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संकीर्तन भक्ति: कृष्ण और चैतन्य महाप्रभु

चैतन्य महाप्रभु ने भजन गायकी की एक नई शैली को जन्म दिया और राजनीतिक अस्थिरता के दिनों में हिंदू-मुस्लिम एकता और सद्भावना पर बल दिया। लोगों को जात-पात, ऊंच-नीच की भावना को दूर करने की शिक्षा दी व विलुप्त होते वृंदावन को फिर से बसाया।

भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त चैतन्य महाप्रभु।

शंकर जालान
कृष्ण की भक्ति का जिक्र हो और चैतन्य महाप्रभु का स्मरण न हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता, क्योंकि चैतन्य महाप्रभु की संकीर्तन भक्ति उन्हें श्रीकृष्ण के अन्य भक्तों की तुलना में एक अलग पहचान दिलाती है। 1486 में पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के नवद्वीप में जन्मे विश्वंभर मिश्र के पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र व माता का नाम शचि देवी था वही नवद्वीप जो बाद में मायापुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ और विश्वंभर मिश्र कालक्रम में चैतन्य महाप्रभु के नाम से विख्यात हुए।

नदिया जिले में नौ द्वीपों का एक समूह है, जिनके नाम हैं- अंतरद्वीप, सीमांतद्वीप, रुद्रद्वीप, मध्यद्वीप, गोदुरुमद्वीप, रितुद्वीप, झानूद्वीप, मोदादुरुमद्वीप व कोलाद्वीप। कहते हैं कि श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त चैतन्य महाप्रभु ने छुआछूत और ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाकर प्रेम में निमग्न रहने की शिक्षा दी। वे राधा-कृष्ण के अनन्य भक्त थे। हरे कृष्ण-हरे कृष्ण का जाप उन्होंने जन सामान्य की जुबान पर ला दिया। उन्होंने वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय की आधारशिला रखी। भक्तगण प्यार से उन्हें चैतन्य चंद्र, निमाई, गौरांग, गौर हरि, गौर सुंदर भी कहा करते थे। दरअसल, गौर वर्ण होने की वजह से उन्हें गौरांग, गौर हरि, गौर सुंदर भी कहा जाता था।

मान्यता है कि नीम के पेड़ के नीचे उनका जन्म हुआ, इसलिए भक्त उन्हें निमाई कहा करते थे। चैतन्य महाप्रभु के जीवन और उनकी भक्ति रचना पर कई पुस्तकें लिखी गई हैं। उनमें से एक है चैतन्य चरितअमृत। माना जाता है कि बहुत छोटी उम्र से ही वे कृष्ण के भक्ति गीत गाने में निपुण थे। 14-15 वर्ष की अवस्था से ही वे अर्थ सहित संस्कृत के श्लोक सुना देते।

उन्होंने भजन गायकी की एक नई शैली को जन्म दिया और राजनीतिक अस्थिरता के दिनों में हिंदू-मुस्लिम एकता और सद्भावना पर बल दिया। उन्होंने लोगों को जात-पात, ऊंच-नीच की भावना को दूर करने की शिक्षा दी व विलुप्त होते वृंदावन को फिर से बसाया। घूम-घूम कर उनके कीर्तन करने का व्यापक और सकारात्मक प्रभाव आज पश्चिमी जगत तक है। एक बार वे अपने पिता का श्राद्ध कर्म करने गया पहुंचे और वहीं उन्हें वैराग्य उत्पन्न हो गया। साथ ही, वहां अपने गुरु ईश्वर पुरी से भी मिलने का मौका मिला।

कुछ ही दिनों बाद 24 वर्ष की आयु में उन्होंने संन्यास ले लिया और भारत भ्रमण पर निकल पड़े। उन्होंने अपने जीवन के लगभग 24 वर्ष पुरी (उड़ीसा) में बिताए। उनके मुताबिक श्रीकृष्ण ही परम सत्य हैं, जिनमें जगत की सारी शक्तियां निहित हैं। प्रत्येक व्यक्ति उनका ही अंश है और श्रीकृष्ण से प्रेम करने पर ईश्वर से एकाकार हो सकता है। मृदंग की ताल पर कीर्तन करने वाले प्रेम की चेतना के संवाहक बने और लोगों को प्रेम और भक्ति के साथ रहना सिखाया।

नाचते-गाते, झांझ-मंजीरा बजाते हुए भी प्रभु की भक्ति की जा सकती है। प्रभु भक्ति के इस स्वरूप को चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं अपनाया और सामान्य जनों को भी इसे अपनाने के लिए प्रेरित किया। वे भक्तिकाल के प्रमुख संतों में से एक हैं। कहते हैं कि विलुप्त हो चुके वृंदावन को उन्होने फिर से बसाया। अपने अंतिम समय में वे वहीं रहे। ऐसा भी मानते हैं कि यदि गौरांग ना होते तो वृंदावन आज तक एक मिथक ही होता।

वैष्णव लोग इन्हें श्रीकृष्ण और राधा रानी के मिलन का प्रतीक स्वरूप का अवतार मानते हैं। इनके ऊपर बहुत से ग्रंथ लिखे गए हैं, जिनमें से श्री कृष्णदास कविराज गोस्वामी का लिखा चैतन्य चरितामृत, श्री वृंदावन दास ठाकुर का लिखा चैतन्य भागवत और लोचनदास ठाकुर का चैतन्य मंगल प्रमुख हैं। चैतन्य को उनके अनुयायी कृष्ण का अवतार भी मानते रहे हैं।

1509 में जब ये अपने पिता का श्राद्ध करने बिहार के गया नगर गए, तब वहां इनकी मुलाकात ईश्वर पुरी नामक संत से हुई। उन्होंने निमाई से कृष्ण-कृष्ण रटने को कहा। तभी से इनका सारा जीवन बदल गया और ये हर समय भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन रहने लगे। इनके असंख्य अनुयायी हो गए। 14 जून 1534 को ओडीशा के पुरी में उन्होंने अंतिम सांस ली और इस संसार को अलविदा कह दिया।

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