनौती देंगे।

अहमद ने कहा, ‘नतीजा दुर्भाग्यपूर्ण है। हमें इसकी उम्मीद नहीं थी और इस मामले के तथ्यों को देखने पर, हमें आशा है कि ऊपरी अदालत में सभी बरी हो जाएंगे।’

इस मामले से पिछले 15 वर्ष से जुड़े रहे अहमद ने कहा, ‘‘सीबीआई ने इस मामले को खींचा है। उसने शुरू से ही इस मामले में देर की है। हम फैसले के खिलाफ अपील करेंगे।’’

यह मामला सबसे पहले बिहार पुलिस को सौंपा गया था और कुछ दिन बाद इसे राज्य सीबीसीआईडी को दिया गया और अदालती कार्यवाही समस्तीपुर में हुई।

यह मामला बाद में सीबीआइ को स्थानांतरित किया गया जिसने एक नवंबर 1977 को पटना की एक विशेष अदालत में आरोपपत्र दायर किया था।
सुप्रीम कोर्ट के 17 दिसंबर 1979 के निर्देश पर यह मामला दिल्ली स्थानांतरित हुआ और यह सबूत मिटाने के डर से राज्य से बाहर स्थानांतरित होने वाला देश का पहला मामला बना।

इस मामले में अभियोजन पक्ष के 161, आरोपी पक्ष के 43 और अदालत के गवाह के तौर पर नौ गवाहों सहित कुल 213 गवाहों से पूछताछ की गई।
इससे पहले आरोपियों ने इस मामले में उनके खिलाफ जारी सुनवाई को निरस्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी।

शीर्ष अदालत ने 17 अगस्त 2012 को उनकी याचिकाएं इस आधार पर खारिज कर दी थीं कि कार्यवाही सिर्फ इस आधार पर निरस्त नहीं की जा सकती कि यह बीते 37 वर्ष में पूरी नहीं हुई है। गोपालजी को छोड़कर, इस मामले के आरोपपत्र में नामित अन्य सभी लोगों को 20 मार्च 1975 को दिल्ली में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश एएन राय पर हुए जानलेवा हमले से जुड़े मामले में भी आरोपी बनाया गया था।

संतोषानंद और सुदेवानंद को न्यायमूर्ति राय मामले में विक्रम के कबूलनामे के आधार पर आरोपी बनाया गया था। विक्रम सीबीआई के लिए सरकारी गवाह बन गया था।

निचली अदालत ने हत्या के प्रयास के मामले में संतोषानंद और सुदेवानंद को 10 -10 साल जबकि द्विवेदी को चार साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।

उन्होंने न्यायमूर्ति राय की हत्या के प्रयास के मामले में अपनी दोषसिद्धि को इस आधार पर चुनौती दी थी कि विक्रम अपने कबूलनामे से पलट गया। अगस्त में दिल्ली हाई कोर्ट ने हत्या के प्रयास मामले में संतोषानंद और सुदेवानंद की दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखी थी जबकि द्विवेदी को इस मामले में बरी किया था।

 

 

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